OPINION: 2019 में देश की राजनीति उत्तरप्रदेश से नहीं, राजस्थान से तय होगी
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OPINION: 2019 में देश की राजनीति उत्तरप्रदेश से नहीं, राजस्थान से तय होगी
प्रतिकात्मक तस्वीर.

गहलोत हों चाहे वसुंधरा, दोनों ही पूर्व उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की तरह लम्बी छलांग लगा दिल्ली दरबार में भी अपना दखल साबित कर सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 4, 2018, 4:06 PM IST
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श्रीपाल शक्तावत

'2019 में देश की राजनीति उत्तरप्रदेश से नहीं, राजस्थान से तय होगी.' टैरो कार्ड से ज्योतिष को जानने वाले अनिल दहिया इस बात को कुछ इस तरह दावे से कहते हैं, मानो सारा राजनीतिक परिदृश्य उनके टैरो कार्ड्स में ही छिपा हो. जब पूरा देश चार राज्यों - राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनावी परिदृश्य पर निगाह टिकाये है, उस वक्त अनिल दहिया जैसे न जाने कितने ज्योतिषी नेताओं की जन्म कुंडली खंगाल रहे हैं.

कोई कुंडली के आधार पर भविष्य बांच रहा है, तो कोई नेताजी को जीत के लिए टोने टोटके भी बता रहा है. ज्योतिष और वास्तु के बड़े जानकारों में से एक जयपुर के पंडित मुकेश भारद्वाज कहते हैं - "गृह नक्षत्र के लिहाज से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत-कांग्रेस के सितारे बुलंद है, लेकिन मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे-बीजेपी भी सितारों के लिहाज से कमजोर नहीं है."



ये कुछ ऐसे ज्योतिषीय आकलन हैं, जो राजस्थान में हर किसी की जिज्ञाषा जगा रहे हैं. खासतौर पर इसलिए क्योंकि सितारों के लिहाज से न अखिल भारतीय कांग्रेस के महामंत्री (संगठन) अशोक गहलोत को पीछे माना जा रहा है, न ही प्रदेशाध्यक्ष के मुद्दे पर पार्टी हाईकमान तक को छका देने वाली बीजेपी की दिग्गज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सितारों के हिसाब से पीछे मानी जा रही है. गहलोत जनता में अपनी सरकार के समय की लोकप्रिय योजनाओं के जरिए जादूगरी के अंदाज़ में हैं तो राजे पूरे राजस्थान के दौरे कर माहौल को फिर बीजेपी के पक्ष में करने की कवायद में लगी है.
सवाल यह है कि राहुल गांधी जब सचिन पायलट को आगे बढ़ाकर चुनाव में कांग्रेस की नैया पार कराने की जुगत में है तब गहलोत का गणित क्या होगा? जवाब है - गहलोत हो चाहे वसुंधरा, दोनों ही पूर्व उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की तरह लम्बी छलांग लगा दिल्ली दरबार में भी अपना दखल साबित कर सकते हैं.


कहने को यह महज एक ख्याली पुलाव की तरह है, लेकिन राजनीतिक गणित पर गौर करें तो 2019 में लोकसभा चुनाव के बाद दोनों ही देश की बागडोर संभालने वालों की कतार में आगे हो तो अचरज की बात नहीं.

राजनीतिक गणित के हिसाब से देखें तो ज्योतिष की ये गणनाएं कुछ अलग इशारे कर रही हैं. खास तौर पर इसलिए क्योंकि 2019 की चुनावी तस्वीर अब थोड़ा धुंधलाने सी लगी है. बीजेपी अगर 2014 की तरह अपना करिश्मा दिखाती है तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बने रहने में किसी तरह का संशय नहीं है. लेकिन, बीजेपी अगर एनडीए के बूते सत्ता में आयी तो मोदी की जगह बीजेपी के ही नितिन गडकरी जैसे किसी दूसरे नेता के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावनांए ज्यादा प्रबल दिखती हैं.

गडकरी का नागपुर कनेक्शन यानी संघ की सहमति उनकी संभावनाओं को मजबूत बनाता है, लेकिन गडकरी से ज्यादा सम्भावनाओं के द्वार अगर किसी के लिए खुलते हैं तो वह है -राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे.

vasundhara raje
वसुंधरा राजे (फाइल फोटो)


राजस्थान में बेशक राजे बीजेपी को सत्ता में बनाये रखने के लिए पसीने बहा रही है. लेकिन सियासी गणित पर गौर करें तो राष्ट्रीय परिदृश्य में वह बीजेपी के दूसरे नेताओं से ज्यादा स्वीकार्य नजर आ रही है.


ये स्वीकार्यता ग्वालियर (मध्यप्रदेश) की बेटी और धौलपुर(राजस्थान) की बहू के तौर पर तो है ही, अलग-अलग जातियों के गठजोड़ और दूसरे राज्यों में पकड़ के रूप में भी है. मूलतः सिंधिया-मराठी मानुस होने का गणित राजे को महाराष्ट्र में स्वीकार्य बनाता है सो अलग. मोदी से इतर गडकरी या वसुंधरा राजे के नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे आए तो शिवसेना उनके नाम पर मुहर लगाने में सबसे आगे होगी.

