OPINION : कोरोना काल में आपदा को 'अवसर' बनाने वाले बेशर्म गिद्धों को तत्काल रोकना जरूरी

रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी में तो लाखों का वेतन लेने वाले सरकारी डाक्टर तक पीछे नहीं हैं.

रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी में तो लाखों का वेतन लेने वाले सरकारी डाक्टर तक पीछे नहीं हैं.

Black marketing in Corona era: कोरोना काल में दवाइयों समेत अन्य आवश्यक चीजों की कालाबाजारी ने आम इंसान को तोड़कर रख दिया है. कोरोना के इस दौर में लालची लोगों ने ऑक्सीजन से लेकर रेमडेसिविर इंजेक्शन और खाने-पीने की चीजों को दाम बेहिसाब बढ़ा दिये हैं.

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जयपुर. कोरोना काल (Corona era) में ऐसी कई सुर्खियां सामने आ रही हैं, जो इंसान के शैतान बनने की कहानी बखूबी बयां करती हैं. ये सुर्खियां उस काले सच (Black truth) को उजागर करती हैं जिनमें कुछ लोगों ने और व्यापारियों ने बहुत बेशर्मी से इस महामारी की आपदा को 'अवसर' में तब्दील कर लिया है. यह उस घिनौनी धनलिप्सा को बेपर्दा करती हैं और बताती हैं कि इंसान कितना नीचे तक गिर सकता है. अफसोस यह है कि यह कहानियां सिर्फ जयपुर, जोधपुर, इंदौर, बागपत, पानीपत की ही नहीं है. शहरों के नाम बदल दें तो ऐसे पैसों के लालची गिद्ध, कफनचोर और बेईमान धंधेबाज हर शहर में मिल जाएंगे.

गिद्धों से बदतर ऐसे लोगों के लिए आपदा ही अवसर है. गिद्ध तो मरने के बाद अपना पेट भरने के लिए लाशों को नोचता है पर ये लोग तो अपनी तिजोरियां भरने के लिए जिंदा इंसानों को ही नोचने में लगे हैं ! ऐसे नापाक तरीकों से​ तिजोरियां भरने वाले कोई और नहीं हम और आप जैसे लोग ही हैं. महामारी में सरकारों और उनकी बद-इंतजामियों को कोसना आसान है, लेकिन कोरोना काल में दैनिक जीवन की मुश्किलें बढ़ाने में सरकार से ज्यादा ऐसे ही धंधेबाजों का हाथ है. ईमानदारी का लबादा ओढ़े ये बेईमान मुर्दे के शरीर से कफन तक नोंचने में लगे हैं. ऐसे बेशर्म लोगों की कहानियां और किस्से हर शहर में हर सू हैं.

धनलिप्सा में लोगों ने बढ़ा दिए हर चीज के दाम

डाक्टर्स ने कोरोना से बचाव के लिए विटामिन-सी अधिक लेने के लिए कहा तो 50 रुपए किलो बिकने वाले नींबू 150 रुपए किलो हो गए. सिर्फ 40 रुपए में बिकने वाला नारियल 80-90 रुपये तक जा पहुंचा. ऑक्सीमीटर की डिमांड बढ़ी तो इसके दाम हजार से चार हजार तक पहुंच गए. आक्सीजन की कमी सुनते ही लोगों ने इसका अनावश्यक स्टॉक करना शुरू कर दिया. फलत: इसके दाम बढ़े और सप्लाई कम हो गई.
सरकारी डाक्टर तक पीछे नहीं हैं

रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी में तो लाखों का वेतन लेने वाले सरकारी डाक्टर तक पीछे नहीं हैं. ऑक्सीजन बेड कि इतनी किल्लत कि उनकी बोली लग रही है. कोरोना से मरीज मरे तो एम्बुलेंस संचालकों की चांदी बन जाती है. इससे जयपुर से दौसा तक किराया पांच से दस गुना तक बढ़ा दिया. महामारी में मौका मिला तो कफन से लेकर श्मशान की लकड़ियों तक के दाम बढ़ा दिए. एक दिन हिसाब तो इन सबको भी देना पड़ेगा. जनता की अदालत में नहीं तो ईश्वर की अदालत में इनके पापों का हिसाब हो जाएगा.

लाखों कर्मवीर और देवदूत भी खुदा ने भेजे हैं



शुक्र है खुदा ने दुनिया का संतुलन बनाए रखने के लिए दो तरह के इंसान बनाए हैं. यदि ऐसे कफनचोर गिद्ध हैं तो दूसरी ओर ऐसे इंसान भी हैं जो इस महामारी में भी लोगों के जीवन का सहारा बन रहे हैं. दिल्ली के गुरूद्वारे में ऑक्सीजन लंगर लगने के बाद अब देश में कई जगह ऐसे निशुल्क लंगर कोरोना मरीजों की जान बचाने का सबब बन रहे हैं. हजारों ऐसे डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ ओर नर्सिंगकर्मी हैं जो अपनी जान की परवाह न करके भी कोरोना मरीजों के उपचार में दिन-रात लगे हैं. महामारी में भी जरुरी सेवाओं के लिए काम करने वाले लाखों कर्मवीर हैं.

हमारा दायित्व... हमें ही उतारना होगा ईमानदारी का मुखौटा

इस समय राजनीति करने, सरकारों को कोसने से ज्यादा जरूरी है ऐसे लोगों को बेनकाब करना जिन्होंने आपदा को अवसर बना लिया है. यह हम सबका दायित्व है. इसकी शुरुआत हर उस घर से होनी चाहिए जिसमें बेईमान धंधेबाज ईमानदारी का मुखौटा लगाए बैठा हैं. ऐसे लोगों के परिजनों, दोस्तों, जानकारों को ही उन्हें महामारी में ऐसा काम करने से रोकना होगा. ताकि लोगों को लुटने-मरने से बचाया जा सके. यह महामारी का दंश झेलते कोरोना मरीजों के आंसू पौंछने जैसा होगा. सिर्फ सरकारों के बूते रहने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है. क्योंकि ज्यादातर सरकारें घटना हो जाने के बाद ही एक्शन लेती हैं. वह भी तब ज​ब शिकायत का कोई रुक्का किसी अफसर के हाथ में थमा दिया जाए. वरना वे भी आपदा में अवसर तलाशते नजर आते हैं.

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