OPINION: नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई के कारण टीके पर केंद्र को घेरने के बजाए अपने घमासान में उलझी कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी में आपसी खींचातानी से गर्माई राजस्थान की सियासत.

कांग्रेस पार्टी में आपसी खींचातानी से गर्माई राजस्थान की सियासत.

Rajasthan Politics: राजस्थान कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई सिर्फ गोविंद सिंह डोटासरा और शांति धारीवाल तक सीमित नहीं है. गहलोत मंत्रिमंडल में नंबर-दो की रस्साकशी धारीवाल और एक अन्य मंत्री बीडी कल्ला के बीच भी है.

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प्रदेश में कांग्रेस की कलह फैलती ही जा रही है. पहले यह गहलोत वर्सेज पायलट गुट के बीच सत्ता प्राप्ति के लिए था. पर अब टकराव में गहलोत गुट के अंदर ही गुटबाजी की नई परतें उघड़ने लगी हैं. पार्टी संगठन और सत्ता में वर्चस्व की लड़ाई चरम पर जा पहुंची है. प्रदेश अध्यक्ष और शिक्षामंत्री गोविंद डोटासरा और यूडीएच मिनिस्टर शांति धारीवाल के बीच घमासान तीसरे दिन भी जारी रहा. हालात यह हैं कि प्रदेश के इतिहास में पहली बार कोई मंत्री अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ इस कदर बगावती तेवर में हैं.

नेताओं में विवाद केंद्र से मुफ्त टीका लेने के नाम पर शुरू हुआ. दिलचस्प तथ्य यह है कि टीके पर केंद्र को घेरने के बजाए कांग्रेस पार्टी अपनों के बीच ही उलझ कर रह गई. मुफ्त टीकाकरण अभियान की पुरजोर वकालत करने के बजाए कांग्रेस के घर में बर्तन बजने लगे. और इस पर तुरुप का इक्का राज्यपाल ने चल दिया. कांग्रेस पार्टी ने मुफ्त टीके की मांग को लेकर राष्ट्रपति के नाम राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा. राज्यपाल ने राज्य में टीके की बर्बादी को लेकर मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख जांच के निर्देश दे दिए. उन्होंने कहा कि उचित कार्रवाई कर सरकार उन्हें बताए कि टीके की बर्बादी क्यों हो रही है? इस तरह कांग्रेस पार्टी की बॉल उन्हीं के पाले में आ गिरी.

डोटासरा का मंत्रिमंडल में कद छोटा, संगठन में बड़ा

दरअसल, ऊपरी तौर पर भले ही विवाद की जड़ में कोरोना वैक्सीनेशन दिख रहा हो, लेकिन अंदरखाने यह पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई ही है. डोटासरा वर्सेज धारीवाल पहली बार नहीं हुआ है. इनके बीच टिकट वितरण पर तकरार पहले भी हो चुकी है. धारीवाल कांग्रेस सरकार में वरिष्ठतम कैबिनेट मंत्री है, जबकि डोटासरा राज्य मंत्री हैं. लेकिन गहलोत-पायलट विवाद के बीच सचिन को हटाने के बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. राज्यमंत्री के नाते भले ही वे धारीवाल से कद में छोटे हों, लेकिन संगठन के नाते प्रदेश में सर्वेसर्वा हैं. एआईसीसी के निर्देशों के अनुपालन में वर्चस्व की लड़ाई आड़े आ रही है.
एआईसीसी के निर्देश के बाद भी नहीं रुके धारीवाल

यह तय है कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में डोटासरा के कद में इजाफा हुआ है. यही कुछ नेताओं को हजम नहीं हो रहा. वैक्सीनेशन पर एआईसीसी का सर्कुलर लाकर एक बार लगा था कि डोटासरा ने पहली बाजी जीत ली है. लेकिन धारीवाल ने न सिर्फ कैबिनेट बैठक में उन्हें "बहुत देखे हैं ऐसे अध्यक्ष" कहकर चिढ़ाया, वरन् पार्टी के निर्देश और प्रभारी होने के बावजूद वे जयपुर में नहीं रुके. वरिष्ठतम मंत्री की जगह पार्षद और निवर्तमान महासचिव को ज्ञापन देना पड़ा. यह सब पार्टी आलाकमान द्वारा धारीवाल और डोटासरा के बीच तूफानी टकराव की रिपोर्ट मांगने के बाद हुआ.

मंत्रिमंडल में नंबर दो कौन? धारीवाल-कल्ला के बीच दौड़



पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई सिर्फ डोटासरा-धारीवाल तक सीमित नहीं है. गहलोत मंत्रिमंडल में नंबर दो की रस्साकशी धारीवाल और ऊर्जा एवं जलदाय मंत्री बीडी कल्ला के बीच भी है. धारीवाल 13 और कल्ला 12 समितियों के अध्यक्ष या सदस्य हैं. दोनों में विभागीय कामकाज के अलावा गहलोत के बाद कौन पावरफुल है, इसे लेकर भी खींचतान है. पार्टी में चर्चा है कि विभागीय कामकाज को लेकर दोनों में कुछ अनबन चल रही है. मामला दोनों विभागों में इंजीनियरों की प्रतिनियुक्ति का बताया जाता है.

दूसरी ओर, गहलोत गुट के अंदर पनप रही इस गुटबाजी पर सचिन पायलट गुट पैनी नजर रखे हुए है. क्योंकि हेमाराम चौधरी के इस्तीफे का विवाद भी अभी सुलझा नहीं है. बस हेमाराम और हरीश चौधरी का संयुक्त दौरा कराकर पार्टी ने पायलट गुट को मीठी गोली दे दी है. यह कितनी कारगर होगी, वह इसी माह में पता चल जाएगा.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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