जयपुर: हादसे ने बदल दी इस युवा की दुनिया, लेकिन आज खुद 'दुनिया' बदलने में जुटा है
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जयपुर: हादसे ने बदल दी इस युवा की दुनिया, लेकिन आज खुद 'दुनिया' बदलने में जुटा है
यह कहानी है जयपुर निवासी प्रतीक खंडेलवाल की जो अपनी तरह के दिव्यांगों के लिए लड़ रहे हैं और व्यवस्थाओं से जूझ रहे हैं.

यह कहानी (Story) एक ऐसे नौजवान की है जिसकी हादसे (Accident) में एक ही दिन में दुनिया बदल गई, लेकिन अब वह 'दुनिया' को बदलना चाहता है. हौंसलों और जज्बे से लबरेज इस युवा की कहानी हताश हो चुके युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा (Big inspiration) है.

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जयपुर. यह कहानी (Story) एक ऐसे नौजवान की है जिसकी हादसे (Accident) में एक दिन में दुनिया बदल गई, लेकिन अब वह 'दुनिया' को बदलना चाहता है. 28 साल का यह नौजवान अपने सपनों (Dreams) को जीने के लिए जयपुर से बेंगलुरू (Jaipur to Bangalore) पहुंचा था. इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की और भविष्य के पंखों पर सवार हुआ. अचानक एक दिन ऐसा हादसा हुआ कि ख़्वाब ज़मीन पर आ गिरे. हालात इस तरह के हो गए कि एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई नज़र आने लगी. लेकिन इस नौजवान (Young man) ने हिम्मत नहीं हारी और दुनिया को बदलने की ठानी.

इमारत की छत गिरी और सपने चकनाचूर हुए
यह कहानी है जयपुर निवासी प्रतीक खंडेलवाल की जो अपनी तरह के दिव्यांगों के लिए लड़ रहे हैं और व्यवस्थाओं से जूझ रहे हैं. प्रतीक आजकल बेंगलुरू में रह रहे हैं. प्रतीक आम नौजवानों की तरह भविष्य के सपने बुनते हुए जयपुर से बेंगलुरू गए थे. इंजीनियरिंग की पढ़ाते करते हुए पिता के बिज़नेस में हाथ बंटाने लगे. एक दिन प्रतीक एक अंडर कंस्ट्रक्शन इमारत में गए. वहां इमारत की छत अचानक गिर पड़ी. इससे प्रतीक की कमर की हड्डी टूट गई और सिर एक तरफ से फट गया. सिर तो ठीक हो गया, लेकिन स्पाइन नर्व हमेशा के लिए क्रेश हो गई. ये वो दिन था जब प्रतीक की पूरी दुनिया बदल गई. प्रतीक व्हील चेयर पर आ गए. इससे मायूस हुए प्रतीक ने एक बार सुसाइड के बारे में भी सोचा, लेकिन बाद में उसने खुद को खुद का दोस्त बनाना बेहतर समझा. प्रतीक चाहते हैं कि पूरी दुनिया ऐसी बने कि साधारण लोगों के साथ साथ दिव्यांग भी हर कहीं आसानी से आ जा सके.

'रैंप माय सिटी' से दिखाया जज्बा
प्रतीक ने स्पाइनल कोड इंजरी से संबधित इंटरनेट पर हर मुमकिन इलाज को खोजा. विदेशी डॉक्टरों से संपर्क किया, लेकिन दुर्भाग्यवश खत्म हो चुकी नसों का इलाज कहीं नहीं मिला. लेकिन प्रतीक ने हार नहीं मानी. प्रतीक ने दिव्यांगों के लिए हर जगह रैंप बनवाने की ठानी. प्रतीक ने 'रैंप माय सिटी' नाम से कैंपेन शुरू किया, जिससे हर रोज़ सैंकड़ों लोग जुड़ते जा रहे हैं. प्रतीक के प्रयास रंग लाए. आज प्रतीक के इस कैम्पेन के कारण बेंगलुरू में 30 रेस्टोरेंट और दो स्टेडियम में रैंप बन चुके हैं. अब वे इस कार्य को जयपुर में करना चाहते हैं. एक्सीडेंट के बाद प्रतीक का लंबा इलाज आज भी चल रहा है. प्रतीक अभी फिजीयोथेरेपी के सहारा ले रहे है. उन्हें उम्मीद है कि देर से ही सही लेकिन वो एक दिन फिर अपने पैरों पर चलने में कामयाब होंगे.



किसी का सहारा ना लेना पड़े
प्रतीक जैसे हज़ारों नौजवान हैं जो इस तरह के हादसों के आगे हार चुके हैं. या तो वो किसी के मोहताज हो गए है या फिर बमुश्किल अपनी ज़िंदग़ी का ग़ुज़ारा कर रहे है. लेकिन प्रतीक देश बदलना चाहते है. प्रतीक ये नहीं चाहते कि कोई उनकी तरफ दया की नज़र से देखे, बल्कि वो जहां भी जाएं तो उन्हें किसी का सहारा ना लेना पड़े.

 

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