भरतपुर का लोहागढ़: तोपों के गोले हुए बेअसर, अंग्रेजों ने भी घुटने टेके, यहां पढ़ें- 10 रोचक तथ्य

भरतपुर किला.

भरतपुर किला.

Rajasthan Special Story: राजस्थान का सिंहद्वार है भरतपुर. पूर्वी सीमांत का प्रहरी भरतपुर का दुर्ग बना चाहे मिट्टी-चूने-पत्थर से हो, लेकिन यह आयरन-फोर्ट रणभूमि में लोहे से भी मजबूत है और इसने बड़े-बड़े दुश्मनों से जमकर लोहा लिया है.

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हरीश मलिक

जयपुर. राजस्थान का सिंहद्वार है भरतपुर. पूर्वी सीमांत का प्रहरी भरतपुर का दुर्ग बना चाहे मिट्टी-चूने-पत्थर से हो, लेकिन यह आयरन-फोर्ट रणभूमि में लोहे से भी मजबूत है और इसने बड़े-बड़े दुश्मनों से जमकर लोहा लिया है. राजस्थान में कई ऐसे किले और महल हैं जो अपनी सुंदरता और वीरता से भरी कहानियों के कारण लोगों में आकर्षण का केंद्र हैं. लेकिन लोहागढ़ वह दुर्ग है, जिसने अंग्रेजों के कई आक्रमण झेलने के बावजूद अंग्रेजों का मान-मर्दन कर उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

इस किले का निर्माण जाट शासक महाराजा सूरजमल ने सन 1733 में शुरू कराया था. दूसरी रियासतों के दुर्गों की कमियों को देखते रखते हुए महाराजा सूरजमल ने उस समय की ज़रुरत के हिसाब से ऐसे इंतजाम कराए कि दुश्मन के गोले दुर्ग को न भेद सकें. किले का निर्माण आठ साल में पूरा हुआ. इस दुर्ग में परिवर्तन, रूपांतरण और विस्तार का काम सूरजमल के पौत्र के प्रपौत्र महाराजा जसवंत सिंह तक चलता रहा.

