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देशनोक: विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर जहां 20 हजार से ज्यादा चूहे हैं, असीम आस्था का केंद्र है करणी माता मंदिर

बीकानेर-जोधपुर रेल मार्ग पर स्थित देशनोक रेलवे स्टेशन के पास ही मंदिर है. इसके अलावा बीकानेर से आधे घंटे में ही टैक्सी, जीप, बस आदि से आसानी से देशनोक करणी माता मंदिर तक पहुंचा जा सकता है.

बीकानेर-जोधपुर रेल मार्ग पर स्थित देशनोक रेलवे स्टेशन के पास ही मंदिर है. इसके अलावा बीकानेर से आधे घंटे में ही टैक्सी, जीप, बस आदि से आसानी से देशनोक करणी माता मंदिर तक पहुंचा जा सकता है.

World famous Deshnok Karni Mata Temple: करणी माता को चूहाें वाली देवी भी कहा जाता है. यहां चूहों को काबा (Kaaba) के नाम से संबोधित किया जाता है. पूरे मंदिर प्रांगण में 20-25 हजार से ज्यादा चूहे रहते हैं. लेकिन ये किसी भी श्रद्धालु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते.

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हरीश मलिक

बीकानेर. बीकानेर (Bikaner) जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दक्षिण दिशा में देशनोक (Deshnok) विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां 20 से 25 हजार से ज्यादा चूहे (Rats) हैं. यहां में सफेद चूहों का दर्शन शुभ माना जाता है. भक्त इन चूहों को 'काबा' के नाम से पुकारते हैं. करणी मां के ज्योतिर्लीन होने के बाद साढ़े छह सौ से ज्यादा वर्षों से मंदिर और गुफा में निर्बाध पूजा हो रही है. यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि अगर कोई देपावत चारण मरता है तो वह करणी माता के मंदिर (Karni Mata Temple) में चूहा बनकर पैदा होता है. देपावत करणी माता के पारिवारिक सदस्य हैं. मं​दिर परिसर में हजारों चूहे हैं. इनमें कई सफेद चूहे भी हैं. जनश्रुति के अनुसार सफेद चूहा दिखाई देने पर मनवांछित कामना पूरी हो जाती है. सुबह मंगला आरती और संध्या आरती के समय चूहों का जुलूस तो देखने लायक होता है.

बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने राजपूती शैली में करणी माता मंदिर का निर्माण करवाया था. मंदिर के मुख्य द्वार पर चांदी के दरवाजे, करणी माता के लिए सोने का छत्र, चूहों के प्रसाद के लिए चांदी की बड़ी परातें और सफेद चूहे भव्य मंदिर का आकर्षण हैं. करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी हैं. सफेद चूहों को माता का वाहन माना जाता है. इसलिए देशनोक मंदिर में सफेद चूहों को लेकर श्रद्धालुओं में बड़ी आस्था है. यहां रहने वाले चूहों को काबा कहा जाता है. इन चूहों की उपस्थिति की वजह से ही श्री करणी देवी का यह मंदिर चूहों वाले मंदिर के नाम से भी विख्यात है.



बेहद शुभ माना जाता है सफेद चूहों (काबा) का दर्शन
पूरे मंदिर प्रांगण में 20-25 हजार से ज्यादा चूहे रहते हैं. वे श्रद्धालुओं के आस-पास पैरों पर कूद-फांद करते हैं, लेकिन किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते. चील, गिद्ध और दूसरे जानवरों से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानों पर ऊपर बारीक जाली लगी हुई है. ऐसी मान्यता है कि किसी श्रद्धालु को यदि यहां सफेद चूहे के दर्शन होते हैं, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है. चूहों की बहुतायत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि श्रद्धालुओं को पैदल चलने के लिए अपना अगला कदम उठाकर नहीं बल्कि जमीन पर घसीटते हुए आगे रखना होता है. लोग इसी तरह कदमों को घसीटते हुए करणी मां की मूर्ति के सामने पहुंचते हैं.

साढ़े छह शताब्दी पुरानी है गुफा
श्रद्धालुओं का मत है कि करणी देवी साक्षात मां जगदम्बा की अवतार थीं. नवरात्रों में मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ता है. वर्तमान में जिस स्थान पर संगमरमर का यह भव्य मंदिर है वहां लगभग साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व एक गुफा में रहकर मां अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना किया करती थीं. यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है. करणी माता के ज्योर्तिलीन होने पर उनकी मूर्ति की इस गुफा में स्थापना की गई. बताते हैं कि मां करणी के आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर राज्य की स्थापना हुई थी.

करणी माता की कथा व इतिहास

रिद्धाबाई बनी करणी
विक्रमी संवत 1444 अश्विनी शुक्ल सप्तमी तदनुसार सन 1387 में मारवाड़ के सुवाप गांव में मेहाजी चारण के घर छटवीं बेटी का जन्म हुआ. उसका नाम रखा गया रिद्धा बाई. लोक मान्यता है कि रिद्धा बाई ने किशोर काल में अपनी बुआ को स्पर्श करके उनकी टेढ़ी अंगुली को ठीक कर दिया था. तभी बुआ ने उनको करणी नाम दिया. करणी का मतलब है चमत्कारी.

