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Rajasthan: एशिया की सबसे बड़ी तोप वाले इस किले में इंदिरा गांधी ने कराई थी खजाने की खोज

जयगढ़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है. यह कछवाहा शासकों के प्रभुत्व और प्रताप का प्रतीक है. (फोटो सौजन्य- राजस्थान पर्यटन विभाग)

Heritage of Rajasthan: जयपुर 14 किमी दूर स्थित जयगढ़ रहस्य और रोमांच से भरा हुआ किला है. यहां महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा बनवाई गई एशिया की सबसे बड़ी तोप जयबाण पहियों पर रखी हुई हैं. तोप की नली से लेकर अंतिम छोर की लंबाई 31 फीट 3 इंच है. इसकी वजन 50 टन है.

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    हरीश मलिक

    जयपुर. इतिहास के कई रहस्य और प्रसंगों को खुद में समेटे शान से खड़ा है पिंकसिटी से 14 किमी दूर जयगढ़ (Jaigarh). यही वह किला है जिसमें एशिया की सबसे बड़ी तोप (Asia's largest cannon Jayabaan) है. यही वह किला है जिसमें खजाने की खोज के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने खुदाई करवाई थी. राजस्थान का यही वह दुर्ग है जिस पर ब्राह्य आक्रमण कभी नहीं हुआ. यही वह दुर्ग है जहां तोप ढालने का संयंत्र लगा हुआ है. इसी किले का उपयोग मुगलकाल में शस्त्रागार और लूटे हुए धन को छिपाने के रूप में होता था.

    राजस्थान का बहुचर्चित और रहस्यमय दुर्ग जयगढ़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है. यह कछवाहा शासकों के प्रभुत्व और प्रताप का प्रतीक है. जयगढ़ का विस्तार करीब 4 किमी की परिधि में है. इसके तीन प्रमुख प्रवेश द्वार हैं-डूंगर दरवाजा, अवनि दरवाजा और भैंरू दरवाजा. इसमें डूंगर दरवाजा नाहरगढ़ की ओर से, अवनि दरवाजा आमेर के पास फूलों की घाटी से और दुर्ग दरवाजा सागर नामक जलाशय की तरफ से किले के भीतर जाने के मार्ग हैं.

    35 किमी दूर तक मार करने वाली जयबाण तोप
    महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा बनवाई गई एशिया की सबसे बड़ी तोप जयबाण यहीं पहियों पर रखी हुई हैं. जयबाण तोप जयगढ़ किले के डूंगर दरवाजे पर रखी है. तोप की नली से लेकर अंतिम छोर की लंबाई 31 फीट 3 इंच है. इसकी वजन 50 टन है. जब तोप को पहली बार टेस्ट-फायरिंग के लिए चलाया गया था तो जयपुर से करीब 35 किमी दूर स्थित चाकसू नामक कस्बे में गोला गिरने से गढ्डा बन गया. बाद में इसमें पानी भरने से इसने तालाब का रूप ले लिया. इस तोप को एक बार फायर करने के लिए 100 किलो गन पाउडर की जरूरत होती थी. अधिक वजन के कारण इसे किले से बाहर नहीं ले जाया गया और न ही कभी युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया था. इस तोप को सिर्फ एक बार टेस्ट के लिए चलाया गया था.
    वे दस दिलचस्प फैक्ट जो आप जयगढ़ के बारे में जरूर जानना चाहेंगे
    1. बाबर किले में छिपाता था लूटा धन
    जयगढ़ का उपयोग मुगलकाल में शस्त्रागार के रूप में होता था. बाबर ने भारत के कई शहरों को लूटा. ऐसा माना जाता है कि वह लूटपाट से एकत्रित धन को इसी जयगढ़ किले में कहीं छिपाकर रखता था. मुगलों के बाद में यह किला सवाई जयसिंह के पास आ गया. उन्होंने जयपुर के विकास कार्यों के लिए भी काफी धन खर्च किया था.

    2. इंदिरा गांधी ने कराई खजाने की खोज
    इंदिरा गांधी के शासनकाल जब भारत में आपातकाल लगा हुआ था. तब उन्हें किले में करोड़ों का गुप्त खजाना होने के बारे में पता चला. केन्द्र ने सेना की मदद लेकर खजाने की खोज में कुछ महीनों तक दुर्ग में खुदाई कराई. आखिर एक दिन जयपुर-दिल्ली हाईवे को बंद कर दिया गया. तब चर्चा रही कि केन्द्र ने लोगों को धोखे में रखकर खजाना उस बंद हाईवे से ट्रक भरकर दिल्ली पहुंचाया. मगर सरकार ने स्पष्ट तौर पर मना किया कि उन्हें किले से कोई खजाना नहीं मिला हैं. तब देश-विदेश में चर्चा रहीं कि खजाना नहीं मिला तो गया कहां ? कई लोगों ने आरटीआई लगाकर सरकार से खजाने के बारे में जानना चाहा, लेकिन विभागों द्वारा इस सम्बन्ध में उनके पास कोई सूचना न होने का हवाला हर बार टरका दिया जाता रहा.

