कल से सड़कों पर गुर्जर, पढ़ें- क्या है गुर्जर आरक्षण आंदोलन की इतिहास?

आरक्षण के लिए गुर्जर आंदोलन का अपना इतिहास रहा है. आरक्षण की पहली मांग 2006 में उठी थी. हालांकि गुर्जर आंदोलन देशभर में सुर्खियों में 2007 में आया.

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Updated: February 7, 2019, 10:02 PM IST
कल से सड़कों पर गुर्जर, पढ़ें- क्या है गुर्जर आरक्षण आंदोलन की इतिहास?
गुर्जर आंदोलन. (photo-getty images)
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Updated: February 7, 2019, 10:02 PM IST
राजस्थान पिछले एक दशक से अधिक समय से गुर्जर आरक्षण आंदोलन की आग में झुलसता रहा है और 8 फरवरी से एक बार फिर गुर्जर सड़कों पर उतर रहे हैं. 5 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला ने कहा है कि 8 फरवरी को सरकार को दिया गया बीस दिन का समय पूरा हो रहा है. उन्होंने कहा कि अब हमें आंदोलन करने को मजबूर किया जा रहा है. शुक्रवार को सवाई माधोपुर के मलारना डूंगर में गुर्जर महापंचायत होगी और वहीं से आंदोलन शुरू करने की घोषणा हो सकती है.

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कर्नल बैंसला के अनुसार गुर्जर समाज पिछले 14 सालों से आरक्षण की मांग कर रहा है. बता दें कि आरक्षण के लिए गुर्जर आंदोलन का अपना इतिहास रहा है. आरक्षण की पहली मांग 2006 में उठी थी. हालांकि गुर्जर आंदोलन देशभर में सुर्खियों में 2007 में आया. तब आरक्षण आंदोलन उग्र हो गया था और पुलिस कार्रवाई में 23 मार्च को 26 लोग मारे गए थे.

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गुर्जर आरक्षण आंदोलन का यह सिलसिला वहीं नहीं थमा, अगले ही साल 2008 में भी गुर्जर सड़कों पर उतरे और आंदोलन फिर से शुरू हो गया. राजस्थान के भरतपुर और दौसा जिलों में जमकर उपद्रव हुए. आंदोलनकारी ने दौसा से भरतपुर और अलवर तक पटरियों और सड़कों पर बैठ गए. कई जगह पटरियां उखाड़ फेंक दी गई. यह आंदोलन इतना बढ़ा गया कि कई दिनों तक रेल मार्ग बाधित रहा और देश के अन्य हिस्सों से पूरा इलाका कट गया.

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आंदोलन के दौरान गुर्जरों और पुलिस के बीच कई बार झड़पें हुईं. फिर एक बार पुलिस से झड़प में 38 लोग मारे गए. पिछले एक दशक में आरक्षण आंदोलन का यह दौर चलता रहा. कई बार आंदोलन उग्र हुआ तो कई बार पुलिस के साथ गुर्जर आंदोलनकारियों के बीच छिट-पुट झड़पें भी हुईं.
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कर्नल बैंसला की अगुवाई में चलने वाला आरक्षण आंदोलन जारी रहा. बैंसला की 5 प्रतिशत आरक्षण की मांग पार 2015 में फिर से आंदोलन शुरू हुआ. इस बार फिर करो या मरो की ठान कर गुर्जर समुदाय सड़कों पर उतर आया. प्रदर्शनकारियों ने जमकर उत्पात मचाया, गाड़ियों में आग लगा दी गई और रास्ते जाम कर दिए गए. फिर से रेल की पटरियां उखाड़ दी गईं और रेलवे ट्रैक पर कब्जा कर आंदोलनकारी वहीं बैठ गए. करीब सप्ताह पर चले आंदोलन के दौरान जमकर तांडव हुआ. 2015 में हुए इस आंदोलन में अकेले रेलवे को करीब 200 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा.
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