जिंदा रहने के लिए कैसे बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे राजस्थान के लोग

सोचिए भरी गर्मी में पानी की एक बूंद न मिले तो कैसा लगेगा? लेकिन ऐसा वास्तव में हो रहा है राजस्थान के उन गांवों में जहां के कुएं और तालाब लगभग सूख चुके हैं. पढ़िए रोंगटे खड़े कर देने वाली एक सच्ची कहानी.

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Updated: June 12, 2019, 6:56 PM IST
जिंदा रहने के लिए कैसे बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे राजस्थान के लोग
राजस्थान के कई गांवों में तालाब और कुएं लगभग सूख चुके हैं. (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: June 12, 2019, 6:56 PM IST
हृदयेश जोशी
58 साल की सुकीबाई राजस्थान के करौली जिले में रहती हैं. उनका गांव है सकलूपुरा. हर रोज वह परिवार के लिए पानी लाती हैं. वो भी चार किलोमीटर से भी ज्यादा पैदल चलकर. दिन में एक बार नहीं तीन बार. इस राज्य में पानी की कमी बहुत बड़ी समस्या है. गर्मियों में इसका रूप और विकराल होता जा रहा है. लगभग सभी कुएं और तालाब सूख गए हैं. ज्यादातर लोग हैंड पंप पर निर्भर हैं. लेकिन यहां भी झुलसाने वाली गर्मी में पानी बमुश्किल ही मिलता है.



27 साल के उदय सिंह कहते हैं, ‘हैंड पंप से जो पानी आता भी है, वो ज्यादातर समय पीने लायक नहीं होता. हम इसे बर्तन धोने या जानवरों को नहलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. हमारी सारी उम्मीदें बारिश पर टिकी हैं. जब बारिश आती है, तभी हमें थोड़ी राहत मिलती है.’

सिर्फ राजस्थान ही नहीं, लगभग पूरा देश पानी की किल्लत से जूझ रहा है. केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 90 फीसदी से ज्यादा जलाशयों में क्षमता का 20 फीसदी पानी भी नहीं है.

65 साल में दूसरी बार सबसे कम प्री-मॉनसून बारिश

देश के पश्चिमी क्षेत्र के 27 जलाशयों में दस फीसदी से भी कम पानी है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक इस साल मार्च से मई के बीच देश में 23 फीसदी कम बारिश हुई है. पिछले 65 साल में ये दूसरी  सबसे कम प्री-मॉनसून बारिश है. खासतौर पर मराठवाड़ा और विदर्भ में हालात भयावह हैं. बारिश की कमी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने 30 करोड़ का फंड स्वीकृत किया है. इस फंड का इस्तेमाल इन क्षेत्रों में कृत्रिम बारिश के लिए किया जाना है.

राजस्थान में गरीब बच्चे और पुरुष बलुआ खदानों में काम करने को मजबूर हैं. यहां पर उन्हें गंभीर बीमारी सिलिकोसिस का शिकार होना पड़ता है.

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सूखा प्रभावित चेन्नई में जलाशय लगभग सूख गए हैं. महज एक फीसदी पानी बचा है. नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि अगले साल तक देश के 21 जिलों में ग्राउंड वॉटर बिल्कुल नहीं बचेगा. इसका मतलब है कि दस करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे हालात के सामने खड़े हैं, जहां उनके लिए पानी बिल्कुल नहीं बचेगा.

राजस्थान और बुंदेलखंड जैसी जगहों पर सूखे की वजह से लोगों का पलायन करना बढ़ता जा रहा है. यहां पर फसलें खत्म हो रही हैं. गांव में कोई काम नहीं है. राजस्थान के करौली जिले में रहने वाले राम सहाय कहते हैं, ‘गांव में कोई भी नहीं रहना चाहता. हर दिन इस तरह की दिक्कतों के साथ कौन रहना चाहेगा?

सिलिकोसिस बीमारी का शिकार लोग

पानी की कमी का एक और पहलू है, जो बेहद चिंताजनक है. यह स्वास्थ्य से जुड़ा है. गरीब लोग इसके नतीजे जानते हुए भी अपनी नियति को मानो स्वीकार कर चुके हैं. राजस्थान में पानी के बगैर खेती हो नहीं सकती. इसके चलते बहुत से गरीब बच्चे और पुरुष बलुआ खदानों में काम करने को मजबूर हैं. यहां पर उन्हें गंभीर बीमारी सिलिकोसिस का शिकार होना पड़ता है. इस बीमारी से हजारों मजदूर पिछले कुछ दशकों में अपनी जान गंवा चुके हैं. जब वे खदानों में पत्थर की कटाई करते हैं, तो इससे निकलने वाली सिलिका डस्ट या धूल उनके फेफड़ों में जम जाती है.

