OPINION: सत्ता की भागीदारी के फॉर्मूले पर चलेगी गहलोत सरकार या किनारे होंगे पायलट

सचिन पायलट और अशोक गहलोत (फाइल फोटो).
सचिन पायलट और अशोक गहलोत (फाइल फोटो).

सचिन पायलट के सामने चुनौती यह होगी कि क्या वे मुख्यमंत्री को अपना नेता मानकर उनके अधीन काम करेंगे या फिर अपने हक और अधिकारों की बात करेंगे. बराबरी का हक चाहेंगे. दोनों पर पूरे राजस्थान की निगाहें टिकी हैं.

  • Share this:
भवानी सिंह

राजस्थान में कांग्रेस की सरकार अकेले अशोक गहलोत की सरकार होगी या फिर गहलोत-पायलट की गठबंधन सरकार. फैसले मुख्यमंत्री लेंगे या फिर उप मुख्यमंत्री की भी भागीदारी होगी? कांग्रेस सरकार की मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पसंद से मंत्री बनेंगे या फिर मंत्रिमंडल भी भागीदारी पर आधारित होगा?

अल्बर्ट हॉल में 17 दिसंबर को जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ सचिन पायलट ने भी शपथ ली औऱ वे उप मुख्यमंत्री बने. तब से यह सवाल दौ़ड़ रहा है. अब तक के दो कार्यकाल में बतौर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सर्वेसर्वा रहे. सवाल यह है कि क्या इस बार वे सत्ता का दूसरा केंद्र बनने देंगे?



संविधान की किताब में उपमुख्यमंत्री के पद अधिकार और कार्यों को परिभाषित नहीं किया गया है. दरअसल यह संवैधानिक पद नहीं राजनीतिक व्यवस्था है, लेकिन सवाल यहां कानून की किताब का नहीं..राजनीतिक समझौते का है...राहुल गांधी की मौजूदगी में अशोक गहलोत औऱ सचिन पायलट के बीच सत्ता के बंटवारे या भागीदारी के फॉर्मूले का.
सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री तो नियुक्त हो गए..लेकिन जयपुर के सचिवालय में उप मुख्यमंत्री बैठेंगे कहां? मंत्रियों के साथ मंत्रालय भवन या सचिवालय के मुख्य भवन में या फिर बिल्कुल अलग… या फिर मुख्यमंत्री कार्यालय की किसी एक मंजिल पर उप मुख्य़मंत्री का भी दफ्तर होगा.

अगर सीएमओ में पायलट बैठे तो तय मानिए मुख्यमत्री के साथ फैसलों में उप मुख्यमंत्री की भी भागीदारी हो सकती है.. यानी सीएमओ में सत्ता का दूसरा केंद्र. सवाल यह भी है कि उप मुख्यमंत्री के पास कौन-कौन से मंत्रालय होंगे. उप मुख्यमंत्री को मंत्रालय का आंवटन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत करेंगे या फिर अपनी मर्जी से सचिन पायलट मंत्रालय चु्नेंगे.

सूत्रों का तो दावा है कि समझौता फॉर्मूले में सचिन पायलट को यह अधिकार दिया गया है कि वे मंत्रालय खुद चुन सकते हैं. ऐसा होता है तो क्या वे सबसे पावरफुल गृह मंत्रालय चुनेंगे या वित्त. किसी भी सरकार की रीढ़ होते हैं वित्त और गृह मंत्रालय.

खुद सचिन पायलट ने सचिवालय में मुख्यमंत्री कार्यालय के निरीक्षण के बाद कहा कि उनके पास कौन सा मंत्रालय होगा ये मेरे, मुख्यमंत्री और राहुल गांधी के बीच की बात है. इससे साफ है कि वे समझौता फॉर्मूले की बात कर रहे हैं. पायलट इन दो में से किसी भी एक मंत्रालय को चुनतें है तो फिर टकराव की आंशका बढ़ सकती है.

करीब 18 साल से यह परंपरा बन चुकी है कि वित्त मंत्रालय मुख्यमंत्री अपने पास ही रखते हैं. गहलोत के पहले कार्यकाल में चंदनमल बैद शुरुआत में वित्त मंत्री थे, लेकिन मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री के बीच वित्तीय स्वीकृतियों को लेकर खींचतान के बाद मंत्रालय गहलोत ने अपने पास रख लिया. तब से अशोक गहलोत या वसुंधरा राजे दोनों में से कोई भी सीएम रहा, दोनों ने वित्त मंत्रालय अपने पास ही रखा.

