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गहलोत कैबिनेट का अहम फैसला: एम-सेण्ड इकाई को मिलेगा उद्योग का दर्जा, कई रियायतें दी जायेंगी

पहले से लगी एम-सेण्ड यूनिट्स और क्रेशर यूनिट्स भी एम-सेण्ड उत्पादन के लिए परमिट या खनन पट्टा लेने की पात्र होंगी.
पहले से लगी एम-सेण्ड यूनिट्स और क्रेशर यूनिट्स भी एम-सेण्ड उत्पादन के लिए परमिट या खनन पट्टा लेने की पात्र होंगी.

अशोक गहलोत सरकार ने एम सेण्ड नीति (M Sands Policy) को मंजूरी दे दी है. इससे अब सरकारी निर्माण कार्यों में प्रयुक्त की जानी वाली खनिज बजरी (Mineral gravel) की मात्रा का न्यूनतम 25 प्रतिशत एम-सेण्ड का उपयोग अनिवार्य होगा.

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जयपुर. प्रदेश में सरकार ने अब बजरी के विकल्प (Gravel Options) के तौर पर मैन्यूफेक्चर्ड सेण्ड को बढ़ावा देने का फैसला किया है. गहलोत कैबिनेट ने सोमवार शाम को हुई बैठक में एम सेण्ड नीति (M Sands Policy) को मंजूरी दे दी है. एम सेण्ड नीति के तहत अब एम-सेण्ड यूनिट को उद्योग का दर्जा (Industry status) दिया जाएगा. एम सेण्ड बनाने वाली यूनिट्स को राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना रिप्स-2019 के तहत सभी लाभ और रियायतें दी जाएंअश्ग.

नीति के तहत तहत खनन क्षेत्रों में उपलब्ध ओवरबर्डन डम्प्स को एम-सेण्ड के उत्पादन के लिए केप्टिव प्रयोजनार्थ 10 साल की अवधि के लिए नीलामी के परमिट जारी किए जाएंगे. खनिज मेसेनरी स्टोन के खनन पट्टा आवंटन में एम-सेण्ड यूनिट के लिए अलग से प्लॉट आरक्षित किए जाकर केप्टिव प्रयोजनार्थ नीलाम किए जाएंगे. एम-सेण्ड के निर्माण में उपयोग किए जाने वाले ओवरबर्डन पर देय डीएमएफटी की राशि में शत-प्रतिशत की छूट प्रदान की जाएगी. पहले से लगी एम-सेण्ड यूनिट्स और क्रेशर यूनिट्स भी एम-सेण्ड उत्पादन के लिए परमिट या खनन पट्टा लेने की पात्र होंगी.

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खनिज बजरी की मात्रा का न्यूनतम 25 प्रतिशत एम-सेण्ड का उपयोग अनिवार्य होगा


इस नीति के तहत राज्य के सरकारी, अर्द्ध सरकारी, स्थानीय निकाय, पंचायती राज संस्थाएं और राज्य सरकार से वित्त पोषित अन्य संगठनों द्वारा करवाए जाने वाले विभिन्न निर्माण कार्यों में प्रयुक्त की जानी वाली खनिज बजरी की मात्रा का न्यूनतम 25 प्रतिशत एम-सेण्ड का उपयोग अनिवार्य होगा. बाद में इसे उपलब्धता के आधार पर 50 प्रतिशत बढ़ाया जा सकेगा. एम सेण्ड नीति के तहत प्रदेश के खनन क्षेत्रों में उपलब्ध ओवरबर्डन डम्प्स की प्रचुर मात्रा का दक्षतापूर्वक उपयोग करते हुए खनन क्षेत्रों में पर्यावरण को संरक्षित करना, नदियों से बजरी की आपूर्ति में कमी और पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के साथ ही स्थानीय स्तर पर खनिज आधारित उद्योगों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है.
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