बंगला पॉलिटिक्स: फिर क्यों चर्चा में है गहलोत-राजे के बीच की राजनीतिक सदाशयता ?

Goverdhan Chaudhary | News18 Rajasthan
Updated: September 5, 2019, 4:32 PM IST
बंगला पॉलिटिक्स: फिर क्यों चर्चा में है गहलोत-राजे के बीच की राजनीतिक सदाशयता ?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सीएम अशोक गहलोत ने पूर्व सीएम वसुंधरा राजे से बंगला खाली नहीं करवाने के संकेत दिए हैं.फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।

जयपुर. पूर्व मुख्यमंत्रियों (Former chief ministers) को आजीवन सरकारी बंगला (Government bungalow) और स्टाफ सहित अन्य सुविधाएं देने पर रोक के हाईकोर्ट के फैसले (High Court verdict) के बाद अब मौजूदा सीएम अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) पूर्व सीएम वसुंधरा राजे (Former CM Vasundhara Raje) के बीच सौहार्दपूर्ण राजनीतिक रिश्तों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.

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जयपुर.  पूर्व मुख्यमंत्रियों (Former chief ministers) को आजीवन सरकारी बंगला (Government bungalow) और स्टाफ सहित अन्य सुविधाएं देने पर रोक के हाईकोर्ट के फैसले (High Court verdict) के बाद अब मौजूदा सीएम अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) पूर्व सीएम वसुंधरा राजे (Former CM Vasundhara Raje) के बीच सौहार्दपूर्ण राजनीतिक रिश्तों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सीएम अशोक गहलोत ने पूर्व सीएम वसुंधरा राजे से बंगला खाली नहीं करवाने के संकेत दिए हैं.

राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं हुई शुरू
हाईकोर्ट के आदेश के दिन ही सीएम ने साफ कर दिया कि आदेश को पूर्व सीएम से बंगला खाली नहीं करवाने से नहीं जोड़ा जाए. सीएम के इस बयान पर राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं. राजपा सांसद हनुमान बेनीवाल ने गहलोत के बयान पर पलटवार करते हुए इसे राजे-गहलोत की मिलीभगत करार देते हुए सीएम पर जानबूझकर कोर्ट की अवमानना करने का आरोप लगाया है.

फिर वही बंगला आवंटित करने की तैयारी

हालांकि 13 दिसंबर, 2018 को वसुंधरा राजे को जिस आदेश के तहत पूर्व सीएम के नाते बंगला आवंटित किया गया उस आदेश में साफ है कि यह आवंटन हाईकोर्ट में दायर रिट पिटिशन के अधीन रहेगा. अब हाईकोर्ट ने रिट पर फैसला दे दिया है तो एक बार उस आवंटन को रद्द करना कानूनन जरूरी हो गया है. बताया जाता है कि सरकार अब वरिष्ठ विधायक के नाते राजे को वही बंगला फिर आवंटित करने की तैयारी कर रही है.

निशाना साधने का कोई मौका नहीं चूकते
सीएम अशोक गहलोत और पूर्व सीएम वसुंधरा राजे सार्वजनिक रूप से भले ही एक दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं चूकते हैं, लेकिन जब बात पूर्व मुख्यमंत्रियों को सुविधा देने की आई तो दोनों ने ही सीएम रहते हुए एक दूसरे के प्रति सियासी सदाशयता दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके अलावा और भी कई मौके आए जब गहलोत-वसुंधरा के फैसलों में भी इस सदाशयता की झलक देखने को मिली.
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पावरलेस माथुर आयोग का गठन
वर्ष 2008 में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो राजे पर खूब आरोप लगाए थे. बीजेपी राज के कथित घोटालों की जांच के लिए गहलोत सरकार ने माथुर आयोग का गठन किया. लेकिन आयोग का गठन कमिश्नर ऑफ इंक्वायरीज एक्ट के तहत नहीं होने से यह आयोग पावरलेस ही रहा. नतीजा यह हुआ कि इस आयोग पर कोर्ट ने ही रोक लगा दी. उस समय जानबूझकर कमजोर आयोग बनाने के आरोप लगे.

गहलोत के पत्र का बीजेपी सरकार ने नहीं दिया था कोई जवाब
वसुंधरा राजे के सीएम रहते हुए बीजेपी राज में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास सहित अन्य सुविधाएं देने पर रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गहलोत ने पूर्व सीएम के नाते तत्कालीन सीएम राजे को पत्र लिखकर अपने बंगले पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करने को कहा था. गहलोत ने पत्र लिख पूछा था कि क्या उन्हें पूर्व सीएम के नाते आवंटित बंगला खाली करना है, लेकिन राजे सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया. अप्रैल 2017 में कानून बनाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगला और अन्य सुविधाएं देने का प्रावधान कर दिया. अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद फिर सियासी हलकों में गहलोत-राजे के बीच राजनीतिक सदाशयता की जबर्दस्त चर्चा है.

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First published: September 5, 2019, 4:30 PM IST
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