चूरू लोकसभा क्षेत्र- यहां मुद्दों पर नहीं जाति और पार्टी पर लगता है ठप्पा, मुकाबला कड़ा

प्रदेश में सबसे ज्यादा सर्दी और सबसे ज्यादा गर्मी के लिए मशहूर शेखावाटी अंचल का चूरू लोकसभा क्षेत्र का रण इस बार कई मायनों में खास है. वजह क्षेत्र में वंशवाद की शुरुआत. यहां दोनों ही प्रत्याशी राजनीतिक परिवारों से हैं.

News18 Rajasthan
Updated: May 13, 2019, 3:54 PM IST
चूरू लोकसभा क्षेत्र- यहां मुद्दों पर नहीं जाति और पार्टी पर लगता है ठप्पा, मुकाबला कड़ा
चूरू फोर्ट। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।
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Updated: May 13, 2019, 3:54 PM IST
प्रदेश में सबसे ज्यादा सर्दी और सबसे ज्यादा गर्मी के लिए मशहूर शेखावाटी अंचल का चूरू लोकसभा क्षेत्र का रण इस बार कई मायनों में खास है. वजह क्षेत्र में वंशवाद की शुरुआत. यहां दोनों ही प्रत्याशी राजनीतिक परिवारों से हैं. चूरू लोकसभा क्षेत्र पर कभी भी किसी एक दल के कब्जा में नहीं रहा है. बीजेपी और कांग्रेस के अलावा जनता दल और जनता पार्टी भी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुकी हैं.

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चूरू जिले के चूरू, रतनगढ़, सरदारशहर, सुजानगढ़, सादुलपुर और तारानगर समेत हनुमानगढ़ जिले के नोहर व भादरा विधानसभा क्षेत्रों को समाहित करने वाले इस क्षेत्र में अब वंशवाद और जातीय राजनीति जोर पकड़ गई है. यहां इस बार चुनाव में परिवारवाद का बोलबाला है. इस सीट पर किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि जाति विशेष का कब्जा रहा है. यहां हमेशा से ही जाट जाति का मजबूत दावा व कब्जा रहा है. गत पांच लोकसभा चुनावों को देखें तो यहां जाट जाति का प्रत्याशी ही सांसद चुना जा रहा है.

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चूरू शहर। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।


चार बार से पिता-पुत्र हैं सांसद
इनमें लगातार चार बार से तो बीजेपी से पिता-पुत्र ही सांसद रहे हैं. क्षेत्र के मौजूदा सांसद राहुल कस्वां से पहले के तीन कार्यकाल उनके पिता रामसिंह कस्वां के नाम रहे हैं. उसके बाद अब राहुल फिर दुबारा चुनाव मैदान में हैं. राहुल के सामने इस बार 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके पिता से मात कांग्रेस के रफीक मंडेलिया डटे हुए हैं. रफीक मंडेलिया का यह तीसरा चुनाव है. रफीक 2009 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद हाल ही में विधानसभा चुनाव में चूरू विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के राजेन्द्र राठौड़ को चुनौती देने मैदान में उतरे थे, लेकिन हार गए थे. मंडेलिया के पिता मकबूल मंडेलिया भी चूरू विधानसभा क्षेत्र से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं. उनमें से वे एक बार जीते और एक बार हार
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बीजेपी प्रत्याशी राहुल कस्वां। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।


मुद्दों पर नहीं जाति और पार्टी पर पड़ते हैं वोट
क्षेत्र में मुद्दों के नाम पर यहां कभी कोई बड़ा मु्द्दा हावी नहीं रहा. क्षेत्र में रेल सेवा का विस्तार, रोजगार के लिए औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और नहरी पानी की मांग समेत फ्लोराइड की समस्या का समाधान ही यहां लंबे समय से मुद्दे बने हुए हैं. बाकी वोट जाति व पार्टी के नाम पर ही पड़ते आए हैं.

कांग्रेस प्रत्याशी रफीक मंडेलिया। फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।


एक बार ही गैर जाट उम्मीदवार जीत पाया है यहां
करीब पांच लाख जाट, पौने चार लाख ओबीसी और दो लाख दस हजार मुस्लिम मतदाताओं वाले क्षेत्र में कुल 20 लाख से अधिक मतदाता हैं. क्षेत्र में 10,49,440 पुरुष और 9,52,275 महिला मतदाता हैं. 1977 में अस्तित्व में आई इस सीट पर एक बार ही गैर जाट उम्मीदवार चुनाव जीत पाया है. अन्यथा हर बार जाट जाति के प्रत्याशी ने ही यहां जीत का परचम लहराया है. गत पांच लोकसभा चुनावों की बात करें तो यहां लगातार चार बार से बीजेपी काबिज है. उससे पहले यह सीट कांग्रेस के कब्जे में रही थी. इस बार मुकाबला कड़ा है.

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इस बार परिस्थितियां अलग हैं
इस बार लोकसभा चुनाव में क्षेत्र की परिस्थितियों में काफी बदलाव है. गत लोकसभा चुनाव के समय क्षेत्र की आठ में से 6 सीटों पर बीजेपी, 2 पर कांग्रेस और 1 पर बसपा का कब्जा था. लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में यह तस्वीर बदल चुकी है. वर्तमान में यहां 5 सीटों पर कांग्रेस, 2 पर बीजेपी और 1 सीट पर सीपीएम का कब्जा है.

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First published: May 13, 2019, 3:23 PM IST
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