क्‍या वसुंधरा को तीसरी बार जीत का गौरव दिला पाएगी उनकी रथ यात्रा?
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क्‍या वसुंधरा को तीसरी बार जीत का गौरव दिला पाएगी उनकी रथ यात्रा?
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे.

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की चालीस दिन की राजस्थान गौरव यात्रा उनके राजनीतिक भविष्य के लिए भी निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है.

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  • Last Updated: August 3, 2018, 7:54 PM IST
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मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तीसरी बार राजस्थान में उदयपुर के चारभुजा से चुनावी रथ यात्रा शुरू कर रही हैं. शनिवार को चारभुजा मंदिर में पूजा के बाद गौरव यात्रा शुरू होगी. सवाल ये कि क्या तीसरी बार भी राजे के लिए चारभुजा लकी साबित होगा? क्या इस बार की गौरव रथ यात्रा सत्ता विरोधी लहर को पछाड़ पाएगी? फर्क यह है कि पिछली दोनों यात्राएं राजे ने विपक्ष में रहते हुए की थी और इस बार बतौर मुख्यमंत्री.

परिवर्तन और सुराज सकंल्प यात्रा ने वसुंधरा राजे को राजस्थान में लोकप्रिय नेता और राजस्थान बीजेपी के सबसे बड़े ब्रांड के रूप में स्थापित किया था. 2003 में राजे ने परिवर्तन रथ यात्रा शुरू की, तब राजस्थान में नारा था कि बीजेपी का एक ही सिंह भैरोसिंह. बीजेपी को भैरो बीजेपी के नाम से जाना जाता था.

वसुंधरा राजे तब राजस्थान बीजेपी में महज एक युवा चेहरा थी. बीजेपी ने राज्य में अपने सबसे लोकप्रिय चेहरे शेखावत के उत्‍तराधिकारी के रूप में राजे को चुना. यकीन कम ही लोगों को था कि राजे शेखावत की जगह ले सकती हैं. लेकिन 2003 की परिवर्तन यात्रा के बाद राजे राजस्थान में बीजेपी के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित हो गई.



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इसका नतीजा ये हुआ कि अशोक गहलोत की अगुवाई वाली कांग्रेस सत्‍ता से बाहर हो गई और बीजेपी की पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत से सरकार बनी. उसे 200 में से 120 सीटें झटक ली. राजे ने परिवर्तन यात्रा में राजपूत की बेटी, जाट की बहु, गुर्जर की समधन जैसे नारों से हर वर्ग के साथ खुद को कनेक्ट किया. 'जैसा देश वैसा भेष वैसी बोली' के राजे के सियासी अंदाज ने जबरदस्त असर किया.

दूसरी रथ यात्रा 2013 में निकाली, जिसे सुराज संकल्प यात्रा का नाम दिया था. तब राजे की बतौर लोकप्रिय नेता की छवि दांव पर थी. राजे की ये यात्रा भी सफल रही. अशोक गहलोत की सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के अंबार के बावजूद राजे ने बिजली, पानी और सड़क जैसे आम मुद्दों पर गहलोत सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को आंधी में तब्दील कर दिया.

नतीजा यह हुआ कि 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 200 में 163 सीटें यानी अस्सी फीसदी सीटें हासिल कर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया. हालांकि कुछ विश्लेषक इसे मोदी लहर का असर मानते हैं. बावजूद राजे की यात्रा के असर को कम नहीं आंका जा सकता.

अब तीसरी यात्रा राजे के लिए कड़ी परीक्षा है. पहले की दोनों यात्राएं सरकार के खिलाफ थी, यानी एंटीइनकमबेंसी को भुनाया था, इस बार खुद को खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल को थामने की चुनौती है. ​जनता में ये भरोसा जगाने की चुनौती है कि 2013 में सुराज संकल्प यात्रा में जो वादे जनता से किए थे. वे पांच साल में पूरे किए. जनता यात्रा के दौरान रिपोर्ट कार्ड भी मांगेगी. वादे और अधूरे काम भी याद दिलाएगी. सिस्टम के खिलाफ गुस्सा भी सामने आ सकता है. यानी धैर्य की परीक्षा भी होगी.

गौरव यात्रा में राजे के सामने सबसे बड़ी चुनौती वही है जो राजे की सबसे बड़ी यूएसपी हुआ करती थी यानी जातियों को साधने की कला. राजपूत से गुर्जर समेत कई जातियां नाराज हैं. राजे कैसे इनकी नाराजगी दूर कर पाले में लाती है यह देखना दिलचस्प होगा. चालीस दिन की यह यात्रा राजे के राजनीतिक भविष्य के लिए भी निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है.
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