विवाह के बाद गृहस्थ त्यागा
करणी की शादी उसके पिता ने साठिका गांव के दीपोजी चारण से की. करणी ने साफ कहा कि शादी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है और उन्होंने अपनी छोटी बहन गुलाब का विवाह दीपोजी से करवा दिया. खुद को गृहस्थ से अलग रखा. उस दौरान मारवाड़ में अकाल पड़ने के कारण दीपोजी ने जांगलू के एक गांव में डेरा डाला. जांगलू राजस्थान का पश्चिमी इलाका है. वर्तमान में इस इलाके को बीकानेर, चूरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर के नाम से जानते हैं. तब इस इलाके में कानजी का शासन चलता था.

साधारण महिला से करणी माता
कानजी के सैनिकों ने करणी और उनके मवेशियों को पानी पीने से रोक दिया. कानजी ने करणी को उसका राज्य छोड़कर जाने का आदेश दिया. करणी ने कहा कि अगर वो उनकी पूजा की पेटी को बैलगाड़ी में रख देता है तो वह राज्य छोड़कर चली जाएगी. लाख कोशिशों के बाद भी कानजी इसमें सफल नहीं हुआ. करणी ने जमीन पर एक लकीर खींची और कानजी से कहा कि यह उसकी जीवनरेखा है. यदि वो इसे पार करता है तो मारा जाएगा. चेतावनी के बावजूद कानजी ने उसे पार किया और कुछ समय बाद मारा गया. करणी ने कानजी के छोटे भाई रिडमल राव को जांगलू का राजा घोषित कर दिया. इस सारे वाकये ने करणी को साधारण महिला से करणी माता बना दिया.

राव जोधा की मदद की
कालांतर में राव रिडमल मेवाड़ राज्य के राणा मोकल के पास बा-हैसियत सेनापति काम करने लगे. मोकल के बाद उनके बेटे राणा कुंभा ने दरबारी षडयंत्र के चलते रिडमल की हत्या करवा दी. रिडमल के बेटे राव जोधा को वहां से जान बचाकर भागने पर मजबूर होना पड़ा. वो महज सात घुड़सवारों के साथ जांगलू में करणी माता के पास पहुंचा. करणी माता ने बुरे वक्त में उसकी मदद की और फिर शक्ति एकत्रित करने के लिए प्रेरित किया. उसने धीरे-धीरे मारवाड़ के क्षेत्रों पर कब्जा करना शुरू किया और 15 साल बाद 1453 में फिर से मंडोर पर काबिज हो गया.

मेहरानगढ़ की नींव रखी
कुछ साल बाद जोधा ने मंडोर को बहुत सुरक्षित न मानकर वहां से करीब नौ किलोमीटर दूर चिड़ियाटूक की पहाड़ी पर नई राजधानी बनाने का फैसला लिया. जोधा की करणी माता में गहरी श्रद्धा थी. 12 मई 1459 को करणी माता देशनोक से चिड़ियाटूक की पहाड़ी पर मेहरानगढ़ किले की नींव रखने आईं.

बीकाजी की भी सहायता
जनश्रुति के अनुसार राव जोधा से नाराज होकर उसके छोटे बेटे बीका ने 1465 में मेहरानगढ़ छोड़ दिया. बीका 100 घुड़सवारों के अपने लश्कर के साथ उसी जांगलू में पहुंचा, जहां कभी करणी माता ने उसके दादा और फिर पिता की मदद की थी. करणी माता की सलाह पर बीका ने जांगलू के आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा करना शुरू किया. यह वही जांगलू है जिसका जिक्र महाभारत काल में जांगल देश के रूप में आता है.

बीकानेर किले की नींव रखी
धीरे-धीरे बीका के प्रभाव के छोटे-छोटे गणराज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार ली. कुछ बरसों में बीका 25 सौ गावों पर शासन करने लगा. गांवों पर कब्जे के बाद बीका को नई राजधानी की जरूरत महसूस हुई. उसने 1485 में बीकानेर में किले की नींव रखने के लिए देशनोक से करणी माता को बुलवाया. एक तरह से मरुप्रदेश के दो बड़े राजपूत घरानों को स्थापित करने में करणी माता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

देपावत चारण बने पुजारी
करणी माता की बहन गुलाब और दीपोजी चारण के चार लड़के हुए. करणी माता इन चारों को अपने बच्चों की तरह प्यार करती थीं. इन चारों लड़कों के वंशज देपावत चारण के नाम से जाने गए. करणी माता के जाने के बाद यह लोग उनके मंदिर के पुजारी बने. देशनोक में आज भी देपावत चारणों के चार मोहल्ले हैं. करणी माता ने मानव मात्र एवं पशु-पक्षियों के संवर्द्धन के लिए देशनोक में दस हजार बीघा 'ओरण' (पशुओं की चराई का स्थान) की स्थापना कराई थी.

कैसे पहुंचें करणी माता मंदिर
बीकानेर-जोधपुर रेल मार्ग पर स्थित देशनोक रेलवे स्टेशन पर के पास ही मंदिर है. इसके अलावा बीकानेर से आधे घंटे में ही टैक्सी, जीप, बस आदि से आसानी से देशनोक करणी माता मंदिर तक पहुंचा जा सकता है.
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