गृह मंत्रालय भी मुख्यमंत्री अपने भरोसे या पसंद के मंत्री को ही सौंपते हैं. यह सबसे प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण मंत्रालय माना जाता है. अशोक गहलोत के पिछले कार्यकाल में गहलोत के करीबी शांति धारीवाल गृहमंत्री रहे. वसुंधराराजे के दोनों कार्यकाल में वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया गृहमंत्री रहे.

लेकिन गृह मंत्रालय में आईपीएस के तबादले से लेकर बड़े फैसले में मुख्यमंत्री का दखल रहता है. पिछले दो दशक से गृह मंत्रालय पर परोक्ष नियंत्रण भी मुख्यमंत्री का ही रहा है. ऐसे में अगर सचिन पायलट गृह या वित्त मंत्री बने तो सीएम और डिप्टी सीएम के बीच सत्ता के केंद्र को लेकर टकराव रोकना आसान नहीं होगा.

मसला यहीं तक नहीं है. सूत्रों का तो दावा है कि मंत्रिमंडल में भी भागीदारी का समझौता हुआ है. यानी सचिन पायलट को भी अपनी पसंद के मंत्री, मंत्रिमंडल में से चुनने का अधिकार होगा मुख्यमंत्री के अतिरिक्त. कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि पायलट को जयपुर, अजमेर और भरतपुर डिविजन में से जीत कर आए विधायकों में से मंत्री चुनने का अधिकार होगा.

बचे हुए चार संभाग से खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पसंद के मंत्री चुनेंगे, हालांकि उदयपुर संभाग से मंत्रियों के चयन में सीपी जोशी औऱ बीकानेर डिविजन में मंत्रियों के चयन में रामेश्वर डूडी की सलाह को भी तव्वजो दी जा सकती है. वैसे माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री के लिए यह लक्ष्मण रेखा तो नहीं लेकिन काफी हद तक इस फॉर्मूले का पालन किया जा सकता है. वैसे मंत्रिपरिषद में शामिल होने वाले मंत्रियों के नामों का अंतिम फैसला दोनों की सूची के बाद राहुल गांधी कर सकते हैं.

अगर इस फॉर्मूले पर मंत्रिमंडल का गठन होता है तो हो सकता है शुरुआत में बड़ी मंत्रिपरिषद बनाने के बजाय छोटी मंत्रिपरिषद का गठन कर लिया जाए. यह संख्या 15 तक हो सकती है. हालांकि राजस्थान में अधिकतम 30 मंत्री बनाए जा सकते हैं. लोकसभा चुनाव तक ये व्यवस्था कायम रह सकती है.

बाद में चुनाव के नतीजों के बाद मंत्रीपरिषद का विस्तार किया जा सकता है. तब पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर तय हो सकता है कि मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के बीच सत्ता की भागीदारी का फार्मूला आगे भी चलेगा या फिर इस व्यवस्था पर विराम लग सकता है.

सूत्रों का कहना है कि महज का सत्ता का बंटवारा या भागीदारी इस फॉर्मूले में नहीं है. दोनों नेताओं पर उन संभाग में पार्टी की लोकसभा चुनाव में जीत के लिए रणनीति बनाने का भी दायित्व होगा. यानी अपने हिस्से के संभाग में पार्टी के लोकसभा में चुनाव में प्रदर्शन की भी जिम्मेदारी इन नेताओं की होगी.

सचिन पायलट के पास उप मुख्यमंत्री के साथ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का भी पद है. ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री की ओर से दबाव बनाया जा सकता है. जातीय समीकरण और संतुलन साधने के नाम पर दोनों में से एक पद छोड़ने का.

सचिन पायलट और अशोक गहलोत दोनों का स्वभाव और शैली जुदा है. दोनों के बीच वर्चस्व की जंग कांग्रेस में चुनाव के पहले से चली आ रही है. ऐसे में परीक्षा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की भी है और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की भी. क्या गहलोत सत्ता में भागीदारी स्वीकार कर पायलट के साथ मिलकर सामंजस्य से सरकार चलाएंगे या फिर वर्चस्व की जंग होगी.

सचिन पायलट के सामने चुन्नौती यह होगी कि क्या वे मुख्यमंत्री को अपना नेता मानकर उनके अधीन काम करेंगे या फिर अपने हक और अधिकारों की बात करेंगे. बराबरी का हक चाहेंगे. दोनों पर पूरे राजस्थान की निगाहें टिकी हैं. दोनों के बीच सामंजस्य या टकराव का सीधा असर सरकार के कामकाज पर पड़ेगा.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज