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देशभक्त को अंतिम सलाम : दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले जांबाज सिपाही शंकर सिंह नाथावत गहरी नींद सोए

देशभक्त को अंतिम सलाम : दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले जांबाज सिपाही शंकर सिंह नाथावत गहरी नींद सोए

अपनी वीरता के लिए शंकर सिंह नाथावत को राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर दर्जनभर सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है.

अपनी वीरता के लिए शंकर सिंह नाथावत को राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर दर्जनभर सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है.

आगामी पीढ़ी को देहदान की प्रेरणा देने के लिए शंकर सिंह नाथावत की देह को परिजनों ने दान कर दिया है.

जयपुर. आजादी के बाद पाकिस्तान, चीन जैसे देशों से लोहा लेने वाले राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत सेना (Patriotic soldier) के पूर्व अधिकारी शंकर सिंह नाथावत अब हमारे बीच नहीं रहे. राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शंकर सिंह नाथावत ने भले ही देह त्याग दी है, लेकिन 90 साल तक हर व्यक्ति के दिल में राष्ट्र प्रेम की अलख जगाने का उनका संदेश आगामी पीढ़ी के लिए मिसाल बन गया है. आगामी पीढ़ी को देहदान की प्रेरणा देने के लिए शंकर सिंह नाथावत की देह को परिजनों ने दान कर दिया है. देहदान के लिए संकल्प लेने वाले नाथावत दंपत्ति का मकसद सिर्फ एक है कि जीने के साथ मरने के बाद भी उनके शरीर का हर हिस्सा राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे.

अंधेरे में भी लगाते थे सटीक निशाना
अपनी वीरता के लिए शंकर सिंह नाथावत को राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर दर्जनभर सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है. शंकर सिंह नाथावत भारतीय सेना के एक ऐसे साहसी सिपाही थे, जिन्होंने देश के विभाजन के बाद भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन युद्ध में अहम भूमिका निभाई. शंकर सिंह नाथावत देश के उन चुनिंदा जाबांज सैन्य अधिकारियों में एक थे जो अंधेरे में महज आवाज के आधार पर दुश्मन पर सटीक निशाना लगाते थे. देश ने उनकी इस कला का इस्तेमाल आजादी के बाद से 1975 तक लड़े गए प्रत्येक युद्ध में किया. शंकर सिंह 15 वर्ष की उम्र में ही राष्ट्रीय संग्रामों में कूद पड़े, लेकिन 1946 में उन्होंने भारतीय सेना में लोकेटिंग रेजीमेंट में उपस्थिति दर्ज करवाई. फिर सेना में कैरियर की शुरुआत में ही भारत-पाक विभाजन के दौर का सामना हुआ, जिससे उनकी राष्ट्र भावना की अलख तेज हो गई. उसके बाद भारत-पाक युद्ध में कश्मीर के नौसेरी में दुश्मन के सामने कमान संभालने का मौका मिला. वहीं भारत-चाइना युद्ध में ये तवांग पर किए गए हमले में छाए रहे. पाकिस्तान से बांग्लादेश को मुक्त कराने के अभियान में ये ढाका तक पहुंचे. यहीं नहीं गोवा मुक्ति संग्राम से लेकर अन्ना हजारे के साथ संग्राम में भी शंकर सिंह ने अपना अहम रोल अदा किया है.

दो सांडों की लड़ाई में लगी गहरी चोट
शंकर सिंह नाथावत कुछ दिन पहले मॉर्निंग वॉक पर निकले थे, लेकिन सड़क पर आवारा घूमने वाले दो सांडों की लड़ाई में उन्हें गहरी चोट लगी, जिससे उनकी मौत हो गई. स्वर्गीय शंकर सिंह नाथावत की पुत्री सुजाता का कहना है की देश के दुश्मनों से लोहा लेने वाले उनके पिता स्थानीय प्रशासन की लापरवाही से जिंदगी की जंग हार गए.

देहदान का संदेश दिया युवाओं में
सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद शंकर सिंह नाथावात और उनकी पत्नि अर्चना कंवर खुद देहदान के लिए तैयार हुए. वर्ष 2007 में देहदान का संकल्प लेने के बाद उन्होंने इसके महत्व को अपने नजदीकी रिश्तेदारों और परिजनों को भी समझाया. उनका मकसद देहदान का संदेश जन-जन तक पहुंचा कर जरूरतमंद को नया जीवन देने का था. देहदान के लिए प्रेरित करने वाले शंकर सिंह नाथावत और उनकी पत्नि अर्चना कंवर का जीवन राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत रहा है. 1930 में जन्मे शंकर सिंह और अर्चना कंवर 1955 में जीवनसाथी बने. सेना में सेवाएं पूरी करने के बाद नाथावत दंपत्ति ने राष्ट्रहित में अपना योगदान जारी रखा. करीब तेरह साल पहले नाथावत दंपत्ति ने अपनी देह को राष्ट्र निर्माण लिए दान करने का निर्णय लिया. शंकर सिंह नाथावत की पत्नि अर्चना कंवर इसी साल 3 जनवरी को दुनिया को विदा कह गईं. तब शंकर सिंह नाथावत ने अपनी पत्नी के सपने को साकार करने के लिए उनकी देह को दान कर पत्नी से किया वचन निभाया था. शंकर सिंह नाथावत ने उनकी देह सवाई मानसिंह अस्पताल में दान में दी, जिससे उनके शरीर का हर जरूरी अंग किसी को नई जिंदगी दे सके.

Tags: Death, Jaipur news, Rajasthan news

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