#Human Story: मैं पढ़ना चाहती हूं लेकिन बेबस हूं... मां के पास जहर के लिए भी पैसे नहीं हैं

मेरे जीवन का गलियारा बहुत तंग है. अंधेरे के आगोश में हूं मैं. और अंधेरा है कि खत्म ही नहीं होता. जिंदगी घिसट-घिसट कर चल रही है. अपनी ही परछाई को पकड़ने की कोशिश करती हूं लेकिन हाथ नहीं आती. दरअसल मैं दिव्यांग हूं. उस मां की बेटी, जिसके चारों बच्चें दिव्यांग हैं.

Bhanwar Pushpendra | News18 Rajasthan
Updated: February 22, 2019, 7:03 PM IST
#Human Story: मैं पढ़ना चाहती हूं लेकिन बेबस हूं... मां के पास जहर के लिए भी पैसे नहीं हैं
प्रतिकात्मक तस्वीर.
Bhanwar Pushpendra
Bhanwar Pushpendra | News18 Rajasthan
Updated: February 22, 2019, 7:03 PM IST
मैं अपना नाम बताऊं उससे पहले आप मेरे ज़िन्दगी से वाकिफ हो जाइए, मेरे जीवन का गलियारा बहुत तंग है. अंधेरे के आगोश में हूं मैं. और अंधेरा है कि खत्म ही नहीं होता. घिसट-घिसट कर चल रही है ज़िन्दगी. अपनी ही परछाई को पकड़ने की कोशिश करती हूं लेकिन हाथ नहीं आती. दरअसल मैं दिव्यांग हूं. उस मां की बेटी, जिसके चारों बच्चें दिव्यांग हैं. जी हां, हम चार भाई-बहिन हैं, जो घर का दरवाजा अपनी मर्जी से नहीं देख सकते क्योंकि अपने ही पैरों पर खड़े होना हमारे लिए सपने जैसा है. हम चारों के पास सिर्फ़ दीवारों की के बीच की घुटन है. ज़िल्लत और सरकारी नाकामियों की चिरपरिचित टीस भी. ये मेरी और मेरे परिवार की कहानी है. कहानी ही क्यूं ये हकीक़त है. जिसे जी रहा है मेरा पूरा परिवार, एक साथ. और सरकारी योजनाएं, क़ागजों में कैद बगले झांक रही हैं. मैं राजधानी जयपुर के जवाहर नहर इलाके में रहती हूं. पिता कमाने निकल जाते हैं. अपने आंचल में ममत्व को सिमेटे मेरी मां, जिम्मेदारियों की बैशाखी उठाए, जुट जाती है सुबह से हम चारों बच्चों की देख रेख में. मेरी मां की सुबह भी यही हैं और दोपहर और शाम भी यही.

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अपने ही घर में लाचार.


रात चिन्ताओं का पिटारा बनी है. हर दिन, जख़्मों को कुरेदता है. और उम्मीदें मरहम लगाती रहती हैं. दरसल मैं आपको बता दूं कि हम चारों बच्चें दिव्यांग हैं. छोटा सा घर जिसमें एक कमरा है जहां हम ज़िन्दगी गुजारते हैं. सरकारी योजनाओं की एक लम्बी फेहरिश्त है. जिन्हें लेने के लिए पूरा परिवार दर दर चक्कर काट चुका है, लेकिन योजनाएं हैं कि हमारे दरवाजे तक पहुंच ही नहीं पाती. सरकार के हर महकमें का दरवाजा खटखटा चुका मेरा परिवार अब थक रहा है. और वक्त राजी ही नहीं हमारी पुकार सुनने को. जिम्मेदारों को क्या ख़बर, बस सरकारी आंकड़े फाइलों में कैद हैं. और हम दिव्यांगों की ज़िन्दगियां अंधेरो में. कोई एक कारण नहीं है बल्कि कई कारण हैं जो जिम्मेदार हैं इस हकीकत के. मेरा एक भाई तो अपने हाथों से खाना तक नहीं खा सकता. बीमारियों में इलाज के सरकारी दावें खुद बीमार हैं. योजनाओं ने बैशाखी थामी हैं और चिन्ताएं घर के आगन में हमारे साथ साथ पल रही हैं. खाने का बमुश्किल इन्तजाम है. न विकलांग पेंशन योजना का लाभ है, न स्कूटी मिली.
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चारों भाई-बहन दिव्यांग हैं.

