राजस्थान: आरक्षण मिला, लेकिन सियासी बिसात पर महिलाएं अब भी बनी हैं 'मुखौटा'

यह दावा किया जाता है कि आरक्षण देकर महिलाओं को सशक्त किया जा सकता है.

यह दावा किया जाता है कि आरक्षण देकर महिलाओं को सशक्त किया जा सकता है.

महिलाओं के उत्थान के लिए तथा महिलाओं को राज में भागीदारी देने के लिहाज से महिलाओं को आरक्षण (Reservation) देना शुरू किया गया. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई महिलाओं को इस आरक्षण से फायदा हुआ ? क्या वाकई महिलाएं राज में भागीदारी निभा पा रही है ?

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जोधपुर. संवैधानिक पदों पर निर्वाचन के लिए महिलाओं को आरक्षण (Reservation) देने की व्यवस्था भले ही लागू कर दी गई, लेकिन महिलाओं को समाज से अभी भी आजादी की दरकार है. महिलाओं को चुनाव में जिता भी दिया जाए तो क्या, फैसले तो उनके पतियों के ही होते है. आप देख सकते हैं कि बुर्के में लिपटी जनप्रतिनिधि फिरदौस को और ठीक फिरदोस की तस्वीर के आगे एक बड़ी तस्वीर वसीम की लगी है. यह तस्वीर बताती है कि यदि फिरदोस जीत भी जाती है तो सारे काम वसीम ही करेगा. सबसे बड़ी मजे की बात चुनाव में फिरदोस विजय घोषित होती है. यहां उस तंत्र की पूरी तरह से खिल्ली उड़ाई जाती है, जिसमें यह दावा किया जाता है कि आरक्षण देकर महिलाओं को सशक्त किया जा सकता है.

आरक्षण की उस सोच को अब तक किसी पार्टी ने संजीदगी से नहीं लिया. क्योंकि पार्टी जीत की संभावनाएं देखकर टिकट वितरण करती है. यह नहीं देखा जाता कि प्रत्याशी में कितनी संभावनाएं हैं ? वहीं मतदाता भी क्षेत्रवाद, जातिवाद और भाई भतीजावाद के आकर्षण में वोट डालकर चले आते हैं. जिसका नतीजा कभी जीता हुआ जनप्रतिनिधि घुंघट की आड़ से बाहर ही नहीं निकल पाता है. जीतने वाली महिला जनप्रतिनिधि का चेहरा देखना भी क्षेत्रवासियों के नसीब में नहीं होता, क्योंकि वे विजयी होकर घर में चूल्हा चौका ही करते रहते हैं और राज करते हैं पार्षद पति और सरपंच पति.

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क्या वाकई महिलाओं को आरक्षण से फायदा हुआ ?
महिलाओं के उत्थान के लिए तथा महिलाओं को राज में भागीदारी देने के लिहाज से महिलाओं को आरक्षण देना शुरू किया गया. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई महिलाओं को इस आरक्षण से फायदा हुआ ? क्या वाकई महिलाएं राज में भागीदारी निभा पा रही है ? असल में कुछ चुनिंदा महिलाओं ने आरक्षण का फायदा उठाकर ना केवल राजनीति में अपना नाम कमाया, बल्कि इन महिलाओं ने अपने काम के दम पर महिलाओं के उत्थान को लेकर एक उदाहरण पेश किया.

असल में आरक्षण जहां महिलाओं के उत्थान के लिए एक मौका है, वहीं कुछ लोगों के लिए आरक्षण महज खानापूर्ति है, ऐसा ही मामला गत पार्षद चुनाव के दौरान जोधपुर के उत्तर नगर निगम के वार्ड संख्या गुण 39 में देखने को मिला जहां फिरदोस एक पार्टी की प्रत्याशी थी. चुनाव प्रचार के लिए फिरदोस के चुनावी पोस्टर भी लगाए गए, लेकिन फिरदोस का चेहरा कहीं भी प्रतिनिधित्व वाला चेहरा बनता पोस्टर में भी नजर नहीं आया. जबकि कहीं दूर महिला आरक्षण के दम पर कुछ कर गुजरने की हसरत लिए योग्यता इस सिस्टम की नाकामी के चलते सिसकियां लेती नजर आती है.
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