आइये हम इस घड़ी में वो पर्वत-शिखर बनें जिसकी जरूरत इस दुनिया को आज भी है और हमेशा रहेगी - मुग्धा सिन्हा
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आइये हम इस घड़ी में वो पर्वत-शिखर बनें जिसकी जरूरत इस दुनिया को आज भी है और हमेशा रहेगी - मुग्धा सिन्हा
मुग्धा सिन्हा सीनियर आईएएस अधिकारी हैं. वे फिलहाल राजस्थान सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग में प्रमुख शासन सचिव हैं.

ये अंधियारा और रोगग्रस्त समय है. ऐसा समय जबकि सच कल्पना (Imagination) से भी ज्यादा अजनबी है. हकीकत किसी बुरे सपने से भी ज्यादा डरावनी है और बाकी सभी सच भी धुंधले हैं. कल्पना से कोसों दूर हैं.

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जयपुर. हम सबकी शुरुआत अजनबियों (Strangers) की तरह होती है और अंत श्रद्धांजलियों में बिसरा दिए गए लोगों की तरह. हालांकि हमें जिन चीजों से बचना चाहिए वे हैं न तो हम अजनबी दिखें और न ही रोगग्रस्त. क्योंकि ये अंधियारा और रोगग्रस्त समय है. ऐसा समय जबकि सच कल्पना (Imagination) से भी ज्यादा अजनबी है. हकीकत किसी बुरे सपने से भी ज्यादा डरावनी है और बाकी सभी सच भी धुंधले हैं. कल्पना से कोसों दूर हैं.

मैं उनके लिए प्रार्थना करती हूं
यह उन सब अजनबियों के लिए धन्यवाद स्वरूप है जिन्होंने मेरी जिन्दगी की राह में कभी न कभी अपना योगदान किया है और अब ऐसे लोग बॉर्डर क्रॉस करना चाहते हैं जबकि सबकुछ थमा हुआ है. उनके नाम, चेहरे-मोहरे, पहचान, कबीले, जाति और लिंग मायने नहीं रखते. उनकी तादाद ही हौंसला तोड़ने के लिए काफी है. यह उन सब अज्ञात, चेहराविहीन जन-सैलाबों के लिए है जो सड़कों पर निकले हुए हैं. जो भोजन, पानी, साधन और राहत के बिना ही उस स्थान तक पहुंचने की कोशिश में हैं जिसे घर कहते हैं. ऐसे अनगिनत लोगों के लिए जिनके न तो घर हैं और न ही चल सकने के लिए पांव या और ऐसे कई अदृश्य बिसरा दिए गए लोगों के लिए है जो गिनती में भी न आ सके. मैं उनके लिए प्रार्थना करती हूं.

मेरा मन रो रहा है



ऐसे तमाम लोगों के लिए उन अजनबी लोगों के लिए जो अब इतने जाने-पहचाने लगने लगे हैं. मेरा मन रो रहा है. आंसू मेरी आंखों के जैसे वसंत के फूल बन गए हैं, जिन्होंने इन अजनबियों की सहानुभूति में मुरझाने तक से मना कर दिया है. हां मैं रो रही हूं. हां मैं दुःखी हूं. बहुत दुःखी. और इस ‘टच मी नॉट’ के नए सीजन में आप लोगों ने हम सबको भीतर कहीं गहरे तक छुआ है जहां कोई वायरस कभी नहीं पहुंच पाएगा.



अब व्यर्थ लग रहा है
वह सुरक्षित आशियाना जिसने मेरी जिंदगी को आसान बनाया. अब व्यर्थ लग रहा है. मैं मानों खून से लिख रही हूं. मुझे आशा है कि यह आपके बहाए हुए पसीने और अथक मेहनत के बदले सम्मानजनक मेहनताना होगा. आपके पास तो आंसू बहाने का भी वक्त नहीं है. और यदि आप ऐसा करते भी हैं तो आप अपने रास्ते पर कैसे बढ़ पाएंगे. मेरा पूरा हृदय आपके लिए ही उमड़ रहा है और दूसरों को मैं अपने दिमाग का कुछ हिस्सा दे रही हूं.

आपके बच्चे हमारा भविष्य हैं
चूंकि अन्य बातों के साथ-साथ मैं खुद को कवयित्री भी मानती हूं जो आसानी से दोस्त बना लेती है. यहां तक कि अजनबियों को भी. इस दौरान जब मैं लिख रही हूं मैं आप सभी को बताना चाहती हूं कि मैं आपकी दोस्त हूं. मेरा हृदय आपकी ओर ही जाता है. मुझे अपने हाथों से खुद को छूने दीजिये. मेरी प्रार्थनाओं के दौरान आप ही मेरे जेहन में हैं. मेरी दुआ है कि आप चलते रहने के दौरान भी अपनी उम्मीदों पर विश्वास बनाए रखें. आपके बच्चे हमारा भविष्य हैं और मैं उनके व उनके परिवारों के लिए दुआ कर रही हूं. इस दुनिया के लिए भी जो एक वायरस के वैश्वीकरण के चलते एक भुतहा शहर में तब्दील होती जा रही है.
इसी के साथ मैं उन सभी अजनबियों को याद कर रही हूं जिन्होंने मुझे अच्छी यादें दीं. मैं आप सबकी शुक्रगुजार हूं, हमेशा के लिए.

