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बाड़मेर लोकसभा सीट: सियासी बवंडर के लिए फिर तैयार है थार का यह रेगिस्तान

फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।
फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।

बाड़मेर, बायतु, शिव, चौहटन, गुड़ामालानी, सिवाना, पचपदरा और जैसलमेर कुल आठ विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने वाला यह लोकसभा क्षेत्र हमेशा से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है.

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विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में तूफान खड़ा करने वाले भारत-पाकिस्तान के बार्डर पर स्थित बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र की राजनीतिक फिजां इस बार भी पिछले लोकसभा चुनाव जैसी ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि पिछली बार वर्तमान सांसद कर्नल सोनाराम कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आ गए थे और इस बार इसी क्षेत्र से पूर्व में सांसद रह चुके मानवेन्द्र सिंह बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में चले गए हैं. यही इस क्षेत्र की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट है.

बाड़मेर, बायतु, शिव, चौहटन, गुड़ामालानी, सिवाना, पचपदरा और जैसलमेर कुल आठ विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने वाला यह लोकसभा क्षेत्र हमेशा से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है. करीब 27 लाख की आबादी वाले इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 18,87,061 मतदाता हैं. इनमें 10,02,571 पुरुष और 8,84,441 महिला मतदाता हैं. लोकसभा क्षेत्र में जातीय समीकरणों को देखें तो यहां मौटे तौर करीब 3.50 लाख जाट, 3.50 लाख अनुसूचित जाति एवं जनजाति, 3 लाख मुस्लिम और करीब 2.75 लाखराजपूत व रावणा राजपूत समाज के मतदाता हैं.

सोनाराम को टिकट दिया तो सिंह ने कर दी थी बगावत
वर्तमान में यहां बीजेपी के कर्नल सोनाराम सांसद हैं. सोनाराम ने गत लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस का हाथ छोड़कर कमल कोथाम लिया था. बीजेपी में आते ही पार्टी ने बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह जसोल की दावेदारी को ठुकराकर यहां से सोनाराम को टिकट थमा दिया. बस यही वह समय था जब रेतीले धोरों में जबर्दस्त सियासी बंडवर आ गया. बीजेपी के जन्म से उसे सींचने जसवंत सिंह ने बगावत कर दी और निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद पड़े.
सांसद कर्नल सोनाराम। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।



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बीजेपी के लिए यह है बड़ी चुनौती
इस चुनाव ने क्षेत्र में बहुलता रखने वाले जाट-राजपूत समाज के बीच पहले पैदा हो रखी दूरियों को और बढ़ा दिया. इसका प्रभाव आज भी इस क्षेत्र में रह-रहकर सामने आता है. वहीं बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक राजपूत समाज सिंह को टिकट नहीं दिए जाने से खफा होकर उससे छिटक गया. उसे वापस अपने खेमे में लाना आज भी बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती है. कर्नल सोनाराम वर्तमान कार्यकाल से पहले भी दो बार यहां से सांसद रह चुके हैं.


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आठ बार सांसद रहे हैं जसवंत सिंह
बाड़मेर के जसोल के मूल निवासी पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह दो बार चित्तौड़गढ़, एक बार जोधपुर और एक पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग से लोकसभा सांसद चुने गए. इसके अलावा चार बार राज्यसभा सांसद बने. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद करीब रहे जसवंत सिंह रक्षा, विदेश और वित्त मंत्री रहे. जसवंत सिंह का टिकट काटने खफा होकर उनके पुत्र पूर्व सांसद मानवेन्द्र सिंह ने भी बीजेपी से दूरियां बना ली.

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पूर्व सांसद मानवेन्द्र सिंह। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।


'स्वाभिमान रैली' से उठा राजनीतिक बवंडर
अंतत: गत वर्ष विधानसभा चुनाव से पहले सिंतबर माह में मानवेन्द्र सिंह ने पचपदरा में 'स्वाभिमान रैली' कर 'कमल का फूल, हमारी भूल' कहते पार्टी छोड़ दी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की उपस्थिति में कांग्रेस का हाथ थाम लिया. अब वे इस लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की टिकट के प्रबल दावेदार हैं. मानवेन्द्र सिंह वर्ष 2004 में इस लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं. उन्होंने उस समय रिकॉर्ड मतों से अपनी जीत दर्ज कराई थी.

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सोनाराम और मानवेन्द्र ने एक दूसरे को हराया
लोकसभा क्षेत्र का गत पांच चुनावों का इतिहास देखें तो यहां 1998 में कांग्रेस के कर्नल सोनाराम ने बीजेपी के लोकेन्द्र सिंह कालवी को हराया था। 1999 में सोनाराम ने फिर जीत दर्ज कराते हुए बीजेपी के मानवेन्द्र सिंह (जसवंत सिंह के पुत्र) को हराया. लेकिन 2004 के चुनाव में मानवेन्द्र ने कर्नल सोनाराम से अपनी हार का बदला लेते हुए उन्हें रिकॉर्ड मतों से हराया. उसके बाद 2009 में कांग्रेस के हरीश चौधरी और बीजेपी के मानवेन्द्र सिंह में मुकबला हुआ. इस चुनाव में हरीश चौधरी बाजी मार ले गए.

मोदी लहर की चपेट में आए सिंह
2014 के चुनाव से पहले सोनाराम कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए और उसके बैनर पर चुनाव मैदान में उतरे. इस पर पार्टी से बगावत कर चुनाव मैदान में उतरे पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह मोदी लहर में कर्नल सोनाराम से चुनाव हार गए. पार्टी की पिता के प्रति बेरुखी और उनकी हार की कसक आज भी मानवेन्द्र अपने मन में दबाए बैठे हैं. इस बार वे इसका बदला लेने के लिए जी-जान से क्षेत्र में जुटे हुए हैं. अब देख्रना यह कि कांग्रेस उन भरोसा करती या नहीं.

परंपरागत मुद्दे हावी हैं
लोकसभा क्षेत्र में कोई नए मुद्दे नहीं हैं. लंबे चौड़े भू-भाग में फैले इस क्षेत्र में आज भी अकाल प्रबंधन, पेयजल, रोजगार, रेल सेवाएं और बिजली जैसे परंपरागत मुद्दे हैं। यहां सबसे बड़ी लड़ाई 'मूंछ की लड़ाई' है.

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