मानवेन्द्र सिंह- पिता की हार का बदला लेने के लिए डटे हैं चुनाव मैदान में

प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक राजनीति के हॉट केक बने बाड़मेर पर इस बार सभी की निगाह टिकी है. वजह है मानवेन्द्र सिंह.

Sandeep Rathore | News18 Rajasthan
Updated: May 15, 2019, 6:42 PM IST
मानवेन्द्र सिंह- पिता की हार का बदला लेने के लिए डटे हैं चुनाव मैदान में
मानवेन्द्र सिंह। फाइल फोटो।
Sandeep Rathore
Sandeep Rathore | News18 Rajasthan
Updated: May 15, 2019, 6:42 PM IST
प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक राजनीति के हॉट केक बने बाड़मेर पर इस बार सभी की निगाह टिकी है. वजह है मानवेन्द्र सिंह. बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे पूर्व विदेश एवं रक्षा मंत्री जसवंत सिंह जसोल के पुत्र मानवेन्द्र करीब नौ महीने पहले उस समय सबसे ज्यादा सुर्खियों में आए जब उन्होंने पचपदरा में स्वाभिमान रैली कर 'कमल का फूल, हमारी भूल' कहते हुए बीजेपी का दामन छोड़ा था.

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मानवेन्द्र सिंह इस बार कांग्रेस से बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी हैं. बाड़मेर के जसोल गांव निवासी करीब 45 वर्षीय मानवेन्द्र सिंह के लिए राजनीति का क्षेत्र कोई नया नहीं है. 19 मई 1964 को जोधपुर में जन्मे मानवेन्द्र बचपन से घर पर राजनीतिक गतिविधियां देखकर ही बड़े हुए हैं. पिता जसवंत सिंह बीजेपी के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे हैं. विदेश एवं रक्षा जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके जसवंत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बेहद नजदीकी रहे हैं. देश के विभिन्न इलाकों से लोकसभा का चुनाव जीत चुके जसवंत सिंह का जब 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने टिकट काटा तभी से इस परिवार की पार्टी से दूरियां बढ़ने लग गई थी.



अंग्रेजी तो सीखी, लेकिन अंग्रेजीयत से दूर रहे
प्रतिष्ठित मेयो कॉलेज समेत अमेरिका तथा लंदन में पढ़ाई करने वाले मानवेन्द्र सेना से भी जुड़े. इन सबके दौरान उन्होंने फर्राटेदार अंग्रेजी तो सीखी, लेकिन अंग्रेजीयत से दूरी रखी. विदेशों में पढ़ने के बावजूद उनका धोरों से प्रेम कभी खत्म नहीं हुआ. ठेठ बाड़मेरी लिबास पहनने वाले मानवेन्द्र ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने बाद पिता की राह पर चलकर राजनीति में कदम रखा. राजनीति में आने से पहले वो स्टेट्समैन और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों में पत्रकार रह चुके हैं.

रिकॉर्ड मतों से चुनावी हार का बदला लिया
1999 में बीजेपी के सिंबल पर लोकसभा का पहला चुनाव अपने गृहक्षेत्र बाड़मेर-जैसलमेर से लड़ा, लेकिन कांग्रेस के सोनाराम से हार गए. मानवेन्द्र चुनाव जरूर हार गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. 2003 के लोकसभा चुनाव में वापसी करते हुए मानवेंद्र ने करीब पौने तीन लाख वोटों के रिकॉर्ड अंतर से सोनाराम को हराकर अपना बदला ले लिया. इस चुनाव में मानवेंद्र सिंह ने सबसे ज्यादा मतों से जीतने का रिकॉर्ड बनाया.



पार्टी की परवाह छोड़कर दिया पिता का साथ
उसके बाद 2014 में वो बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से विधायक बने. लेकिन उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जसवंत सिंह का टिकट काट दिया तो वो बागी हो गए और निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गए. इस पर मानवेन्द्र ने पार्टी की परवाह छोड़कर पिता के लिए प्रचार किया तो पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर दिया.



स्वाभिमान का झंडा बुलंद कर समर्थकों को किया एकजुट
करीब पांच साल तक पार्टी में दरकिनार रहने के बाद मानवेन्द्र ने स्वाभिमान का झंडा बुलंद कर अपने समर्थकों को एकजुट किया. विधानसभा चुनाव-2018 से करीब दो माह पहले सितंबर में बाड़मेर के पचपदरा में स्वाभिमान रैली का आयोजन किया. इस रैली में मानवेन्द्र ने 'कमल का फूल, हमारी भूल' कहते हुए बीजेपी को अलविदा कह दिया. इससे मारवाड़ की राजनीति में हलचल मच गई. खासतौर पर बाड़मेर जिला प्रदेश की राजनीति का हॉट केक बन गया. इसके साथ ही वहां के राजनीतिक समीकरण भी बदल गए.

सीएम राजे एवं मानवेन्द्र सिंह।


वसुंधरा राजे से मुकाबला करने झालरापाटन से उतारा
उसके कुछ समय बाद मानवेन्द्र ने कांग्रेस का हाथ थामा. कांग्रेस ने सुर्खियों में आए मानवेन्द्र को विधानसभा चुनाव में तत्कालीन सीएम वसुंधरा राजे को घर में ही घेरने के लिए उनके सामने झालरापाटन विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा. हालांकि मानवेन्द्र को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने राजे की जीत के अंतर को जरूर कम दिया.

फाइल फोटो।


पिता की हार का बदला लेने के लिए डटे हैं चुनाव मैदान में
उसके बाद अब कांग्रेस ने पिता की हार का बदला लेने के लिए मानवेन्द्र को बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा है. बीजेपी ने गत लोकसभा चुनाव में जिन कर्नल सोनाराम के लिए जसवंत सिंह का टिकट काटा था, बदली हुई परिस्थितियों में इस बार उनका टिकट काटकर नए चेहरे के तौर पर कैलाश चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मानवेन्द्र अपनी पिता की हार बदला ले पाएंगे या नहीं.

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