“यहां कोई अजनबी नहीं है, सिर्फ दोस्त हैं जिनसे आप अब तक मिले नहीं हैं” -विलियम बटलर यीट्स (W. B. Yeats)

वह जमाना कहीं बेहतर था
ये नब्बे के दशक की शुरुआत की बात है जब मुझे ताज एक्सप्रेस या इंटरसिटी ट्रेन से आगरा और दिल्ली के बीच लगातार यात्राएं करनी पड़ती थीं. लगातार तीन साल तक मुझे इसी तरह घर से कॉलेज और कॉलेज से घर आना-जाना पड़ा. इसी दौरान दिल्ली में एक बार मुझे हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचने में कुछ देर हो गई. ‘तत्काल’ की टिकट खि़ड़की पर लंबी लाइनों से मेरा सामना हुआ. यहां तक कि ‘केवल महिलाओं’ वाली लाइन भी काफी लंबी थी. बुझी उम्मीद लेकिन दिमागी जुगत के साथ मैंने तीव्रता से फैसला लिया. पुरुषों की लाइन में लगे एक युवा लड़के से अपनी टिकट भी खरीद लेने की गुजारिश की. उसने भी बिना कोई सवाल किए या बिना कुछ कहे ये काम किया. सिर्फ एक बार देखा भर. उन दिनों बिलेट साइज की सलेटी-भूरे रंग की टिकटें हुआ करती थीं और तब तक कम्प्यूटरों ने उन्हें नीला नहीं किया था. उस वक्त ये विचार कि मुझे तीन घंटे लंबी यात्रा उसके साथ करनी है. मुझे डराता तो था फिर भी वह जमाना कहीं बेहतर था. उस सज्जन अजनबी का धन्यवाद जिसने उस दिन मेरे लिए घर पहुंचने की टिकट खरीदी थी और जिसकी बदौलत मैं अपने घर सकुशल पहुंच पाई थी.

मायूसी और अलग-थलग होने का भाव
बाद में उसी साल किसी और वक्त मुझे भी ऐसा करने का मौका मिला जब एक अजनबी उसी स्टेशन पर लेट हो रहा था और मैं टिकट विंडो पर लाइन में खड़ी थी. उसने मुझसे तीन टिकटें खरीदने की गुजारिश की और मैंने वैसा किया भी. उसी तरह बिना किसी हिचकिचाहट या सवाल के. केवल कृतज्ञ नजरें ही काफी थीं. यह दृश्य वही है जो चलते हुए या बॉर्डर पार करने की जुगत में इकट्ठा हुए या अपने घरों में अलग-थलग महसूस करते लोगों की आंखों में है. मायूसी और अलग-थलग होने का भाव. बेकरारी, डर और पीछे छूट जाने की चिंता. कभी न खत्म होने वाली लंबी कतारों का डर जहां आदमी मानवता के मुकाबले एक खतरनाक वायरस के ज्यादा नजदीक है. चेहरे के ये भाव अब अजनबी महसूस नहीं होते, बिल्कुल नहीं.

पूरी कायनात का बोझ उठाए हुए हैं
हमने अपनी आंखों पर जज्बात ओढ़ रखे हैं. जैसे हम आंखों में खारापन लिए फिरते हैं. ठीक उसी तरह कुछ लोग इस खारेपन के अलावा अपने कंधों और सिरों पर सामान और अपने बच्चों को उठाए हुए हैं. पूरी कायनात का बोझ. वे इसे उठाए चलते हैं या घंटों कतारों में इंतजार करते हैं. घरों, अस्पतालों या मुर्दाघरों तक पहुंचने के लिए. हां, हम भी मर रहे हैं उन्हें देखनेभर से. उनकी चिंताग्रस्तता और थकान के साथ हम भी चिंतित हैं. उतने ही चिंतित जितने कि हम अपने उन परिवारों के लिए हैं जिनसे हम बिछड़े हुए हैं. दूसरी बार मेरी मां इस तरह की भलमनसाहत की गवाह बनी. फिर से एक अजनबी ने उनके लिए टिकट लिया और वह भी तब जब मैंने अपनी मां को अपने पुराने वाकये के बारे में बताया. हमने इस बारे में बातचीत की कि किस तरह यह अच्छाई एक चेन (जंजीर) का रूप ले चुकी है जो बहुत लंबी है.

