ANALYSIS: कांग्रेस शासित राज्यों में अब तैयार है सत्ता का दूसरा केंद्र
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ANALYSIS: कांग्रेस शासित राज्यों में अब तैयार है सत्ता का दूसरा केंद्र
सचिन पायलट और अशोक गहलोत के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाकर राजस्थान में सत्ता संतुलन और दो शक्ति केंद्र का फार्मूला निकाला गया. तब ये माना जा रहा था कि उप मुख्यमंत्री का पद केवल प्रतीकात्मक होगा.

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  • Last Updated: December 25, 2018, 11:04 AM IST
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राजस्थान, छतीसगढ, मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के चयन के बाद मंत्रीमंडल गठन के दो संदेश साफ है. पहला यह कि अब राहुल गांधी रबर स्टांप हाईकमान नहीं, दूसरा यह कि कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पहले की तरह फैसलों की उतनी खुली छूट नहीं, न ही मुख्यमंत्री राज्य की सर्वोच्च सत्ता है. तीनों ही राज्यों में सत्ता का दूसरा केंद्र खड़ा हो चुका है.

सत्ता के दो केंद्र का सबसे बड़ा उदाहरण राजस्थान है. पहले विधानसभा चुनाव मे अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनो ही सीएम की कुर्सी की होड़ में खड़े थे. शायद तब राहुल गांधी की प्राथमिकता किसी एक को आगे करने के बजाय राजस्थान में सत्ता में आना रही हो.

नतीजों के बाद अशोक गहलोत और सचिन पायलट में से किसी एक को चुनने के लिए पर्ची के जरिए वोटिंग भी करवाई गई. यही नहीं, पार्टी के शक्ति ऐप से कार्यकर्ताओं की भी राय ली गई. लेकिन राहुल गांधी ने वही फैसला लिया, जिसका फैसला शायद गांधी परिवार पहले ही ले चुका था.



अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाकर राजस्थान में सत्ता संतुलन और दो शक्ति केंद्र का फार्मूला निकाला गया. तब ये माना जा रहा था कि उप मुख्यमंत्री का पद केवल प्रतीकात्मक होगा. सत्ता की असली कमान अशोक गहलोत के हाथ में ही होगी. मंत्रीमंडल गठन का वक्त आया तो सत्ता का दूसरा केंद्र साफ दिखाई देने लगा. मंत्रीमंडल बना तो तस्वीर साफ हो गई.
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अब तक पार्टी हाईकमान सीधे फैसले केवल मुख्यमंत्री के चयन में ही लेता रहा. मंत्रिमंडल का गठन मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार मानते हुए छोड़ दिया जाता था. सिर्फ चंद नाम सीएम को बता दिए जाते थे जिन्हे पार्टी नेतृत्व मंत्री बनाना चाहता था. हालांकि, इस बार ऐसा नहीं हुआ.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तीनों राज्यों में खुद कांग्रेस सरकार का मंत्रिमंडल बनाया. राजस्थान ही नहीं मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ का भी. मंत्रीमंडल के गठन में बाकायदा राज्यो के पार्टी के प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट ली गई. मुख्यमंत्री के चयन में नियुक्त पर्यवेक्षक की राय मंत्रियों के चयन में भी ली. फिर मुख्यमंत्री और दूसरे नंबर के नेता से समर्थको की सूची और राय मांगी, जिन्हें मंत्री बनवना चाहते है.

राजस्थान में तो ये फैसला करना इतना मुश्किल था कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने की भरपाई मंत्रीमंडल के गठन में करना चाहते थे. हालांकि मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के पद के समझौते के वक्त ही ये फार्मूला तय हो गया था कि मंत्रीमंडल में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की बराबर की हिस्सेदारी औऱ भागीदारी होगी, दोनो के कोटे से बराबर मंत्री बनेंगे. फार्मूला वही लागू हुआ, बावजूद इसके सचिन पायलट युवा चेहरों को मंत्रीमंडल में शामिल करवाने में अधिक कामयाब रहे. 18 नए मंत्री बनाए गए जिनमें से आठ सचिन पायलट के कोटे से.

प्रताप सिंह खाचरियावास, रमेश मीणा, मास्टर भंवरलाल, उदयलाल आजना, प्रमोद जैन भाया जैसे चेहरे गहलोत कैंप की कभी पसंद नही रहे. बावजूद सचिन पायलट ने इन्हें राहुल गांधी की कलम से मंत्री बनवा दिया, वजह यह कि ये चेहरे पायलट के कट्टर समर्थक रहे.

जयपुर के राजभवन में शपथ ग्रहण कार्यक्रम में मंत्री जब शपथ ले रहे थे तब राज्यपाल कल्याण सिंह के एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बैठे थे तो दूसरी ओर उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट. यानी सत्ता के दो केंद्र होने का पहला संदेश.

