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BHU विवाद: डॉ. फिरोज खान के घर में पलती है हिन्‍दू संस्कृति, गौपालक पिता हैं भगवान कृष्ण के उपासक

News18 Rajasthan
Updated: November 20, 2019, 2:10 PM IST
BHU विवाद: डॉ. फिरोज खान के घर में पलती है हिन्‍दू संस्कृति, गौपालक पिता हैं भगवान कृष्ण के उपासक
डॉ. फिरोज खान के पिता भी संस्कृत से स्नातक हैं. (फाइल फोटो)

डॉ. फिरोज खान (Dr. Feroz Khan) के पिता रमजान खान का कहना है कि संस्कृत (Sanskrit) से प्रेम करने का मतलब है देश से प्रेम. दिवाली के दिन बेटी जन्म लेने पर रमजान खान ने उसका नाम लक्ष्मी रख दिया.

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(रिपोर्ट- भवानी सिंह)

जयपुर. बनारस हिन्‍दू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. फिरोज खान (Dr. Feroz Khan) भले ही मुस्लिम हैं, लेकिन कर्म से उनके पूरे परिवार का सनातन धर्म से गहरा लगाव है. इनके पिता रमजान खान (Ramadan Khan) गौसेवक हैं. वह एक गौशाला चलाते हैं. इसके चलते पूरे कस्बे के लोग रमजान खान को गौपालक (Gopalak) के रूप में जानते हैं.

डॉ. फिरोज खान के पिता जयपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर बगरु कस्बे में रहते हैं. वह यहां पर एक गौशाला चलाते हैं. गौशाला में उन्हें गायों को गुड़ और चारा खिलाते हुए कभी भी देखा जा सकता है. जब न्यूज18 की टीम मौके पर पहुंची तो वह गायों को गुड़ खिला रहे थे. गौसेवा के अलावा रमजान खान का ज्योतिष विद्या में भी विश्वास है. यही वजह है कि उन्होंने एक ज्योतिष से पूछकर अपना नाम मुन्ना मास्टर रख लिया. अब उन्हें पूरे कस्बे के लोग मुन्ना मास्टर के नाम से भी बुलाते हैं.

हिन्‍दू संस्कृति के अनुसार ही जीते हैं जीवन

मुन्ना मास्टर ने कहा कि उन्हें मुसलमान होने का अहसास पहली बार तब हुआ जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में डॉ. फिरोज खान की संस्कृत के सहायक आचार्य पर नियुक्ति का विरोध शुरू हुआ. मुन्ना मास्टर कहते हैं कि अब तक हिंदुत्व उनकी पहचान थी. वह हिन्‍दू संस्कृति के अनुसार ही जीवन जी रहे हैं. यही कारण है कि उन्होंने संस्कृत में स्नातक की उपाधि ली थी. इसके बाद बेटे फिरोज को भी संस्कृत की शिक्षा दिलाई, ताकि वह हिंदू धर्म ग्रंथों का संस्कृत में अध्ययन कर सके. मुन्ना मास्टर का कहना है कि संस्कृत से प्रेम का मतलब है देश से प्रेम और यही सच्ची देशभक्ति है. फिरोज को संस्कृत से प्रेम है, इसलिए उन्‍होंने उर्दू के बजाय संस्कृत को चुना.

संस्कृत की ओर था झुकाव
शुरुआती दौर को याद करते हुए रमजान खान कहते हैं कि पहले उन्होंने अपने बेटे फिरोज का दाखिला एक एक निजी स्कूल में कराया था. लेकिन, उनका झुकाव संस्कृत की ओर था. इसलिए फिरोज का दाखिला कस्बे की सरकारी संस्कृत स्कूल में करा दिया गया. फिर संस्कृत के प्रति उसकी जो यात्रा शुरू हुई, इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
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भगवान कृष्ण के भी मुरीद हैं
मुन्ना मास्टर गौसेवक के साथ-साथ भगवान कृष्ण के भी मुरीद हैं. उन्होंने कृष्ण की वंदना के कई भजन लिखे हैं. साथ ही गाय की महिमा और गौमाता की महानता पर भजन लिखे हैं. वह खुद भजन गायक भी हैं. उन्होंने 'श्री श्याम सुरभि वंदना' के नाम से एक पुस्तक भी लिखी है, जिसका प्रकाशन हिंदू धर्म की ही एक संस्था ने किया है. हनुमान चालीसा और रामायण की चौपाईयां भी कंठस्थ है. हिंदू मंदिरों में मुन्ना मास्टर को भजन गाने के लिए बुलाया जाता है. मुन्ना मास्टर ने बताया कि वह हिंदू संस्कृति में रचे बसे हैं. दीपावली के दिन बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने बेटी का नाम ही लक्ष्मी रख दिया.

धर्मग्रंथ में हैं पारंगत
रमजान खान कहते हैं कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में विरोध कर रहे छात्र अगर फिरोज की पृष्ठभूमि जानते तो विरोध नहीं करते. फिरोज कई संस्कृत साहित्य और धर्मग्रंथ में पारंगत हैं. उसे अगर पढ़ाने का मौका दिया तो छात्र कभी उसका विरोध नहीं करेंगे. फिरोज की सुरक्षा को लेकर डर या चिंता पर रामायण की एक चौपाई सुनाते हुए उन्होंने कहा कि राम रचि राखा...होगा वही जो राम को मंजूर होगा. मुन्ना मास्टर के पिता यानी फिरोज के दादा मास्टर गफूर खान भी संगीतज्ञ और गौभक्त थे. मुन्ना मास्टर कहते हैं कि गफूर खान गौमाता को रोटी खिलाने के बाद ही खुद खाते थे. यही वजह है कि 23 साल से मुन्ना मास्टर भी पिता की तरह गौसेवा में लीन हैं.

'फिरोज को रोकना देववाणी का अपमान'
फिरोज खान ने संस्कृत की स्कूली शिक्षा बगरु में ही सरकारी संस्कृत स्कूल से ली. स्कूल में फिरोज खान को संस्कृत पढ़ाने वाली शिक्षिका गायत्री पाठक कहती हैं कि फिरोज को संस्कृत पढ़ाने से रोकना देववाणी का अपमान है. वह कहती हैं कि अगर ऐसा हुआ तो उसका असर उनके स्कूल में पड़ेगा, जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के छात्र संस्कृत पढ़ रहे हैं. दरअसल, राजस्थान में यह अकेला मुस्लिम परिवार संस्कृत पढ़ने या हिंदू संस्कृति को अपनाने का उदाहरण नहीं है. राजस्थान में अधिकतर जगहों पर हिंदू-मुस्लिम की मिलीजुली संस्कृति है, जहां मुस्लिम संस्कृत स्कूलों में जाते हैं. मस्जिद में नमाज भी पढ़ते हैं तो मंदिरों में आरती में भी शामिल होते हैं. भले ही मजहब अलग हो, लेकिन सांस्कृति से जुड़ाव गहरा है. फिरोज उसी संस्कृति का एक उदाहरण हैं, जिससे मुल्क प्रेरणा ले सकता है.

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First published: November 20, 2019, 1:39 PM IST
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