    3. विशिष्ठ राजनीतिक बंदियों के लिए अंत:दुर्ग
    जयगढ़ का उपयोग विशिष्ठ राजनीतिक बंदी को रखने के लिए भी किया जाता था. जयगढ़ के भीतर एक लघु अन्तः दुर्ग भी बना हुआ है. उसमें महाराजा सवाई जयसिंह ने अपने छोटे भाई विजयसिंह को कैद कर रखा था. विजयसिंह के नाम पर यह विजयगढ़ी कहलाया. विजयगढ़ी के प्रवेश द्वार पर लोहे का तराजू और बांट पड़े रहते थे. संभवत: इनका उपयोग बारूद तौलने में होता था.

    4. शत्रुओं की टोह के लिए दिया बुर्ज
    एक सात मंजिला प्रकाश स्तम्भ विजयगढ़ी के पार्श्व में है जो दिया बुर्ज कहलाता है. दुश्मनों की हर तरह की गतिविधियों पर नजर रखने के दृष्टि से इसका विशेष महत्व था. दिया बुर्ज से आगे तोपें रखने का दमदमा है. जयगढ़ में तोपें ढालने का विशाल कारखाना था जो राजस्थान के किसी अन्य किले में नहीं मिलता हैं. तोपें ढालने में गुप्त रूप से मुगल तकनीक अपनाई जाती थी.

    5. किले पर आक्रमण करना दुरूह
    जयगढ़ उत्कृष्ठ गिरि दुर्ग है. यह अपने अद्भुत शिल्प और स्थापत्य के कारण प्रसिद्ध है. इसका निर्माण प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र के अनुसार हुआ. इसमें सुदृढ़ और उन्नत प्राचीर, घुमावदार विशाल बुर्जें, जलापूर्ति के लिए विशाल टांके हैं. यह दुर्ग पर्वतमालाओं से इस तरह परिवेष्टित है कि शत्रु सेना के लिए इस पर आक्रमण करना बेहद दुरूह था. इस पर शत्रु ने कभी आक्रमण का दुस्साहस नहीं किया.

    6. कछवाहा राजाओं का राजकोष स्थल
    दुर्ग में जनसाधारण का प्रवेश निषिद्ध था. इसके पीछे जनश्रुति है कि यहां कछवाहा राजाओं का दफीना राजकोष रखा हुआ था. किले के मुख्य प्रवेश द्वार के दरवाजे चौबीस घंटे बंद रहते थे. इसके बाहर नंगी तलवार या भाला लिए प्रहरी दिन-रात पहरा देते थे. ऐसे में दुर्ग के अंदर क्या है और क्या चल रहा है ? इसका पता किसी को नहीं चलता था.

    7. दक्षिणवर्ती पर्वत शिखर पर बना जयगढ़
    यह भव्य और सुदृढ़ दुर्ग कब बना इस बारे में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है. कुछ इतिहासकारों का मत है कि इस रहस्यमय दुर्ग का निर्माण आमेर के राजप्रासाद के दक्षिणवर्ती पर्वत शिखर पर महाराजा मानसिंह प्रथम ने करवाया था. मगर इतिहासकार जगदीश सिंह गहलोत और डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार जयगढ़ का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था. उन्हीं के नाम पर यह किला जयगढ़ कहलाता है.

    8. हिंदू स्थापत्य कला का उत्कृष्ठ उदाहरण
    जयगढ़ के प्रमुख भवनों में जलेब चौक, सुभट निवास यानी ​दीवान-ए-आम, खिलबत निवास यानी दीवान-ए-खास, राणावतजी का चौक, लक्षमी निवास, ललित मंदिर, सूर्य मंदिर, विलास मंदिर, आराम मंदिर, राम और काल भैरव के प्राचीन मंदिर शामिल हैं जो हिन्दू स्थापत्य कला के उत्कृष्ठ उदाहरण हैं. आराम मंदिर के सामने वाला उद्यान मुगल उद्यानों की चार बाग शैली में बना है. राजाओं के मनोरंजन के लिए किले में एक कठपुतली घर भी बना हुआ है.

    9. दुर्ग में शस्त्रों का विशाल संग्रहालय
    जयगढ़ दुर्ग के भीतर मध्यकालीन शस्त्रों का विशाल संग्रहालय है. इस किले के तोप संयंत्र की ढाली हुईं तोपें, भाले, धनुष-बाण, विविध किस्म की तलवारें, ढाल, लंबी रायफलें, तमंचे, बंदूकें इत्यादि हथियार हैं. इसमें मोटे चमड़े से बने विशालकाय पात्र, कलश, जिरह बख्तर, शाही नगाड़े, मानसिंह-प्रथम द्वारा युद्धों में प्रयोग किया गया हाथी का हौदा, शीशा और बारूद पर्यटकों को जयगढ़ के वैभव की झलक दिखाती है.
    10. कैदी को दुर्ग में देते थे मृत्यु-दण्ड
    जयगढ़ के खंगारोत किलेदारों के वंशजों के पास से कुछ दुर्लभ पत्र, रियासतकाल के खास रूक्के तथा अन्य दस्तावेज​ मिले हैं जिनसे इस रहस्यमय दुर्ग से संबंधित अनेक घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है. इन दस्तावेजों में पकड़े गए कैदी को दुर्ग के भीतर मृत्यु दण्ड देने, कैदी व उसके परिवार को अलग-अलग रखने, टांकों की मरम्मत, दुर्ग के भीतर की व्यवस्था आदि की जानकारी मिलती है.