Rajasthan:सदियों से समाज में समरसता घोल रही है दादू की 'वाणी', जानिये क्या है खासियत

नरेना स्थित दादू पीठ में कई ऐसे चीजें हैं जो यहां देश - विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर करती हैं.
नरेना स्थित दादू पीठ में कई ऐसे चीजें हैं जो यहां देश - विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर करती हैं.

Dadu Panth: सामाजिक समरसता का प्रतीक दादू पंथ बेदह निराला है. दादू के साहित्य में केवल दादू पंथियों की ही वाणी नहीं है बल्कि कई अज्ञात साहित्यकारों (Unknown writers) का भी उसमें योगदान रहा है.

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जयपुर. भक्ति काल में यूं तो अथाह साहित्य रचा गया है, लेकिन दादू पंथ (Dadu Panth) का इसमें बेहद अहम योगदान रहा है. करीब 420 साल पुराने दादू पंथ की स्थापना भक्ति काल के प्रमुख संत और कवि दादूदयाल (Poet Dadudayal) ने 1601 में की थी. तब से अब तक करीब 300 साहित्यकारों से दादू की वाणी समृद्ध हुई है. इस वाणी यानि साहित्य के माध्यम से समाज उत्थान के साथ ही सामाजिक समरसता (Social harmony) का संदेश दिया गया है. खास बात ये है कि दादू के साहित्य में केवल दादू पंथियों की ही वाणी नहीं है बल्कि कई अज्ञात साहित्यकारों का भी उसमें योगदान रहा है.

परमात्मा का चिंतन और शाश्वत शांति का संदेश इस साहित्य का सार है. दादू पंथ का यह साहित्य कई अचरजों से भी भरा हुआ है. दादू पंथ में मूर्ति पूजा नहीं होती बल्कि वाणी को ही मंदिर में पूजा जाता है. समाजिक समरसता का संदेश देने वाले इस पंथ के केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि मुस्लिम और सिख भी अनुयाई है. दादूदयाल के रज्जब नाम के एक प्रसिद्ध मुस्लिम शिष्य भी थे. दादू पीठाधीश्वर गोपालदास महाराज का कहना है कि चूंकि दादू पंथ समाज सुधार का हिमायती रहा है और सामाजिक समरसता इसकी मूल भावना है लिहाजा यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है. जयपुर के नरेना स्थित दादू पीठ दादू पंथ की प्रधान पीठ है. यहां देश - विदेश से अनुयाई और श्रद्धालु आते हैं.

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कई अचम्भों से भरी है दादू पीठ
नरेना स्थित दादू पीठ में कई ऐसे चीजें हैं जो यहां देश - विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर करती हैं. यहां मौजूद 20 फीट चौड़ा और 16 फीट गहरा महाकड़ाव भारत के सबसे बड़े कड़ाहों में से एक है. इस कड़ाही में एक साथ हजारों लोगों का खाना बनता था. नागौर के कुशल लुहारों द्वारा बनाए गई इस कड़ाही को 8 बैलों की गाड़ी में लाया गया था. उस समय राज्यादेश था कि जो भी मकान या छप्पर इसके रास्ते में आए उसे हटा दिया जाए. इसी तरह कांच की एक बोतल पर जो अक्षर उकेरे गए हैं. उनके बारे में दावा है कि वो बाहर की तरफ से नहीं बल्कि बोतल के अंदर की तरफ से लिखे गए हैं. तंग मुंह की एक बोतल के अंदर चारपाई की कलाकृति बनी हुई है जो हैरान करती है कि आखिर इस बोतल के अंदर कैसे बनाया गया होगा. वहीं सुंदर से धातु के एक गोले के अंदर जो दीपक है वह गोले को किसी भी दिशा में घुमाने पर भी हमेशा सीधा ही रहता है. दादू पीठ में मौजूद एक विशाल ग्रंथ की रचना 10 अलग-अलग कवियों ने अलग-अलग काल में की है. लेकिन इस पूरे हस्तलिखित ग्रंथ में हैंड राइटिंग एक समान है. साथ ही ग्रंथ में जगह-जगह पर हाथों से बनाए हुए चित्र भी हैं.

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इन महारथियों ने भी माना लोहा
दादू पीठाधीशवर गोपालदास महाराज कहते हैं कि सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जब यहां आए थे तो संत दादूदयाल के चमत्कार से उनके बाज ने भी यहां ज्वार खाई थी. संत दादूदयाल की मुगल बादशाह अकबर से फतेहपुर सीकरी में 40 दिन ज्ञान चर्चा हुई थी. तब अकबर ने उनसे प्रभावित होकर हमेशा के लिए वहीं रुकने का आग्रह किया था लेकिन दादूदयाल राजी नहीं हुए. वहीं 1665 में संत गरीबदास के समय में मुगल शासक जहांगीर भी नरेना स्थित दादू पीठ में आए. यहां उन्होंने नौबत खाने और कुएं का निर्माण करवाया. उस समय के शिलालेख भी पीठ में मौजूद है.
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