राजस्थान के बाहर मिली पूर्व सीएम गहलोत को बड़ी जिम्मेदारी

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत.
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत.

लंबे इंतजार के बाद आखिरकार पार्टी आलाकमान ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. उन्हें पंजाब में होने वाले चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है.

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लंबे इंतजार के बाद आखिरकार पार्टी आलाकमान ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. उन्हें पंजाब में होने वाले चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है.

इससे गहलोत के उन राजनीतिक विरोधियों को तगड़ा झटका लगा है, जो ये मान रहे थे कि प्रदेश और केंद्र की राजनीति में गहलोत अब प्रासंगिक नहीं रहे हैं वहीं गहलोत समर्थकों के चेहरे खुशी से खिल उठे हैं.

2013 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद माना जा रहा था कि अशोक गहलोत का युग अब खत्म हो गया है, लेकिन गहलोत फिर से अहम जिम्मेदारी के साथ पार्टी में सक्रिय हो रहे हैं. तीन साल तक गहलोत को पार्टी आलाकमान की ओर से लगभग भुला सा दिया गया था. उनके समर्थक इस बात से खासे परेशान थे कि इतने वरिष्ठ नेता को पार्टी ने कोई पद देने लायक तक उचित नहीं समझा. लेकिन पंजाब चुनाव सिर पर आए तो राहुल सोनिया को उनकी याद आई. गहलोत को स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है. साथ में मिनाक्षी नटराजन और राजीव सातव उनकी मदद करेंगे.



पंजाब में माली सिक्ख समाज अच्छी खासी तादाद में हैं इसलिए गहलोत के साथ राजीव सातव को भी जोड़ा है जो कांग्रेस विरोधी लहर में भी महाराष्ट्र से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं. सातव भी जाति से माली हैं और इन दोनों के जरिए कांग्रेस माली वोट को करीब लाने की कोशिश भी करेगी.
गहलोत को कार्यकर्ताओं का ऐसा हितैषी नेता माना जाता है जो निर्विवाद रहते हुए फैसले लेने में भरोसा करता है. पार्टी आलाकमान को भरोसा है कि पंजाब में टिकटों के चयन में पारदर्शिता रही तो कांग्रेस वहां सत्ता हासिल कर लेगी. गहलोत के सामने हालांकि धनबल और बाहुबल के दम पर टिकट मांगने वालों की लंबी फेहरिस्त होगी, जिन्हें बड़े ही राजनीतिक चातुर्य से उन्हें हैंडल करना होगा.

स्क्रीनिंग कमेटी सेंट्रल इलेक्शन कमेटी को टिकटों के लिए अनुशंषा करेगी, जहां जाकर टिकट फाइनल होंगे. जहां तक राजस्थान का सवाल है गहलोत न तो यहां अज्ञातवास में थे और न ही राजनीतिक वनवास में. हालांकि उनके समर्थक आलाकमान के इस फैसले को उनका राजनीतिक पुनर्वास मान रहे हैं.

पिछले तीन साल में गहलोत को जहां भी मौका मिला वो जनता के बीच पहुंचे और अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहे. साथ ही ये भी साबित करते रहे कि जनता के बीच बने रहने के लिए किसी ओहदे की जरूरत नहीं है. गहलोत की इस नियुक्ति से पायलट खेमे में हलचल है. वहीं सीपी जोशी खेमा इसे पायलट को बैलेंस करने की पार्टी आलाकमान की कोशिश मान रहा है.
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