Locust Terror: इन आसान तरीकों से भी हो सकता है टिड्डी नियंत्रण, पुराने लेकिन कामगर
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Locust Terror: इन आसान तरीकों से भी हो सकता है टिड्डी नियंत्रण, पुराने लेकिन कामगर
टिड्डियों (Locust) के अटैक से जूझ रहे राजस्थान में टिड्डी चेतावनी संगठन और कृषि विभाग दिन-रात मेहनत कर उन्हें मारने में जुटे हैं. अब तक करीब 67 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में टिड्डी नियंत्रण का दावा भी किया जा रहा है

टिड्डियों (Locust) के अटैक से जूझ रहे राजस्थान में टिड्डी चेतावनी संगठन और कृषि विभाग दिन-रात मेहनत कर उन्हें मारने में जुटे हैं. अब तक करीब 67 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में टिड्डी नियंत्रण का दावा भी किया जा रहा है

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जयपुर.  टिड्डियों (Locust) के अटैक से जूझ रहे राजस्थान में टिड्डी चेतावनी संगठन और कृषि विभाग दिन-रात मेहनत कर उन्हें मारने में जुटे हैं. अब तक करीब 67 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में टिड्डी नियंत्रण का दावा भी किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों (Experts) का कहना है कि कीटनाशकों के छिड़काव से भी महज 40 प्रतिशत तक ही टिड्डियों का खात्मा किया जा सकता है. टिड्डी नियंत्रण के लिए पारंपरिक तरीका भी बेहद कारगर है.

टिड्डियां पेड़ों पर एक के ऊपर एक बैठती हैं
ऑल इंडिया नेटवर्क प्रोजेक्ट के नेशनल कॉर्डिनेटर और कीट विज्ञानी डॉ. अर्जुन सिंह बालोदा के मुताबिक टिड्डियां पेड़ों पर एक के ऊपर एक बैठती हैं. इसके साथ ही वो अपने पंख भी फैला लेती हैं. ऐसे में ज्यादातर टिड्डियां कीटनाशकों के सीधे संपर्क में नहीं आ पाती और जिंदा रहकर दूसरे स्थान पर उड़ जाती हैं. केवल करीब 40 फीसदी टिड्डियां ही कीटनाशकों के संपर्क में आकर मरती हैं. कीटनाशकों से टिड्डियों का पूरी तरह खात्मा किया जाना संभव नहीं है. टिड्डियों को खत्म करने का सबसे कारगर तरीका है कि उनके प्रजनन स्थलों पर ही जमीन की खुदाई कर अंडों को नष्ट कर दिया जाए. लेकिन इनके ब्रीडिंग सेंटर भारत मे नहीं होने से सरकार इस मामले में बेबस है.

पारंपरिक तरीके कारगर



कीट विशेषज्ञ डॉ. अर्जुन सिंह बालोदा ने कहा कि टिड्डियों को भगाने के पारंपरिक तरीके फसल को बचाने में ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं. किसानों को चाहिए कि वो अपनी फसल पर टिड्डियो को बैठने नहीं दें और उन्हें थाली आदि बजाकर उड़ाते रहें. ऐसा करके वो अपनी फसल को उजड़ने से बचा सकते हैं. टिड्डियों को अपनी उड़ान भरने के लिए एनर्जी की जरूरत होती है जो उन्हें फसल खाने से मिलती है. किसान अगर टिड्डियों को बैठने ही नहीं देंगे तो उन्हें खुराक नहीं मिल पाएंगी और वो आगे भी ज्यादा उड़ान नहीं भर पाएंगी. उन्होंने कहा कि करीब 26 साल बाद टिड्डियों का प्रकोप हुआ है. ऐसे में नए मॉलिक्यूल से टिड्डियां मारने की रिकमेंडेशन नहीं है. केवल एक कीटनाशक मेलाथियान से ही टिड्डियां मारी जाती रही हैं लेकिन अब 10 नए कीटनाशक उपयोग में लेने की स्वीकृति भारत सरकार द्वारा दी जा चुकी है.



क्लाइमेट चेंज का है असर
डॉ. बालोदा के मुताबिक इस बार टिड्डियों का ज्यादा प्रकोप क्लाइमेट चेंज की वजह से है. साल 2019 में रेगिस्तानी इलाकों में ज्यादा बारिश हुई और बड़े तूफान भी आए. इनकी वजह से रेगिस्तान में बड़े गड्ढे होकर तालाब जैसे स्ट्रक्चर बन गए जिससे टिड्डियों को प्रजनन के लिए अनुकूल माहौल मिला. अफ्रीकन देशों के साथ ही सऊदी अरब, ईरान और पाकिस्तान आदि देशों में भी यही स्थिति है. पिछले साल दिसम्बर-जनवरी तक टिड्डियों का प्रकोप बने रहने के पीछे भी यही वजह रही. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि अफ्रीकन देशों में अशांति की वजह से टिड्डियों के ब्रीडिंग सेंटर अफ्रीकन देशों से पाकिस्तान आदि देशों में शिफ्ट हुए हैं.

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