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राजस्थान में बना था देश के पहले तिरंगे का कपड़ा, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर फहराया था झंडा

दौसा में कई बार तिरंगे की प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की कार्य योजना तैयार की गई है लेकिन यहां का पानी फ्लोराइड युक्त होने के कारण प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित नहीं हो सकी.

दौसा में कई बार तिरंगे की प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की कार्य योजना तैयार की गई है लेकिन यहां का पानी फ्लोराइड युक्त होने के कारण प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित नहीं हो सकी.

राजस्थान के दौसा जिले में आजाद भारत के पहले तिरंगे का कपड़ा बनकर हुआ था. फालूदा के चौथमल बुनकर ने इस कपड़े को तैयार किया था. 1947 में दौसा से बने इस तिरंगे को लाल किले पर फहराया गया था. हालांकि यह बात भी सामने आती है कि 15 अगस्त 1947 को देश के अलग-अलग हिस्सों से चार तिरंगे बनकर आए थे. इस बात की पूरी तरह पुष्टि नहीं हो पाती है कि इन चार में से कौन सा तिरंगा पहनाया गया था. लेकिन देश की आजादी के बाद समय-समय पर चौथमल बुनकर को राष्ट्रीय स्तर पर याद किया गया. जिससे यह माना गया कि आलूदा के चौथमल बुनकर के द्वारा तैयार किए गए कपड़े के ध्वज को ही लाल किले पर पहनाया गया था.

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दौसा. पूरा देश आजादी का 75वां महोत्सव मना रहा है. हर कोई जश्न में डूबा हुआ है और गौरवान्वित भी है. 75 वर्ष पहले 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ था तब लाल किले पर तिरंगा झंडा बनाया गया था. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के द्वारा 15 अगस्त 1947 को बनाए गए तिरंगे वह आखिर किसने बनाया था और वह दिल्ली के लाल किले तक कैसे पहुंचा. तिरंगे के इतिहास की बात करेंगे तो राजस्थान के दौसा जिले का नाम जरूर आएगा. देश की आजादी से पहले ही दौसा जिले के अनेक बुनकर कपड़ा बनाने का काम करते थे. जैसे ही वर्ष 1947 में देश आजाद हुआ और पूरे देश में जश्न का माहौल था तो 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर तिरंगा ध्वज पहनाने के लिए दौसा से तिरंगा गया था.

इस गांव के रहने वाले थे चौथमल

दौसा जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित आलूदा गांव में रहने वाले चौथमल बुनकर ने तिरंगे का कपड़ा तैयार किया था. चौथमल बुनकर द्वारा तैयार किए गए तिरंगे की कपड़े को स्वतंत्रता सेनानी देशपांडे और टाट साहब द्वारा गोविंदगढ़ ले जाया और गोविंदगढ़ में ही इसे कपड़े को तिरंगे का रूप किया गया. उसके बाद दिल्ली ले जाया गया. देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर दौसा के बुनकर चौथमल के द्वारा तैयार की गई तिरंगे को पहनाया. हालांकि यह बात भी सामने आती है कि 15 अगस्त 1947 को देश के अलग-अलग हिस्सों से चार तिरंगे बनकर आए थे. इस बात की पूरी तरह पुष्टि नहीं हो पाती है कि इन चार में से कौन सा तिरंगा पहनाया गया था. लेकिन देश की आजादी के बाद समय-समय पर चौथमल बुनकर को राष्ट्रीय स्तर पर याद किया गया. जिससे यह माना गया कि आलूदा के चौथमल बुनकर के द्वारा तैयार किए गए कपड़े के ध्वज को ही लाल किले पर पहनाया गया था. जब चौथमल बुनकर जीवित हुआ करते थे तो बताते थे कि उन्हें तिरंगे का कपड़ा तैयार करने में 2 माह का समय लगा था.

दौसा से तिरंगे का नाता जुड़ा होने के कारण ही 1967 में दौसा खादी समिति अस्तित्व में आई और इसके बाद दोसा की बुनकरों द्वारा तैयार किया जाने वाला तिरंगे के कपड़े को देश के कोने कोने में पहुंचाने का काम किया गया. वर्तमान में भी दौसा के आलूदा बनेठा जसोदा और दौसा जिला मुख्यालय पर बड़ी संख्या में बुनकर कपड़ा तैयार करते हैं और इनके द्वारा ही तैयार किए गए कपड़े को प्रोसेसिंग के लिए मुंबई भिजवाया जाता है. वहां इस तिरंगे का रूप मिलता है और उसके बाद में यह तिरंगा बाजार में आता है. वर्तमान में ऐसा नहीं है कि केवल दौसा में ही तिरंगे का कपड़ा बनाया जाता हो दोसा के अलावा बाराबंकी, हुगली मराठवाड़ा, ग्वालियर में भी तिरंगे का कपड़ा तैयार किया जाता है. इसके अलावा हुगली, मराठवाड़ा और मुंबई में तिरंगे की प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित हैं. जहां कपड़े को तिरंगे का रूप दिया जाता है. दौसा खादी समिति देश की बड़ी खादी समितियों में शामिल हैं.

दौसा में खादी ले रही आधुनिक स्वरूप

दौसा में कई बार तिरंगे की प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की कार्य योजना तैयार की गई है लेकिन यहां का पानी फ्लोराइड युक्त होने के कारण प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित नहीं हो सकी और वर्तमान में केवल जहां तिरंगे का कपड़ा बनाया जाता है. वैसे दौसा खादी वर्तमान में आधुनिक रूप ले रही है और यहां से तिरंगे के अलावा अन्य कपड़ा जो पहनने के काम आता है. वह भी देश और विदेश तक पहुंचाया जाता है. आजाद भारत के पहले तिरंगे का कपड़ा तैयार करने वाले चौथमल बनकर अब इस दुनिया में नहीं है और उनके परिवार के सदस्य की आलूदा में नहीं रहते हैं.

हालांकि चौथमल बुनकर के छोटे भाइयों के परिवार अभी भी आलूदा में रहते हैं और कतिन बुनकरों का ही काम करते हैं. आजाद भारत का पहले तिरंगे का कपड़ा बनाने वाले चौथमल बुनकर का नाता आलूदा गांव से होने के चलते उनके परिवार के लोग आज भी गौरवान्वित हैं और ना केवल उनका परिवार बल्कि संपूर्ण दौसा जिला भी चौथमल बुनकर को याद करता है. तिरंगे का इतिहास दौसा से जुड़ा होने के कारण गौरवान्वित महसूस करते हैं.

Tags: Dausa news, Rajasthan news

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