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    Rajasthan: रेगिस्तान के जहाज को बचाने की जुगत ! किसानों ने अपने स्तर पर उठाया बीड़ा, जानिये कैसे ?

    अब तक ऊंटनी का दूध ऊंट पालक औने पौने दामों में बेच रहे थे लेकिन अब उसकी मार्केटिंग कर 100 रुपए प्रति लीटर बेचा जा रहा है.
    अब तक ऊंटनी का दूध ऊंट पालक औने पौने दामों में बेच रहे थे लेकिन अब उसकी मार्केटिंग कर 100 रुपए प्रति लीटर बेचा जा रहा है.

    Desert ship in crisis: देश के 82 फीसदी ऊंट (Camel) राजस्थान में पाये जाते हैं. वर्ष 1961 में राजस्थान में ऊंटों की संख्या करीब 10 लाख थी जो अब घटकर महज 2 लाख 13 हजार रह गई है.

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    जयपुर. राजस्थान में ऊंट (Camel) केवल एक पशु नहीं बल्कि यहां की परम्परा और संस्कृति (Tradition and culture) का हिस्सा है. ढोला-मारु, पाबूजी, बाबा रामदेव, खिमवाजी और महेन्द्र-मूमल जैसे लोकगीत तो ऊंटों को आधार मान कर रचे ही गये हैं. राजस्थानी काव्य और पहेलियों में भी ऊंटों का अहम (Important) स्थान देखने को मिलता है. लेकिन अब राजस्थान की यह आन, बान और शान संकट (Crisis) में है. मशीनी युग में अनुपयोगी साबित होने के चलते रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंट का कुनबा लगातार कम होता जा रहा है.

    यांत्रिक खेती के जमाने में भी ऊंट से खेती को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं
    लुप्त होते ऊंट को बचाने के लिए कुछ किसान अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं. जयपुर के एक प्रगतिशील किसान सुरेन्द्र अवाना ने इसकी शुरुआत की है जो यांत्रिक खेती के जमाने में भी ऊंट से खेती को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. बिचून गांव में खेती में नवाचार आजमा रहे किसान सुरेन्द्र अवाना का कहना है कि ऊंट को खेती के काम लेकर जहां खर्च कम किया जा सकता है. वहीं इसके खेती में दूसरे भी कई फायदे हैं. अवाना से प्रेरणा लेकर आसपास के ऊंटपालक भी खेती में ऊंट का उपयोग कर रहे हैं. इतना ही नहीं अब तक ऊंटनी का दूध ऊंट पालक औने पौने दामों में बेच रहे थे लेकिन अब उसकी मार्केटिंग कर 100 रुपए प्रति लीटर बेचा जा रहा है. औषधीय गुणों से भरपूर ऊंटनी के दूध की डिमांड भी खूब है.

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    देश के करीब 82 फीसदी ऊंट राजस्थान में पाये जाते हैं


    आंकड़ों की अगर बात करें तो देश के करीब 82 फीसदी ऊंट राजस्थान में पाये जाते हैं. साल 1961 में राजस्थान में ऊंटों की संख्या करीब 10 लाख थी जो अब घटकर महज 2 लाख 13 हजार रह गई है. ऊंटों को बचाने के लिए विशेष प्रयास करने और किसानों को इसके फायदे समझाने की जरूरत है. कुछ दशकों पहले तक ऊंटगाड़ी सवारी और परिवहन का अहम माध्यम हुआ करता था लेकिन अब वाहनों की रेलमपेल और गांवों में कच्चे रास्ते खत्म होने से ऊंट की उपयोगिता लगातार घटती जा रही है. यही वजह है कि अब ऊंट पालना पशुपालकों के लिये मुनाफे का सौदा नहीं रहा है. ऊंट पालना ज्यादा खर्चीला होने की वजह से पशुपालक ऊंट पालन से दूर होते जा रहे हैं. ऊंटनी के प्रसव पर राज्य सरकार ने 10 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि देने की योजना शुरू की थी लेकिन अब वो राशि भी ऊंटपालको को नहीं मिल रही है.
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