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Inside Story: गहलोत और सचिन पायलट के चुनाव लड़ने के पीछे की ये है कहानी

सचिन पायलट और अशोक गहलोत (फाइल फोटो)
सचिन पायलट और अशोक गहलोत (फाइल फोटो)

सचिन पायलट के इस ऐलान की सबसे ज्यादा खुशी मानो उनके बगल में बैठे अशोक गहलोत को ही है. गहलोत शायद लंबे समय से इस फैसले का इंतजार कर रहे थे.

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राजस्थान में एमपी फॉर्मूला लागू करने की कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश कामयाब नहीं हो पाई. आखिरकार सोनिया गांधी के दखल के बाद अब अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. इस ऐलान के साथ ही कांग्रेस में प्रत्याशियों की पांच दिन से अटकी सूची जारी करने का रास्ता साफ हो गया. लेकिन इस फैसले से राजस्थान में मुख्यमंत्री की कुर्सी की जंग और तेज हो सकती है.

राजस्थान में कांग्रेस दावेदारों की पांच दिन से सांसे थमी थी. नामांकन की प्रकिया शुरू हो चुकी है. लेकिन कांग्रेस प्रत्याशियों की पहली सूची ही जारी नहीं कर सकी. इस सूची में पेच फंसा था कि मुख्यमंत्री की रेस के दो दावेदार अशोक गहलोत और सचिन पायलट के चुनाव लड़ने या न लड़ने का. दिल्ली में जैसे ही सचिन पायलट ने कहा कि वे अशोक गहलोत के निवेदन पर चुनाव लड़ेंगे, तय हो गया कि अब सूची जारी होने में चंद घंटे शेष है. लेकिन सचिन पायलट का चेहरा काफी कुछ कह रहा था. वो चुनाव लड़ नहीं रहे हैं. लड़वाया जा रहा है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने दिल्ली में कहा कि मैं पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के आदेश और अशोक गहलोत जी के निवेदन को स्वीकार कर चुनाव लड़ रहा हूं.




सचिन पायलट के इस ऐलान की सबसे ज्यादा खुशी मानो उनके बगल में बैठे अशोक गहलोत को ही है. गहलोत शाय़द लंबे समय से इस फैसले का इंतजार कर रहे थे. करीब दस दिन से अशोक गहलोत इस जिद पर अड़े थे कि वे जोधपुर की सरदारपुरा सीट से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. वहीं सचिन सचिन पायलट न खुद चुनाव लड़ना चाहते थे न ये चाहते थे कि अशोक गहलोत चुनाव लड़ें. पायलट की मंशा थी कि वे और गहलोत दोनों चुनाव प्रचार करें. चुनाव नहीं लड़ें. नतीजों के बाद जिसे सीएम बनाने का फैसला किया जाए, उसके लिए किसी विधायक की सीट खाली करवा कर चुनाव लड़ाया जाए. लेकिन गहलोत इस फॉर्मूले के लिए तैयार नहीं थे. आखिरकार कांग्रेस नेतृत्व को गहलोत की मांग माननी पड़ी.
अशोक गहलोत जोधपुर की सरदारपुरा विधानसभा सीट से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं. मौजूदा विधायक भी है. सियासी समीकरण ऐसे हैं कि गहलोत अपनी सीट पर बिना समय दिए भी आराम से चुनाव प्रचार कर सकते हैं. लेकिन सचिन पायलट की मुश्किल यह है कि उनके पास कोई तय विधानसभा की सीट नहीं, न पहले विधानसभा चुनाव लड़ा. अजमेर से 2014 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद सचिन पायलट का फोकस कांग्रेस के संगठन पर था. 2008 में सीपी जोशी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर रहते हुए एक वोट से हार के चलते पायलट खुद चुनाव लड़ने और कैंपेन करने, दोनों एक साथ रिस्क लेने के मूड में नहीं थे. वे एमपी फॉर्मूला लागू करवाने की जिद पर अड़े थे. लेकिन दोनों की जिद के चलते पहली सूची जारी नहीं हो पा रही थी. गहलोत पहली सूची में सरदारपुरा से अपना नाम चाहते थे औऱ पायलट इसके लिए तैयार नहीं थे. बीजेपी ने भी निशाना साधा कि ये दोनों की दावेदारी का ऐलान है.

बीजेपी प्रवक्ता सुंधाशु त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी में टिकटों का वितरण नहीं हो पाया है. वन स्टेप फॉर फॉरवर्ड, वन स्टेप बैकवर्ड... सिच्वेशन ऑकवर्ड. दोनों ने पहले टिकट वितरण की घोषणा कर संयुक्त दावेदारी की. सचिन पायलट ने कहा कि मैं राहुल गांधी के आदेश और अशोक गहलोत के निवेदन पर चुनाव लड़ने जा रहा हूं. यानी अशोक गहलोत आवेदनकर्ता. टिकटों का मामला दावेदारी में उलझा है या दावेदारी की हिस्सेदारी में उलझा है.


सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच चुनाव लड़ने या न लड़ने का विवाद इतना बढ़ गया कि सोनिया गांधी को दखल देना पड़ा. सोनिया गांधी ने दोनों से बात की. गहलोत सोनिया गांधी को समझाने में कामयाब रहे कि एमपी फॉर्मूला राजस्थान में कारगर नहीं. ये भी कहा कि अगर सचिन पाय़लट और गहलोत दो को चुनाव लड़ने से रोका जाता है तो दोनों के बीच जंग का सीधा मैसेज जाएगा. इसके बजाय सभी दावेदार चुनाव लड़े. सीपी जोशी औऱ भंवर जितेंद्र सिंह भी. आखिरकार इसी फॉर्मूले पर सोनिया गांधी ने पायलट को भी चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया.
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