राजस्थान के सिरोही जिले में सिलिकोसिस मरीजों की मदद के लिए काम कर रहे सरफराज शेख कहते हैं, ‘यह बीमारी लाइलाज है. मजदूरों की मजबूरी है कि वे इन खदानों में काम करें, क्योंकि जिंदगी चलाने का और कोई जरिया नहीं है. पानी की कमी ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है, क्योंकि राज्य के कई हिस्सों में खेती संभव ही नहीं है.’ पिछले साल राजस्थान सरकार की सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2015 से फरवरी 2017 के बीच राज्य में करीब 8 हजार सिलिकोसिस मरीज पाए गए. बहुत से ऐसे इलाके हैं, जहां गांवों को विधवाओं का गांव कहा जाता है. इसकी वजह यही है कि इन गांवों के तमाम पुरुष सिलिकोसिस का शिकार हो चुके हैं.

मोझीराम का कहना है कि पानी की कमी की वजह से दर-दर भटकना पढ़ रहा है.


इस तरह के हालात में भी उम्मीद की एक किरण है. पिछले कुछ सालों में राज्य के कई इलाकों में ग्रामीण निवासियों ने बड़े और छोटे तालाब खोदे हैं. इसमें वे बारिश का पानी जमा करते हैं. इससे ग्राउंड वॉटर वापस जमा होने में मदद मिलती है.

मशालपुर तहसील के एक गांव सपेरे का पुरा में रहने वाले 51 साल के मोझीराम ने बाकी गांव वालों की मदद से अपने घर के ठीक सामने बड़ा तालाब खोदा है. यहां वे बारिश का पानी जमा करते हैं. हालांकि इस गर्मी में वो तालाब सूख गया है, उसके बावजूद हैंड पंप से उनसे परिवार और गांव वालों को पानी मिल रहा है.

मोझीराम कहते हैं, ‘गांव वालों ने साथ मिलकर पानी की समस्या से लड़ने का फैसला किया. लंबी गर्मियों में इन तालाबों से खेतों की सिंचाई और रोजाना की जरूरत के लिए पानी मिलने में मदद मिलती है. जब ये तालाब सूख जाते हैं, तो दोबारा बारिश का मौसम आने और तालाब भरने तक हम हैंड पंप से पानी लेते हैं.

लोग मिट्टी के तालाब बनाने को मजबूर

मुश्किल हालातों और प्रशासन की उदासीनता के बीच गांवों में तालाबों का होना ही उनकी दुनिया को बनाए और बचाए रखने का एकमात्र उपाय दिखाई देता है. मोझीराम के गांव से कुछ किलोमीटर दूर मर्दाइकलां है. यहां करीब 100 गांव वालों ने 60 फुट ऊंची मिट्टी की दीवार 2012 में बनाई थी. इसमें बारिश के पानी को इकट्ठा किया जाता है. इसने अपना काम किया. धीरे-धीरे यह तालाब बढ़ता गया. आज हालत यह है कि इस गर्मी में भी जलाशय में पानी है, जो गांव वालों और जानवरों के काम आ रहा है.

47 साल के रणवीर सिंह कहते हैं, ‘जब बारिश आती है, तो यह तालाब करीब 50 एकड़ क्षेत्र में फैल जाता है. इससे हमको अपनी सभी जरूरतों के लिए पानी मिलने में मदद होती है.’ इस तरह के तालाब ग्राउंड वॉटर को पुनर्जीवित करने और और खेती में मदद के लिए बहुत काम आते हैं.

रणवीर कहते हैं, ‘पहले गांव के बहुत से युवा बलुआ खदानों में काम करने जाते थे, जो करीब ही है. अब वहां हमारे गांव से कोई नहीं जाता. हम खेतों में काम कर सकते हैं. इससे हमने पानी की समस्या से तो निजात पाई ही है, सिलिकोसिस से भी लड़ने में कामयाब रहे हैं.’

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