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दिवाली स्पेशल: मिट्टी के दीए पर भारी पड़ी इलेक्ट्रॉनिक लाइट, कुम्हारों के रोजगार पर पड़ी आधुनिकता की मार

Shiv Kumar Vashishth | News18 Rajasthan
Updated: October 22, 2019, 3:05 PM IST
दिवाली स्पेशल: मिट्टी के दीए पर भारी पड़ी इलेक्ट्रॉनिक लाइट, कुम्हारों के रोजगार पर पड़ी आधुनिकता की मार
दीपावली से पूर्व भरतपुर में कुम्भकार मिटटी के दिए बनाने में जुटे

दीपों के त्यौहार दीपावली पर घर-घर में मिट्टी के दीपक में तेल और बाती से जगमग रोशनी हुआ करती थी वह अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. फिर भी भरतपुर जिले में कुम्भकार अपने परिवारवाद की परम्परा को निभाते आ रहे हैं

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भरतपुर. दीपों के त्यौहार दीपावली (Deepawali) पर घर-घर में मिट्टी के दीपक में तेल और बाती से जगमग रोशनी हुआ करती थी वह अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. फिर भी भरतपुर जिले में कुम्भकार (potters) अपने परिवारवाद की परम्परा को निभाते आ रहे हैं और आम लोग भी अभी पूर्व परम्परा को लेकर मिट्टी के दीयों (Clay lamps) को ही महत्ता दे रहे हैं.

कुम्हार मिट्टी के दिए बनाने में जुटे

दीपावली का त्यौहार आते ही कुम्हारों को आस रहती है कि उनके जरिए बनाये जाने वाले मिट्टी के दीपकों की अब बिक्री होनी शुरू हो जाएगी और उनके परिवार कर पालन पोषण ठीक ढंग से होने के अलावा उनकी भी दीवाली (diwali)खुशीपूर्वक मन जाएगी. इसी आस को लेकर भरतपुर में दीपावली से पूर्व ही कुम्हार मिट्टी के दिए बनाने में जुट गए है पर जहां कभी पांच दिवसीय दीपों के त्यौहार दीपावली के पर्व पर हर किसी का घर दीयों से जगमग रहता था, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में अब यह पर्व बीते जमाने की बात माने जाने लगा है.

दीपावली के पर्व पर कुम्हार चाक चलाकर दीए जलाने में लगे
दीपावली के पर्व पर कुम्हार चाक चलाकर दीए जलाने में लगे


चाइनीज लाइट की तरफ लोग हुए आकर्षित

दीपावली पर्व पर अब लोग अपने घरों को सजाने में इलैक्ट्रानिक आइटम का प्रयोग करने लगे हैं, लेकिन घर के बुजुर्ग सुख समृद्धि के लिये मिट्टी के दीयों को ही महत्व देते है और पुराने कुम्भकार भी अपने ग्राहकों के लिये इस परिपाटी को निभा रहे हैं. हालांकि अभी दीवाली आने में अभी 5 दिन बाकी है, लेकिन कुम्हार चाक चलाकर दीये बना रहे है ताकि उन्हें इन दीयों को बेचकर उनका घर चल सके.

 आधुनिक समय में मिट्टी के दीए बनाने की परंपरा हो रही खत्म 
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भरतरपुर के कुम्भकार यादराम का कहना है कि जहां पहले मुफ्त में ही मिटटी मिल जाती थी, वहीं मिटटी अब 2 से ढाई हजार हजार रुपए ट्रॉली खरीदकर लानी पड़ रही है. साथ ही साथ धीरे-धीरे दीप बनाने की परंपरा भी खत्म होती जा रही है. नई पीढ़ी अब मिटटी के बर्तन के साथ अन्य सामान भी बनाने से परहेज करने लगे हैं.

कुम्भकार को सरकार से लगी आस

कुम्भकार हमेशा की तरह सरकार से भी इस बार भी आस लगा रहे है कि उनके परंपरागत पुश्तैनी काम को बढ़ाने के लिए सहयोग करें, ताकि उनकी कला जीवित रहे. गरीबी की मार झेल रहे कुम्हार अब तो मजदूरी करने के लिए दूसरों पर आश्रित रहने लग गए है. उनका मानना है कि यदि सरकार उनकी मदद करे तो उनकी कला जीवित रह सकती है.

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First published: October 22, 2019, 3:05 PM IST
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