इस चेन को मत टूटने देना
दरअसल, मुझे रीडर्स डाइजेस्ट पढ़ना बहुत पसंद था. उसमें पढ़ी एक कहानी मुझे आज भी याद है जिसमें अमेरिका की एक महिला और उसकी दुधमुंही बेटी एक व्यस्त हाईवे के बीच कार खराब होने के चलते फंस गई थीं. उसने तेजी से गुजर रहे कई वाहनों को रुकने के इशारे भी किए लेकिन कोई नहीं रुका. बाद में एक ट्रक रुका जिसके हट्टे-कट्टे ड्राइवर ने उन्हें बड़ी सहृदयता से भीतर बुला लिया. ऐसे बुरे वक्त में जबकि घबराहट चरम पर होती है उसने ड्राइवर की बात मानी और ड्राइवर ने उसे घर के नजदीक छोड़ दिया. इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जब महिला ने अपने पर्स में से कुछ डॉलर निकालकर ट्रक ड्राइवर को धन्यवाद स्वरूप देने चाहे तो उसने मना कर दिया और सलाह दी ‘यदि आप वाकई मुझे धन्यवाद करना चाहती हैं तो इस चेन को मत टूटने देना. अगर कभी आप खुद जैसी स्थिति में किसी को पाएं तो आप भी मेरी तरह ही करना. यही आपकी कृतज्ञता होगी.’

चेरिटी स्टार्ट्स फ्रॉम होम
अब जब हमें कोरोना की चेन तोड़ने के मकसद से घरों में आइसोलेट होकर रहना पड़ रहा है. उस ट्रक ड्राइवर की नसीहत की तरह हम भी इस वक्त को मानव-चेन बनाने में काम में ले सकते हैं. यकीनन इसे शुरु करने का इससे अच्छा वक्त कोई हो ही नहीं सकता. कहा भी जाता है चेरिटी स्टार्ट्स फ्रॉम होम. और हां, ये प्रयास किसी भी शक्ल में हो सकता है. आइडिया, धन, सेवा, वक्त, हर चीज की अपनी अहमियत है.

भलमनसाहत प्रतिध्वनि की तरह है जो लौटती जरूर है
मैं तब से लेकर आज तक उन शब्दों पर कायम हूं. आज वे मेरे घर के आराम और मेरे मन की बेकरारी के बीच और तेजी से गूंजते हैं. क्योंकि भलमनसाहत प्रतिध्वनि की तरह है जो लौटती जरूर है. आइये हम इस घड़ी में वो पर्वत-शिखर बनें जिसकी जरूरत इस दुनिया को आज भी है और हमेशा रहेगी.आइये इस अजनबी वक्त में हम परिचित बनें. परिचित हों अपने आप से और उन लोगों से भी जिनसे मिलकर ये दुनिया बनी है.

सहूलियतों-नेमतों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें
आइये हम सब अपनी जिंदगी की खास सहूलियतों-नेमतों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें और उन्हें दूसरों की सेवा में लगाएं. इतने बुरे वक्त में हम क्यों ना अच्छे से अच्छा करें. हमें खुद के घाव भरना भी नहीं भूलना चाहिए. जब आप मनन करेंगे तो पाएंगे कि खुद को भीतर से जानने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता.

हम सब उनके लिए खड़े हों जिन्हें हमने देखा नहीं
जिस तरीके से हम आज प्रार्थनाएं कर रहे हैं उसी तरह आम आदमी की हमें आंसुओं से भिगो देने और घुटनों पर ले आने की ताकत भी कभी नहीं भूलनी चाहिए. जैसे हमारा सभी अदृश्य शक्तियों के सामने झुकना हमारी दृश्यता का मजाक उड़ाने जैसा है. आइये हम सब उनके लिए खड़े हों जिन्हें हमने देखा नहीं. जो भुला दिए गए. जो सिर्फ आंकड़ों में ही शामिल हैं. वो सभी तरह की आकृतियों, आकारों, लिंगों, धर्मों, समुदायों, कबीलों से आते हैं. वे हमारे घरों के भीतर, पड़ोस या ऑफिसों में हो सकते हैं. उनकी जगह हम हो सकते हैं. वे हमारी जगह हो सकते हैं. आइये हम अजनबियों को अपना दोस्त बनाए और उन्हें अपनी आत्मा में गूंथ लें. निष्ठुरता को हमदर्दी में बदल लें. ऊपर उठें.

लेखिका के बारे में: लेखिका मुग्धा सिन्हा सीनियर आईएएस अधिकारी हैं. वे फिलहाल राजस्थान सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग में प्रमुख शासन सचिव हैं. लोक सेवक होने के साथ-साथ वे आला दर्जे की लेखिका-कवयित्री भी हैं. (यह आर्टिकल मूलतः Strangers: The power of the Common Man शीर्षक से 2 अप्रैल, 2020 को ऑनलाइन Elets EGov मैग्जीन में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है. यह उसी का हिन्दी अनुवाद है.)

(रिपोर्ट- हितेन्द्र शर्मा)

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