लुटियन दिल्ली के दौर के संबंध उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के लिए अगर सबसे ज्यादा किसी को स्वीकार्य बनाएंगे तो वह भी वसुंधरा राजे ही है. रियासती पृष्ठभूमि वाली राजे के पक्ष में सबसे बड़ी बात अगर कोई है तो वह है-राजे का बहुभाषी और महिला नेत्री होना. वह अंग्रेजी, हिंदी और मराठी भाषी होने के नाते पूरे देश में न केवल सीधे संवाद स्थापित करने की स्थिति में है बल्कि महिला नेता होने के नाते एक बड़े वोट बैंक यानि आधी आबादी को मोह लेने की स्थिति में भी है. लेकिन ये सब गणित तभी है जब भाजपा शिवसेना या बीजू जनता दल जैसे दलों के बूते सरकार में आये और मोदी प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर हो जाएं. जाहिर है सितारों का गणित ही नहीं, राजनैतिक गणित भी वसुंधरा राजे को मोदी से इतर दूसरे भाजपा नेताओं में प्रभावी बनाता है.

एनडीए में वसुंधरा राजे के पक्ष में कई बातें हैं तो यूपीए में अशोक गहलोत के पक्ष में ऐसे ही कई जोड़ बाकी हैं. वो भी उस सूरत में जब भाषा और भाषण शैली में वह वसुंधरा से इक्कीस नहीं हैं. वैसे तो कांग्रेस में प्रधानमंत्री के लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम है -राहुल गांधी. लेकिन खुद पीछे रहकर मनमोहन सिंह को सत्ता सौंपने वाले सोनिया-राहुल शायद ही चाहें कि कई दलों वाले यूपीए की कमान खुद संभालें. वजह- सत्ता की चाहत से थोड़ा दूर रहकर सत्ता का संचालन करते रहे मांं-बेटे यानी सोनिया -राहुल शायद ही चाहेंगे कि बहुदलीय सरकार के गठबंधन के जरिए सत्ता का सेहरा पहनकर सत्ता का संचालन करें और वक्त जरूरत नेताओं और दलों की चिरौरी करते रहें.

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अशोक गहलोत.


जाहिर है ऐसे में उनके पास मनमोहन सिंह की तरह अगर कोई विश्वसनीय नाम है तो वह है -एके एंटनी और अशोक गहलोत. दोनों ही गांधी परिवार के निष्ठावान हैं साथ ही छवि के लिहाज से भी दोनों लम्बी राजनीति के बावजूद खुद को साफ़ सुथरा बनाये रखने में कामयाब रहे हैं. उम्र के लिहाज से दोनों राहुल गांधी से इतने बड़े है कि जब चाहें राहुल सत्ता की चाबी उनसे ले या छीन सकते हैं. गांधी परिवार में पसंद के लिहाज से न एंटनी उन्नीस है और न गहलोत.


अशोक गहलोत एंटनी से कहीं ज्यादा इसलिए भी प्रभावी हैं क्योंकि वह न केवल पिछड़े वर्ग के होने के नाते देश भर में एक बड़े वोट बैंक को लुभा सकते है बल्कि हिंदी बेल्ट में बीजेपी को अपने अंदाज़ में जवाब देने का माद्दा भी उन्ही में है. माली समुदाय से होने के नाते उनकी देशव्यापी जातीय पकड़ है सो अलग.

कांग्रेस की राजनीति के लिहाज से देखें तो गहलोत उन गिने चुने नेताओं में से एक हैं जो 1980 से लेकर अब तक देश के लगभग सभी राज्यों में कभी न कभी प्रभारी का रोल जरूर अदा कर चुके हैं. जाहिर है कांग्रेस के नए अथवा पुराने नेताओं में संपर्क के लिहाज से उनका कोई तोड़ नहीं है.

सादगी और गांधी परिवार के प्रति समर्पण भाव कांग्रेस में गहलोत की सबसे बड़ी पूंजी है तो भाषा और भाषण में नजर आने वाली कमी उनकी कमजोरी है. और, इस कमी को पूरा करने के लिए उनके पास कुछ है तो वह है - गहलोत की "प्रो पीपल इमेज".

बीजेपी हो चाहे कांग्रेस दोनों ही दलों के लिए राजे और गहलोत के अलावा भी नेताओं की एक बड़ी कतार है. लेकिन देशव्यापी असर और राजनैतिक स्वीकार्यता में में जितना आगे अपने-अपने दल में दोनों हैं, उतना शायद कोई नहीं. ऐसा होता है तो न राजस्थान बीजेपी में गजेंद्र सिंह शेखावत के आगे बढ़ने की संभावना खत्म हुई है और न कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के हाथ में राजस्थान की बागडोर आना मुश्किल है. राजे-गहलोत राजनीति का वर्तमान हैं तो शेखावत-पायलट सियासत का भविष्य. और, भविष्य भी एक दो साल नहीं, एक-दो दशक का.

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