मंत्री के शपथ लेने के बाद हाव-भाव और अभिवादन का अंदाज झलक रहा था कि फलां मंत्री किसके कोटे से बना. सूबे में कांग्रेस की सत्ता के दो केंद्र साफ नजर आ रहे थे मंच पर.

सचिन पायलट कैंप के मंत्री मास्टर भंवरलाल से जब हमने पूछा कि गहलोत-पायलट में से भारी कौन, असली बॉस कौन? क्या मंत्रियो के सामने दिक्कत नहीं? मास्टर भंवरलाल के जवाब ने साफ इशारा किया कि सत्ता के दो केंद्र बन चुके हैं. भंवरलाल ने कहा कि गहलोत-पायलट मां-बेटे की तरह हैं. पार्टी मां, जिसके मुखिया पायलट हैं, बेटा सरकार है जिसके मुखिया अशोक गहलोत है. हालांकि उन्होंन फिर सफाई दी कि दोनों बराबर हैं, असली बॉ़स हाईकमान है.

यही सवाल हमने मंत्री पद की शपथ लेने वाले रघु शर्मा से पूछा तो उन्होंने बिना लाग-लपेट के कहा कि मंत्रीमंडल राहुल गांधी ने बनाया है. उन्होंने कहा कि आगे भी फैसले पार्टी नेतृत्व करेगा. यानी कई मंत्रियों ने मान लिया कि असली बॉस राहुल गांधी हैं.

जाहिर है राजस्थान में सरकार चलाने में गहलोत को इस बार फ्री हैंड नहीं है. सचिन पायलट का उप मुख्यमंत्री के रूप में दखल रहेगा. मंत्रीमंडल की बैठक में भी ये खींचतान दोनो गुटों में चलती रहेगी. फिर किसी मसले पर विवाद बढ़ने पर पंच राहुल गांधी ही होंगे.

पार्टी सूत्रो का कहना है कि ये राहुल गांधी की रणनीति का हिस्सा है. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को शक्तिशाली बनाने के लिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह शक्तियो का केंद्रीयकरण.

पंजाब में भले ही सत्ता कांग्रेस की हो, लेकिन कहा जाता है कि पंजाब की शक्ति का केंद्र चंडीगढ़ है दिल्ली नही. कांग्रेस के बजाय पंजाब की सरकार को अमरेंद्र सिंह की सरकार कहा जाता है. ये कसक राहुल गांधी को थी कि राज्यो में पहचान सिर्फ कांग्रेस की सरकार की हो.

किसानो की कर्जमाफी के फैसले के क्रियान्वयन भी 2019 के लिए संदेश देने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है कि राहुल गांधी अब असरदार है और कांग्रेस का राज्य सरकारों पर नियंत्रण है.

दरअसल मोदी लहर के बाद जैसे-जैसे कांग्रेस सिमटती गई, पार्टी हाईकमान के रूप मे शक्तियां भी कम होती गई. चार राज्यो में सिमटने के बाद हाईमान नाम मात्र का रह गया था. ऐसे में तीन राज्यो में सरकार बनाते वक्त राहुल गांधी के पास मौका था, कांग्रेस नेताओं को संदेश देने का कि वे असली बॉस हैं और फैसले वे ही लेंगे.

दरअसल सोनिया गांधी के कालखंड में कांग्रेस में क्षत्रपों को छूट मिली थी, तब मुख्यमंत्री राज्यों में ताकतवर हुआ करते थे. राज्यो की सत्ता पर सीधे नियंत्रण के बजाय परोक्ष रहा करता था. लेकिन राहुल गांधी की नई कांग्रेस में एक झलक इंदिरा गांधी की कांग्रेस की नजर आ रही है. अब कांग्रेस भले ही वैसी शक्तिशाली न हो लेकिन मजबूत करने के लिए उसी मॉडल की दिशा में काम हो रहा है.

राजस्थान में सचिन पायलट-अशोक गहलोत गुट के बीच सत्ता की साझेदारी करने की खींचतान में पार्टी के सीनियर नेता दरकिनार कर दिए गए. दोनो ही कैंप ने इनमें रुचि नहीं दिखाई. नतीजा ये हुआ कि केंद्रीय मंत्री रह चुके सीपी जोशी, विधानसभा अध्यक्ष रहे दीपेंद्र सिंह ,पूर्व मंत्री परसराम मोरदिया, राजेंद्र पारीक वरिष्ठ होने के बावजूद मंत्री नहीं बन सके. उनकी जगह यूनियर नेता मंत्री बन गए, वजह साफ है उनकी पैरवी गहलोत या पायलट में से किसी एक ने की.
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