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कैसे एक मोस्ट वॉन्टेड अपराधी बन गया युवाओं का आइकॉन?
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Bhawani Singh | News18Hindi
Updated: June 29, 2017, 2:54 PM IST
कैसे एक मोस्ट वॉन्टेड अपराधी बन गया युवाओं का आइकॉन?
फाइल फोटो.

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आनंदपाल एक गैंगस्टर था. वो खून की होली खेलता था. उसने कई महिलाओं के सुहाग छीने, जिनमें पुलिसकर्मी भी थे. वो इंसानों को पिंजरे में बंद कर टॉर्चर करता था, फिर फिरौती वसूलता था. उसने वसूली से सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति भी बनाई. दहशत का दूसरा नाम था ये शख्स.

लेकिन पुलिस एनकाउंटर में मौत के बाद ये डॉन भी कुछ लोगों के लिए आईकॉन बन गया. वे उसमें रॉबिन हुड की छवि देखने लगे. ये कहानियां बुनी जानी लगी कि आनंदपाल को उसके हालात ने डॉन बनाया. सिस्टम ने अपराधी बनाया. नेताओं ने गैगस्टर बनाया. सोशल मीडिया पर उसके चाहने वाले उसे गरीबों का, दलितों का मसीहा बताने लग गए. उसे बहन- बेटियों के इज्जत की रक्षा करने वाला दूत कहा जाने लगा. बलशाली शरीर और स्टाइलिश कोट ने उसके खूंखार चरित्र को नीचे दबा लिया. जिंदा रहते हुए भी उसके फेसबुक पर पांच हजार से ज्यादा फॉलोअर्स थे. वो अक्सर फेसबुक पर युवाओं को करियर ज्ञान देता था कि क्या करे. जब एक गैंगस्टर को समाज के एक तबके ने स्वीकार करना शुरू किया तो दूसरों की भी हिमाकत बढ़ी.

जेल में बंद एक और खूंखार अपराधी राजू ठेठ ने फेसबुक पर अपने प्रोफाइल में खुद को पूर्व गैंगस्टर लिखा. वो फेसबुक युवाओं को ज्ञान देता है कि आनंदपाल से निपटने के लिए वो गैंगस्टर बना. उसके इस अपडेट पर लाइक्स की बरसात हो रही है. युवा उससे पूछ रहे हैं कि हम क्या करें?

मुठभेड़ को फर्जी बताकर इंसाफ दिलाने के लिए भीड़ उतरी. उसमें अधिकांश छात्र थे. ये भीड़ आनंदपाल के एनकाउंटर पर ये कहकर सवाल उठा रही है कि वो इतना बड़ा गोलीबाज था कि उसकी गोली कभी खाली नहीं जाती थी. जान लेकर शरीर से निकलती थी. फिर उसका एनकाउंटर करने वाली पुलिस की टीम के सदस्य आनंदपाल की सौ राउंड की फायरिंग से कैसे बचे? केवल एक कमांडों सोहनसिंह ही कैसे घायल हुआ. हैरानी तो तब हुई जब राजपूतों के सभी संगठन और उसकी बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले रावणा राजपूत समुदाय के सभी संगठन आनंदपाल के मुठभेड़ को फर्जी करार देकर विरोध करने लगे. वो सरकार को चेतावनी दे रहे हैं कि किसी कीमत पर तब तक शव का अंतिम संस्कार नहीं करने देंगे, जब तक एनकाउंटर की सीबीआई जांच का ऐलान नहीं कर दिया जाता.

आनंदपाल को समर्पण का मौका दिया गया या नही. ये तो जब भी जांच होगी सामने आ ही जाएगा. लेकिन एक अपराधी के चरित्र को जिस तरह पोर्ट्रेट किया जा रहा है. ये समाज और देश के लिए खतरे की घंटी है. ये गुणगान लक्ष्य से भटके युवाओं को अपराध की दुनिया में धकेल सकता है.

अपराधी के गुणगान की ये पहली कहानी नहीं है. इससे पहले शराब माफिया गैंग के सदस्य दारासिंह की मुठभेड़ के दौरान भी यही हुआ था. उस समय एक तबका फर्जी मुठभेड़ बताकर खुलकर सरकार के विरोध में खड़ा हो गया था. वो मुठभेड़ भी जांच में फर्जी साबित हुई. उससे अपराधियों को पीड़ित मानने की प्रवृति बढ़ी. ऐसा ही सौहराबुद्दीन मुठभेड़ में भी हुआ था.

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First published: June 29, 2017, 2:46 PM IST
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