लोहागढ़ के बारे में 10 रोचक तथ्य


मिट्टी से ढंकी दीवारें और खाई में मगरमच्छ: महाराजा सूरजमल ने दुर्ग को इतनी कुशलता से डिजाइन कराया था कि शत्रु हमला कर दें तो उनके सारे प्रयास विफल हो जाएं. दरअसल, मुख्य किले की दीवारें 100 फुट उंची थी और इनकी चौड़ाई 30 फुट थी। इनका मोहरा पत्थर, ईंट, चूने से बना था, बाकी हिस्सा केवल मिट्टी से ढंका गया था, जिससे दुश्मनों की तोप के गोले और बंदूक की गोलियों इस मिट्टी में धंस जाती थीं. किले के चारों तरफ सुरक्षा के लिए दो खाई बनवाई गई थीं. बाहर की खाई के अलावा एक भीतरी खाई थी, जो 175 फीट चौड़ी और 40 फुट गहरी थी. जिसमें पानी भर दिया गया था. इतना ही नहीं कोई दुश्मन तैरकर भी किले तक न पहुंचे इसलिए इस पानी में मगरमच्छ छोड़े जाते थे.
चार माह में पांच बार हमला पर दुर्ग अजेय रहा: इस किले पर कब्जा जमाने के लिए अंग्रेजों ने 10 से ज्यादा बार आक्रमण किया था. अंग्रेजों ने सबसे जोरदार हमला सन 1805 में किया. भरतपुर के शासक रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के शत्रु जसवंत राव होल्कर को अपने यहां शरण दी थी. तब अंग्रेज सेनापति लेक ने रणजीत सिंह को सबक सिखाने के लिए विशाल सेना के साथ दुर्ग को घेर लिया. विशाल मात्रा में तोपखाने के अलावा उसकी सेना में एक हजार से ज्यादा प्रशिक्षित घुड़सवार शामिल थे. तब चार माह में पांच बार दुर्ग पर जबर्दस्त आक्रमण किए गए. ब्रिटिश तोपों ने जो गोले बरसाए वे या तो मिट्टी की बाहरी दीवार में धंसकर शांत हो गए या फिर किले के उपर से निकल गए.
हार मानकर अंग्रेजों को करनी पड़ी संधि: अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी यह दुर्ग अभेद्य रहा. विवश होकर अंग्रेजों ने घुटने टेक दिए और उन्हें संधि करनी पड़ी. अंग्रेजों को 17 अप्रैल 1805 को किले से घेरा हटाना पड़ा. अंग्रेजों कीइस परायज से भारतीयों का उत्साह बढ़ा. तब इस लोकगीत में लोगों की भावना अभिव्यक्त हुई-गोरा हट जा रे, जे राज भरतपुर को. अंग्रेजों को अपनी पराजय का बदला लेने का मौका महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद ही मिला. 1826 ई. में राजघराने की आंतरिक कलह का फायदा उठाकर विशाल सेना की मदद से दुर्ग पर अधिकार जमा लिया.
दस दरवाजे और 250 फीट चौड़ी खाई: कुंवर नटवर सिंह अपनी किताब महाराजा सूरजमल में लिखते हैं- "यह किला कई लिहाज़ से असाधारण रचना थी. इसकी बाहर वाली खाई 250 फीट चौड़ी और 20 फीट गहरी थी. इस खाई की खुदाई से जो मलबा निकला, वह उस 25 फीट उंची और 30 फीट मोटी दीवार को बनाने में लगा, जिसने शहर को पूरी तरह घेरा हुआ था." इसमें दस बड़े-बड़े दरवाजे थे। उनके नाम हैं-मथुरापोल, वीरनारायणपोल, अटलबंदपोल, नीमपो, अनाहपोल, कुम्हेरपोल, चांदपोल, गोवर्धनपोल, जघीनापोल और सूरजपोल.
लूट लाए थे मुगलों का शाही खजाना: लोहागढ़ दुर्ग के दो विशाल दरवाजे हैं। इनमें से दक्षिण द्वार लोहिया दरवाजा और उत्तरी द्वार अष्टधातु दरवाजा कहलाता है. वर्ष 1765 में भरतपुर के महाराजा जवाहर सिंह ने अपने पिता महाराजा सूरजमल की मौत का बदला लेने के लिए दिल्ली के शासक नजीबुद्दौला पर आक्रमण कर दिया था. तब इस भव्य और कलात्मक अष्टधातु के दरवाजे और मुगलों के शाही खजाने को लूटने के बाद लालकिले से उतार लाए थे. जनश्रुति यह भी है कि अष्टधातु का दरवाजा पहले चित्तौड़ दुर्ग में लगा था, जिसे अलाउदृदीन खिलजी उतारकर दिल्ली ले आया था.
अष्टधातु के दरवाजे का वजन 20 टन: यहां आने के बाद महाराजा जवाहर सिंह ने चित्तौड़ के शासक को संदेश भेजा कि यदि वे चाहें तो अपनी राजपूती शान के प्रतीक दरवाजे को ले जा सकते हैं. वहां से कोई इसे लेने नहीं आया तो महाराजा ने यह ऐतिहासिक दरवाजा भरतपुर के किले के उत्तर द्वार पर लगवा दिया. ये दरवाजा आज भी जाट वीरों की बहादुरी और जिंदादिली की कहानी सुनाता है. अष्टधातु का दरवाजा करीब 20 टन वजन का है. इसमें करीब 6 टन अष्टधातु लगी है. चूंकि अष्टधातु में सोना भी शामिल होता है इसलिए इसकी सुरक्षा के लिए पुरातत्व विभाग ने लोहे की सुरक्षा जाली लगा रखी है.
अंग्रेजों पर जीत का प्रतीक फतेहबुर्ज: भरतपुर दुर्ग की सुदृढ़ प्राचीर में आठ विशाल बुर्जे और 40 अर्द्धचंद्राकार बुर्जे हैं. किले की आठ बुर्जों में सबसे प्रमुख जवाहर बुर्ज महाराजा जवाहर सिंह की दिल्ली विजय की स्मृति में है. भरतपुर राज्य के जाट राजवंश के राजाओं का राज्याभिषेक जवाहर बुर्ज में होता था. ब्रिटिश सेना पर विजय की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए फतेहबुर्ज का निर्माण 1806 ई. कराया गया. किले की अन्य बुर्जों में सिनसिनी बुर्ज, भैंसावाली बुर्ज, गोकालु बुर्ज, कालिका बुर्ज, बागरवाली बुर्ज, गोकालु बुर्ज, कालिका बुर्ज, बागरवाली बुर्ज और नवलसिंह बुर्ज उल्लेखनीय हैं.
सूरजमल के इस महल में जाट शैली: लोहागढ़ किले में महल खास, कामरा महल और बदन सिंह का महल नाम के तीन महल शामिल हैं. इस किले संरचना में अन्य स्मारक जैसे किशोरी महल, महल खास और कोठी खास भी शामिल हैं. महल खास का निर्माण महाराजा सूरजमल ने ही करवाया जो 1730 और 1850 के दौरान किले में जाटों के बनाए गए तीन महलों में से एक था. इस महल खास में घुमावदार छत और बालकनी भी है जो शानदार नक्काशी से बनी है और जाट शैली की विशेषता है.
कामरा पैलेस में अब संग्रहालय: कामरा पैलेस को सभी कवच और खजाने को संग्रहीत करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब यहां पर सरकारी संग्रहालय है. इस संग्रहालय में जैन मूर्तियां, शिव की नटराज मूर्ति, लाल बलुआ पत्थर का शिवलिंग, यक्ष की नक्काशीदार मूर्ति, हथियारों का संग्रह है. इसके अलावा कई पांडुलिपियां हैं जो अरबी और संस्कृत में लिखी गई हैं, इस पैलेस में छोटे कक्ष और अलंकृत पत्थर की खिड़कियां हैं, और फर्श संगमरमर के हैं.
राजाओं की पसंदीदा शिकारगाह केवलादेव: लोहागढ़ दुर्ग से दस किमी दूरी पर है केवलादेव घना राष्ट्रीय पक्षी उद्यान. यह उद्यान भरतपुर के महाराजाओं की पसंदीदा शिकारगाह था, जिसकी परम्परा 1850 से भी पहले से थी. यहाँ पर ब्रिटिश वायसराय के सम्मान में पक्षियों के सालाना शिकार का आयोजन होता था. 1938 में एक ही दिन में हजारों पक्षियों का शिकार किया गया. मेलोर्ड एवं टील जैसे पक्षी बहुतायत में मारे गए. इस पक्षीविहार का निर्माण 250 साल पहले किया गया था और इसका नाम केवलादेव (शिव) मंदिर के नाम पर रखा गया था. महाराजा सूरजमल ने यहां अजान बांध का निर्माण करवाया, यह बांध दो नदियों गंभीर और बाणगंगा के संगम पर बनाया गया था.
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