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मैं इस राजधानी की बेटी, पढ़ना चाहती हूं लेकिन घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं है. आस्था योजना भी इस घर में कोई आस्था नहीं रखती. पालनहार योजना नियमों का पालन करन से कतरा रही है. और मां का दर्द इतना कि अब तो मां के साथ हम भी अल्लाह से मौत की दुआ मांगते हैं. मेरे एक भाई की हालत तो ये है कि मां को ही उसे कंधे पर बिठाकर ले जाना पड़ता है. हम जन्मजात ऐसे नहीं थे बल्कि 10 से 12 साल के होने के बाद सबके हालात दिनों दिन बद से बदतर होते चले जाते हैं. अभी तो मां है जो हमें सम्भाल लेती है. लेकिन कल को जब मां सपुर्दे खाक हो जाएगी. उसके बाद हमारा क्या होगा? और हां मैं आपको अपना नाम बताऊंगी, बशर्ते कोई आकर मेरी सुध तो ले और सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि हम दो बहिनों और दो भाइयों के साथ हालातों से जूझती मेरी मां की भी.
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पिता अकेले कमाने वाले और हम चार दिव्यांग, पूरा परिवारा मुफलिसी में गुजर बसर कर रहा है.
मैं खेलना चाहती हूं लेकिन मेरे हाथ-पांव काम नहीं करते. मैं पढ़ना चाहती हूं लेकिन मेरी मां के पास जहर खरीदने के तक के लिए पैसे नहीं हैं. मैं जिंदगी से इतनी भी हताश नहीं हूं कि जहर खाने की बात करूं लेकिन कभी कभी मेरी मां अपना दर्द छिपा नहीं पाती. वो कह देती है, तंग आ गई हूं बच्चों की इस लाचारी से, इस गरीबी से, अब ये सरकार जहर के पैसे भी दे दे तो खुद भी खा लूं और इन औलादों को भी खिला दूं. मेरी मां से हम भाई-बहनों की ये हालत अब देखी नहीं जाती लेकिन मुझे अब भी ईश्वर से उम्मीद है, एक न एक दिन  मेरे पढ़ने-लिखने की आरजू पूरी होगी. मेरे भाई-बहनों की दवा और दो वक्त के खाने की आज जैसी तंग हालत भी हमेशा नहीं रहेगी. (ये कहानी जयपुर के जवाहर नगर इलाके में रहने वाले दिव्यांग बच्ची की है. बेहद तंग और मुफलिसी में गुजर बसर करने वाले परिवार में इस जैसी चार संतान हैं. दो लड़की और दो लड़के, चारों ही दिव्यांग हैं. यानी चलने-फिरने, उठने-बैठने और खाने-पीने को भी पूरी तरह से दूसरे पर निर्भर हैं.इसके पिता मेहनत मजदूरी करके जैसे-तैसे गुजार कर रहे हैं और मां चारों भाई-बहनों की घर पर देखभाल करती हैं. बच्चों की दयनीय हालत से परेशान मां रजिया तो यहां तक कह देती हैं कि कहीं से जगह मिल जाए तो इनको भी दे दूं और मैं भी ले लूं. इस दर्दभरी जिंदगी से से मर जाना ही बेहतर होगा. दरअसल, तंगहाल परिवार अक्सर इन चार दिव्यांग बच्चों के खाने-पीने के अलावा उनकी दवाओं के लिए भी पैसों का मोहताज रहता है, लेकिन न सरकारी योजनाएं काम आती है न काई अन्य मददगार.)   (इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.) एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स 
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