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कृषि कानून के खिलाफ राजस्थान सरकार के 3 विधेयकों को राज्यपाल ने रोका

धर्म स्वातंत्रय विधेयक की राह पर ही  तीनों कृषि विधेयक,
धर्म स्वातंत्रय विधेयक की राह पर ही तीनों कृषि विधेयक,

केंद्रीय कृषि कानूनों (New Farmer Law) को बायपास करने वाले राजस्थान सरकार के तीनों विधेयकों को राज्यपाल ने रोक दिया है. तीनों विधेयक 2 नवंबर को विधानसभा से पारित हुए थे. तीनों विधयेकों का अब अनिश्चितकाल के लिए अटकना तय माना जा रहा है. 

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जयपुर. राजस्थान (Rajasthan) में कांग्रेस (Congress) ने तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों (New Farmer Law 2020) के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. राज्य में भी पार्टी ने धरने प्रदर्शन किए थे. 2 नवंबर को विधानसभा में केंद्रीय कृषि कानूनों के प्रावधान बदलने के लिए तीन कृषि विधेयक पारित किए थे. एक महीने से इन विधेयकों में कोई प्रगति नहीं हुई है. इन विधयेकों के साथ पारित हुए महामारी विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन इन तीन कृषि से जुड़े विधेयकों को राज्यपाल ने रोक लिया है.

पहला विधयेक कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) राजस्थान संशोधन विधेयक 2020 है, इसमें किसान के उत्पीड़न पर सात साल तक की सजा और 5 लाख जुर्माने का प्रावधान है. दूसरा विधेयक कृषक( सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार राजस्थान संशोधन विधेयक है. इस विधेयक में संविदा खेती को लेकर कड़े प्रावधान है, किसान से एमएसपी से कम पर संविदा खेती का करार मान्य नहीं होने और एमएसपी से कम पर करार करने को बाध्य करने पर 7 साल तक सजा और 5 लाख जुर्माने का प्रावधान किया है. तीसरा विधेयक आवश्यक वस्तु (विशेष उपबन्ध और राजस्थान संशोधन) विधेयक 2020 है जिसमें सरकार कृषि जिंसों पर स्टॉक लिमिट लगा सकेगी इसका प्रावधान है, केंद्र ने यह प्रावधान हटा दिया था.





राज्य सरकार ने पारित कर दिया है तीनों विधेयक
राज्य सरकार ने तीनों कृषि विधेयक पारित तो कर दिए लेकिन अब ये तीनों विधेयक राज्यपाल के पास ही अटक गए हैं. केंद्रीय कानूनों में संशोधन होने के कारण इन विधेयकों के प्रावधान तब तक कानून नहीं बन सकते जब तक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल जाती. मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए इन तीनों विधयेकों को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना लगभग नामुमकिन है , इन विधेयकों का इसलिए अटकना तय है.

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अब आगे क्या?
पहली संभावना तो यह है कि ये ​तीनों विधेयक राज्यपाल के पास ही अटककर रह जाएं. राज्यपाल इन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजे ही नहीं. राज्यपाल विधेयक को केंद्र या राष्ट्रपति के पास भेजे ही इसकी कोई समय सीमा या बाध्यता नहीं है. दूसरी संभावना यह है कि अगर राज्यपाल ने इन विधेयकों को  राश्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र के पास भेजा भी जाता है तो राष्ट्रपति की मंजूरी नामुककिन है. राष्ट्रपति के पास अनंत समय तक इन्हें रोकने का अधिकार है. जानकारों के मुताबिक, तीनों विधेयकों का हश्र धर्म स्वातंत्रय विधेयक जैसा होने के आसार बनते दिख रहे हैं.

तो क्या धर्म स्वातंत्र्य विधयेक जैसा होगा हाल?
तीनों कृषि विधेयकों का हाल अब धर्म स्वातंत्र्य विधयेक जैसा होता दिख रहा है. पहले समझ लीजिए उस विधयेक के साथ क्या हुआ था. बीजेपी राज के दौरान साल 2006 में  धर्मांतरण विरोधी धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पारित किया था. पहली बार ये विधेयक विधानसभा में पारित हुआ तो कांग्रेस ने विरोध किया और तत्कालीन राज्यपाल ने लौटा दिया. इसके बाद फिर संशोधन के साथ साल 2008 में यह विधेयक विधानसभा से पारित हुआ. राज्यपाल की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र को भेजा था लेकिन केंद्र सरकार ने इस विधेयक को वापस लौटा दिया था. इसके बाद राज्य सरकार ने एक बार फिर केंद्रीय गृहमंत्रालय को आवश्यक संशोधन के साथ यह विधेयक भेजा. फिर यह  केंद्रीय गृहमंत्रालय से राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया,लेकिन तभी से यह राष्ट्रपति के पास ही अटका हुआ है. फिलहाल तीनों कृषि विधेयकों के बारे में संभावना है कि राज्यपाल इन्हें आगे शायद ही भेजे. अगर भेज भी दिया तो केंद्र राष्ट्रपति के पास नहीं भेजेगा. ऐसे हालात में ये तीनों विधेयक राजस्थान में कानून नहीं बन सकेंगे लेकिन इन पर सियासी हंगामा मचना तय माना जा रहा है.
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