Rajasthan Crisis: सियासी बवंडर से पार पाने का यह फॉर्मूला है गहलोत के पास
Jaipur News in Hindi

Rajasthan Crisis: सियासी बवंडर से पार पाने का यह फॉर्मूला है गहलोत के पास
गहलोत पार्टी और आम आदमी की नब्ज को बेहतर तरीके से समझते हैं.

Rajasthan Crisis: राजस्थान की तीसरी बार बागडोर संभालने वाले अशोक गहलोत के सामने कई बार बेहद पेचीदा राजनीतिक चुनौतियां आई हैं, जिन्हें उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से सफलतापूर्वक सुलझाया है.

  • Share this:
जयपुर. राजस्थान में उठा सियासी बवंडर (Political Crisis) एकबारगी शांत होता दिख रहा है. हालांकि इसका पटाक्षेप होने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा. लेकिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम से एक बार फिर यह तय हो गया है कि राजस्थान में राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत (Political magician Ashok Gehlot) का कोई तोड़ नहीं है. गहलोत के पास राजनीति की यह कला यूं ही नहीं आई, बल्कि करीब पांच दशक तक उन्होंने राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने में घूमकर संजीदगी से फैसले लेकर अपने आप को इस मुकाम तक पहुंचाया है. तब जाकर वो आज पार्टी के संकटमोचक की भूमिका में आए हैं.

हर मसले को सुलझाने का माद्दा
मसला केवल अभी का नहीं है. राजस्थान की तीसरी बार बागडोर संभालने वाले गहलोत के सामने बहुत बार बेहद पेचीदा राजनीतिक चुनौतियां आई हैं, जिन्हें उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से सफलतापूर्वक सुलझाया है. गहलोत की इस खूबी और उनकी संजीदगी का पार्टी नेतृत्व भी कायल है. यही वजह है कि जिस राज्य में भी पार्टी के सामने जब-जब राजनीतिक संकट आता है, वहां पार्टी को गहलोत की जरूरत महसूस होती है. फिर यह मसला तो खुद गहलोत की सरकार से जुड़ा था, तो लाजिमी ही है कि उन्हें इससे धैर्यपूर्वक पार पाना ही था.

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात बार-बार सामने आई कि पार्टी ने बड़ी देरी से स्थितियों को संभालने के लिए कदम उठाया. लेकिन दूसरी तरफ इस बात को भी समझना होगा कि पार्टी के पास भी वैसे भी हर मर्ज की दवा गहलोत ही हैं, तो उन्हें क्या संभालना? वो खुद ही इतने सक्षम हैं कि हर मसले को अपने तरीके से सुलझाने का माद्दा रखते हैं. यह बात दीगर है कि थोड़ा सपोर्ट मिलता, तो हालात जल्दी सुलझ जाते.
राजस्‍थान का सियासी संकट: गहलोत फिर साबित हुए जादूगर, फिलहाल बचती दिख रही सरकार



पार्टी और आम आदमी की नब्ज समझते हैं गहलोत
इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है कि सचिन पायलट ने पार्टी के लिए पसीना बहाया. विधानसभा चुनाव से पहले पांच साल तक पायलट ने पार्टी में जान फूंकने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. लेकिन उनके मुकाबले गहलोत पार्टी और आम आदमी की नब्ज ज्यादा बेहतर तरीके से जानते-समझते रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव से पहले उनके पास पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर संगठन से जुड़ी अहम जिम्मेदारी थी, लेकिन तमाम व्यस्तताओं के बावजूद राजस्थान से उन्होंने दूरियां नहीं बनाईं. उस समय का गहलोत का एक बयान "मैं थां स्यूं दूर नहीं" से उन्होंने राजस्थान के लोगों को कभी अपने से दूर नहीं जाने दिया.

Rajasthan Crisis: जल्द होगी नए PCC चीफ की घोषणा! पूर्व मंत्री रघुवीर मीणा दौड़ में सबसे आगे

राजस्थान से जुड़ाव गहरा
अशोक गहलोत राजस्थान में पार्टी और आमजन से पूरी तरह वैसे ही जुड़े रहे, जैसे पहले थे. उनकी सहज और सरल कार्यशैली के कारण विधानसभा चुनावों में भी वो छाए रहे. उनकी लोकप्रियता नेचुरल है. वह एक वर्ग विशेष के न होकर, सभी वर्गों में पॉपुलर हैं. गहलोत की तुलना समय-समय पर राजस्थान की राजनीति के पुरोधा रहे पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. भैरोंसिंह शेखावत से की जाती रही है.

जबकि दूसरे किनारे पर खड़े पायलट की कार्यशैली आक्रामक जरूर है, लेकिन उनके कुछ पहलुओं से आमजन अब भी पूरी तरह नहीं जुड़ पाया है. यही वजह रही कि पार्टी के साथ-साथ आमजन से जुड़ाव में गहलोत हर बार पायलट पर भारी पड़े. विधानसभा चुनाव में भी आमजन के बीच गहलोत का जादू बरकरार रहा. पार्टी नेतृत्व ने भी गहलोत के इस जुड़ाव को महसूस किया और सरकार की बागडोर गहलोत के हाथों में सौंप दी. यह बात अलग है कि बाद में सरकार में दो ध्रुव बन गए और हालात आज यहां तक आ पहुंचे.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज