यादें! 'आल्‍प्‍स' की तरह विशाल और 'लेक जिनेवा' की तरह गहरे तथा शांत थे मेरे दादा सुशांत राजपूत!

सुशांत दादा कहते थे नाम, शौहरत और पैसा तो आते-जाते रहते हैं, सच्चे दोस्त नहीं मिलते.
सुशांत दादा कहते थे नाम, शौहरत और पैसा तो आते-जाते रहते हैं, सच्चे दोस्त नहीं मिलते.

Miss You Sushant Singh: सूर्यप्रताप भाटी ने बताया कि वर्ष 2015 से शुरू हुआ मुलाकातों का सिलसिला आज तक अनवरत चलता रहा. जब भी दादा यहां स्विट्ज़रलैंड आए, बिना मिले कभी न गए.

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जयपुर. सुशांत सिंह राजपूत के करीबी और स्विस होटल मैनेजमेंट स्कूल के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सूर्यप्रताप सिंह भाटी ने अपने मित्र, मार्गदर्शक और दादा को बड़े ही भावुक अंदाज में श्रद्धांजलि दी है. पढ़ें उनकी यादें उन्‍हीं की जुबानी...

वह जुलाई 2015 की रात थी. दादा सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) से उसी रात मेरी मुलाकात हुई थी. मैं स्विट्ज़रलैंड (Switzerland) से अपने घर पाली के लिये निकला था और जोधपुर की कनेक्टिंग फ्लाइट मुम्बई से थी. लिहाजा, उस रात मैं होटल ताज-मुम्बई में ही ठहरा हुआ था. मैंने रात मुम्बई में गुजारने के बारे में अपने दोस्त विशाल शाह को बताया था. विशाल ने ही उस रात एक पार्टी में साथ ले जाने का प्लान बनाया और हम दोनों उस पार्टी में शिरकत करने चले गये. पार्टी बॉलीवुड के न्यू कमर्स की थी. उसी पार्टी में पहली बार सुशांत सिंह राजपूत से मुलाकात हुई थी.

फौजी अंदाज़ में किया था 'सैल्यूट'
कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने पूछा था, 'आप कहाँ से हैं?' मैंने जवाब दिया जोधपुर से. बातों-बातों में मैंने बताया कि परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह भाटी मेरे ग्रैंड फादर थे. सुनते ही सुशांत खड़े हुए और पूरे फौजी के अंदाज़ में 'सैल्यूट' किया. सबकी निगाह हम दोनों पर थी. मैं समझ नहीं पाया कि क्या जवाब दूं ? हां, यही वह क्षण था जिसने सुशांत और मेरे बीच एक नए रिश्ते की बुनियाद रख दी. अब वह मेरे लिये दादा  (बड़े भाई) थे और मैं उनका छोटा भाई और दोस्त एसपी. दादा के सहज-सरल स्वभाव ने मेरा दिल जीत लिया था. उस रात के बाद दिनों दिन हमारे रिश्ते में मजबूती आती चली गयी. अब वो फ़िल्म अदाकार और मैं उनका फैन भर नहीं था. वह दादा थे और मैं उनका एसपी.
'नेवर गिव अप...एंड आई वांट टू बी यू ए सक्सेसफुल आंत्रप्रेन्‍योर'


2015 से शुरू हुआ वह सिलसिला आज तक अनवरत चलता रहा. जब भी दादा यहां स्विट्ज़रलैंड आये बिना मिले कभी न गये. हमारे रिश्ते को न मैंने सोशल मीडिया पर जगह दी न उन्हें यह ठीक लगा. अभी पिछले बर्थडे पर मैंने कॉल किया तो बिना औपचारिकता के उन्होंने तुरंत फ्यूचर प्लान पर चर्चा शुरू कर दी. सवाल था एसपी फ्यूचर प्लान क्या है? मैंने कहा एक कम्पनी के जरिये एक छोटी सी शुरुआत की है. इंडिया में भी एक्सपेंड करने का प्लान है. वह 'वाह' कहते हुए बोले- मेरी एक बात याद रखना एसपी...नेवर गिव अप...एंड आई वांट टू बी यू ए सक्सेसफुल आंत्रप्रेन्‍योर...सर्व द नेशन एज योर ग्रेट ग्रैंड फादर...बड़े भाई, दोस्त, मार्गदर्शक की तरह ट्रीट करते थे सुशांत दादा. जब भी बिजनेस प्लान शेयर करता. कहते- जस्ट डू इट.. इट्स परफेक्ट.

नाम, शौहरत और पैसा तो आते-जाते रहते हैं, सच्चे दोस्त नहीं मिलते
मेरी छोटी सी कोशिश उन्हें बड़ी उड़ान लगती और वह हौसला अफजाई करते. मुझे कभी लगा ही नहीं कि वो एक सक्सेसफुल स्टार हैं और उनकी बड़ी फैन फॉलोइंग है. सादगी, सहजता और सरलता के साथ वह रिश्ते निभाते थे. अब वह नहीं हैं, यह सुनकर ही ज़िंदगी में इतना खालीपन आ गया है कि क्या कहूं? 2016 में क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पर बनी उनकी बायोपिक फिल्म हिट हुई तो मैंने यूं ही फोन कर छेड़ दिया था, 'दादा, अब आप बड़े स्टार हैं. बात के लिये अब किससे अपॉइंटमेंट लेना होगा?' जवाब था- 'एसपी...नाम, शोहरत और पैसे तो आते-जाते रहते हैं, सच्चे दोस्त नहीं मिलते.' दादा से हर मुलाकात गर्मजोशी के साथ हुई. स्विट्ज़रलैंड में एक ही फरमाइश होती इंडियन फूड या चीज फॉन्दू. कई बार बिल चुकाने पर भी तकरार हुई. स्विट्जरलैंड का वाशिंदा होने के नाते मैं मेजबानी हक समझता तो वह बड़े भाई के नाते अपना हक मानते. अंततः दोनों में एक ट्रीटी हुई. स्विट्ज़रलैंड में बिल मैं दूंगा और इंडिया में वे. ऐसा ही हुआ भी.

यकीन करुं तो भी कैसे?
मुम्बई में बिल उनके जिम्मे, स्विस में मेरे. 2017 में विंटर हॉलीडेज पर बॉलीवुड के अपने दोस्तों के साथ आये पर मुझे मिस करते रहे. कॉल आया आओगे नहीं. मैंने कहा - एग्‍जाम्‍स हैं, मुश्किल होगी. इस पर वह बोले- कोई नहीं मैं मॉन्त्रो आ रहा हूं. वह मॉन्त्रो आये तीन-चार घंटे साथ गुजारे और मॉन्त्रो में कई सक्सेस मन्त्र देकर वापस चले गये. लेकिन इस बार तो वह इस तरह गये कि मैं खुद निराशा के भंवर में डूबा कभी एल्प्स की पहाड़ियों में सुकून तलाश रहा हूं तो कभी मेरी पसंदीदा लेक जिनेवा के शीतल पानी में शांति तलाश रहा हूं. अब न वो स्विट्ज़रलैंड आएंगे न मुम्बई में मिल पायेंगे. 'आल्‍प्‍स' की तरह विशाल और 'लेक जिनेवा' की तरह गहरे और शांत थे मेरे दादा सुशांत राजपूत! इतना सपोर्टिव, एनर्जेटिक पर्सन ऐसा भी कर सकता है...यकीन करूंं तो भी कैसे?

(सुशांत सिंह राजपूत के करीबी और स्विस होटल मैनेजमेंट स्कूल के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सूर्यप्रताप सिंह भाटी से न्यूज़ 18 राजस्थान के वरिष्ठ सम्पादक श्रीपाल शक्तावत की बातचीत पर आधारित)

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