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नासे रोग हरे सब पीरा: राजस्थान में असीम आस्था के केन्द्र हैं मेहंदीपुर बालाजी

मंदिर की बनावट परम्परागत राजपूत वास्तुकला से प्रभावित है. मंदिर में चार प्रांगण हैं. पहले दो में भैरव बाबा और बाला जी की मूर्ति है. तीसरे और चौथे में दुष्ट आत्माओं के सरदार प्रेत राज का प्रांगण है.

मंदिर की बनावट परम्परागत राजपूत वास्तुकला से प्रभावित है. मंदिर में चार प्रांगण हैं. पहले दो में भैरव बाबा और बाला जी की मूर्ति है. तीसरे और चौथे में दुष्ट आत्माओं के सरदार प्रेत राज का प्रांगण है.

Mehndipur Balaji Temple: इस मंदिर का इतिहास एक हजार वर्ष पुराना बताया जाता है. इस मंदिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई बल्कि यह स्वंयभू है. यह मंदिर भूत-प्रेतादि और ऊपरी बाधाओं के निवारण के लिये पूरे विश्वभर में विख्यात (World famous) है.

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    हरीश मलिक

    जयपुर. देश में हनुमान जी (Hanuman ji) के लाखों मंदिर हैं, लेकिन कुछ मंदिर अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध हैं. इन मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ता है. ऐसा ही एक मंदिर राजस्थान में मेहन्दीपुर स्थित बालाजी (Mehndipur Balaji Temple) का चमत्कारित मंदिर है. हनुमान चालीसा में वर्णित ''नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत वीरा...'' की उक्ति को यह मंदिर चरितार्थ करता है. मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के सारे रोग और दुख बालाजी हर लेते हैं. दो अति सुरम्य पहाड़ियों के बीच की घाटी में स्थित होने के कारण यह मंदिर घाटा मेहन्दीपुर भी कहलाता है. यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है. इस मंदिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई बल्कि यह स्वंयभू है.

    हनुमानजी देशभर में रूद्र अवतार, सूर्य-शिष्य, ​बजरंगबली,​ केसरी नन्दन, वायु-पुत्र, अंजनि-सुत और श्री बालाजी के नाम से पूजे जाते हैं. माता अंजनि के गर्भ से प्रकट हनुमान जी में पांच देवताओं का तेज समाहित है. बालाजी की यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मंदिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है. इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मंदिर का निर्माण कराया गया है. इस मूर्ति के सीने के बांई तरफ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है, जिससे पवित्र जल की धारा बहती रहती है. यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है जिसे भक्तजन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं. कलियुग में भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार हनुमान जी को सबसे ज्यादा पूजा जाता है. यही कारण है कि हनुमान जी को कलयुग का जीवंत देवता कहा गया है. बालाजी अपने भक्तों को सहज ही अष्टसिद्धी, नवनिधि और फिर मोक्ष प्रदान करते हैं.

    बालाजी मंदिर का इतिहास
    मंदिर का इतिहास 1000 साल पुराना है. प्रारंभ में यहां बीहड़ जंगल था. चारों तरफ फैली घनी झाड़ियों में जानवरों का बसेरा था. मंदिर के पीछे कहानी बताई जाती है कि एक बार पुराने महंत जिनको लोग घंटे वाले बाबा जी भी कहते हैं उन्होंने एक सपना देखा था. स्वप्न की अवस्था में ही वे उठ कर चल दिए. उन्होंने एक विचित्र लीला देखी. एक ओर से हजारों दीपक जलते आ रहे हैं. हाथी-घोड़ों की आवाजें आ रही हैं और एक बड़ी फौज चली आ रही है. उस फौज ने श्री बालाजी महाराज की मूर्ति की तीन प्रदक्षिणाएं की. फौज के प्रधान ने नीचे उतरकर श्री बालाजी महाराज को दण्डवत प्रणाम किया तथा जिस रास्ते वे आए उसी रास्ते को चले गए. महंत ने तीन देवताओं को देखा जो कि बालाजी मंदिर के निर्माण का पहला संकेत था.

    मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा
    स्वप्न में अचानक भगवान प्रकट हुए और उन्होंने महंत को आदेश दिया कि वे सेवा करके अपने कर्तव्य का निर्वहन करें. दूसरे दिन महंत महाराज उस मूर्ति के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि चारों ओर से घंटा-घड़ियाल और नगाड़ों की आवाज आ रही है. किन्तु दिखाई कुछ नहीं दिया. इसके बाद उन्होंने आस-पास के लोग इकट्ठे किए और सारी बातें उन्हें बताई. सब लोगों के साथ मिलकर वहां बालाजी महाराज की एक छोटी सी तिवारी बना दी. तत्पश्चात वहां पूजा-अर्चना होने लगी. मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की. वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई. वे अपने कुप्रयासों में असफल साबित हुए.

    बालाजी मंदिर के बारे में दस फैक्ट जो आपके लिए जानना जरूरी है

    1.राजपूताना शैली का मंदिर
    मंदिर की बनावट परम्परागत राजपूत वास्तुकला से प्रभावित है. मंदिर में चार प्रांगण हैं. पहले दो में भैरव बाबा और बाला जी की मूर्ति है. तीसरे और चौथे में दुष्ट आत्माओं के सरदार प्रेत राज का प्रांगण है. जो लोग दुष्ट आत्मा से परेशान हैं वे यहां पूजा करते हैं. इसके आस पास का मनोरम दृश्य और अद्भुत वास्तुकला मंदिर की पहचान बन गई है. हजारों लोग इस मंदिर के दर्शन के लिए रोज आते हैं.

    2.आधा करौली, आधा भाग दौसा में
    इस मंदिर का आधा भाग करौली और आधा भाग दौसा जिले में है. इसके सामने ही एक राम मंदिर है. वह भी इसी तरह दो भागों में बंटा हुआ है. यह मंदिर करौली जिले के टोडाभीम में स्थित है और हिण्डौन शहर के एकदम नजदीक है. जयपुर से मंदिर की दूरी 65 किलोमीटर और दिल्ली से 255 किमी है.

    3. बालाजी का चमत्कारी चोला
    ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया. इस चोले को गंगा में प्रवाहित करना था. भक्तजन समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंचे. ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा. लेकिन चमत्कारी चोला कभी भारी हो जाता और कभी हल्का. असमंजस में पड़े रेलवे स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया. इसके बाद बालाजी को नया चोला चढ़ाया गया.

    4. तीनों देवों का अलग प्रसाद
    बालाजी का यह मंदिर भूत-प्रेतादि और ऊपरी बाधाओं के निवारण के लिये पूरे विश्वभर में विख्यात है. मान्यता है कि तंत्र-मंत्र और ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी बालाजी महाराज की कृपा से बिना दवा के स्वस्थ होकर लौटते हैं. दुखी, कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढ़ाना पड़ता है. बालाजी को लड्डू, प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढ़ाया जाता है.

    5. श्री प्रेतराज सरकार
    बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं. प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है. प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है. भक्ति-भाव से उनकी आरती, चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं. बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है. इनकी पृथक रूप से आराधना, उपासना कहीं नही की जाती है. न ही इनका पृथक रूप से कोई मंदिर है. प्रेतराज श्रद्वा और भावना के देवता हैं.

    6. कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव
    कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं. वे भक्तों की थोड़ी सी पूजा अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं. भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं. उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पांचवां कटा शीश रहता है. वे लाल वस्त्र धारण करते हैं. वे भस्म लपेटते हैं. उनकी मूर्ति पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है. भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं. इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है.
     
    7. मंगल-शनि को विशेष पूजा
    कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही घबरा जाते हैं. उनका मानना होता है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति ही बालाजी के मंदिर में जाते हैं. परन्तु ऐसा नहीं है. कोई भी भक्त जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला हो वह इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है. शनिवार और मंगलवार को इस मंदिर में विशेष रूप से पूजा होती है. दुष्ट आत्माओं के संकट से बचने के लिए जो पीड़ित व्यक्ति है वह प्रसाद के रूप में अर्जी, स्वामिनी, दरखास्त, बूंदी के लड्डू इत्यादि को बालाजी महाराज के ऊपर चढ़ाकर ग्रहण करते हैं.

    8. मंदिर के नजदीक दर्शनीय स्थल
    मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के नजदीक और भी मंदिर हैं. उनके भी लोग दर्शन करते हैं. मंदिर के आसपास अंजनी माता मंदिर, काली माता जी की मंदिर है जो कि तीन पहाड़ पर स्थित हैं. पंचमुखी हनुमान जी का मंदिर और गणेश जी का मंदिर है जो कि सात पहाड़ पर स्थित है. मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में एक और महत्वपूर्ण स्थान है जिसका लोग दर्शन ज़रूर करते हैं. वह है समाधि वाले बाबा. यह मंदिर के सबसे पहले महंत थे.

    9. मन्दिर से जुड़ी धारणाएं
    इस मंदिर से लोगों की यह धारणा जुड़ी है कि अगर यहां के भोग प्रसाद को खाए तो सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. लोगों की यह मान्यता है कि यहां पर मिलने वाले पत्थर से इलाज कराने पर जोड़ों का दर्द, सीने की तकलीफ या किसी भी तरह की शारीरिक तकलीफ हो वह दूर हो जाती है. हालांकि मेडिकल साइंस में इन दावों को नकारा गया है. लेकिन लोगों के विश्वास की अलौकिक शक्ति से हजारों भक्त यहां आते हैं. इस मंदिर में होली, हनुमान जयंती और दशहरा जैसे पूजा और त्योहार बहुत धूमधाम से मनाये जाते हैं.

    10. बालाजी मंदिर में वर्जित कार्य
    ऐसा माना जाता है कि मंदिर के पास भूल कर कुछ कामों को नहीं करना चाहिए. इससे अशुभ होता है. जैसे कि कभी भी जब आप मंदिर से बाहर निकलें तो पीछे मंदिर की तरफ मुड़ कर नहीं देखना चाहिए. मंदिर के आस पास किसी को छूने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. अगर आप अपने घर जा रहे है तो न ही वहां के प्रसाद और न ही वहां का कोई भी खाने वाला सामान अपने साथ लाना वर्जित है.

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