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Lockdown: भूख नहीं, 'स्वाभिमान' बड़ा है, सिरोही में आदिवासियों ने नकारा 'मुफ्त' का राशन, यहां पढ़ें मान-सम्मान की पूरी कहानी

Lockdown: भूख नहीं, 'स्वाभिमान' बड़ा है, सिरोही में आदिवासियों ने नकारा 'मुफ्त' का राशन, यहां पढ़ें मान-सम्मान की पूरी कहानी

ग्रामीणों के मुताबिक उन्हें दया नहीं चाहिए वे इसे 'ऋण' के तौर पर ले रहे हैं. उन्होंने संस्था से वादा किया है कि लॉकडाउन खुलने के बाद अपनी मजदूरी में से वे इस ऋण को चुकाएंगे.

ग्रामीणों के मुताबिक उन्हें दया नहीं चाहिए वे इसे 'ऋण' के तौर पर ले रहे हैं. उन्होंने संस्था से वादा किया है कि लॉकडाउन खुलने के बाद अपनी मजदूरी में से वे इस ऋण को चुकाएंगे.

सिरोही के आदिवासी अंचल (Tribal area) के लोग स्वयंसेवी संस्था की ओर से बांटा जा रहा राशन नहीं ले रहे हैं. बात यह नहीं है कि वे जरूरतमंद नहीं हैं, लेकिन वे बरसों से चली आ रही स्वाभिमान ।(Self-respect) की परंपरा को मरते दम न छोड़ने की जिद पर अड़े हैं.

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जयपुर. देश और दुनिया में लॉकडाउन (Lockdown) के चलते लोगों के सामने दो वक्त के रोटी का संकट खड़ा हो गया है. इसके मद्देनजर सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं ने जरूरतमंदों तक अनाज पहुंचाने का बीड़ा उठाया है. लेकिन सिरोही के आदिवासी अंचल (Tribal area) के लोग स्वयंसेवी संस्था की ओर से बांटा जा रहा राशन नहीं ले रहे हैं. बात यह नहीं है कि वे जरूरतमंद नहीं हैं, लेकिन वे बरसों से चली आ रही स्वाभिमान ( Self-respect) की परंपरा को मरते दम न छोड़ने की जिद पर अड़े हैं. जिद ऐसी है कि स्वयंसेवी संस्था से काम करवाने का वादा लेकर ही राशन ले रहे हैं.

दया नहीं चाहिए 'ऋण' के तौर पर ले रहे हैं
कोरोना वायरस के चलते लागू लॉकडाउन में जिले के मिंगलवा फॉल और होक्कफाली गांवों के लोग मुफ्त में राशन किट स्वीकार नहीं कर रहे हैं. ग्रामीणों के मुताबिक उन्हें दया नहीं चाहिए वे इसे 'ऋण' के तौर पर ले रहे हैं. उन्होंने संस्था से वादा किया है कि लॉकडाउन खुलने के बाद अपनी मजदूरी में से वे इस ऋण को चुकाएंगे. इसके लिए स्थानीय भाषा में ‘चोपड़ा’ कहे जाने वाले रजिस्टर में इन लोगों ने बाकायदा अपने नाम भी रिकॉर्ड के लिए लिखवाए हैं ताकि वे इस कठिन समय में लिया गया ‘ऋण’ चुका सकें.

बेसहारा जीवों के लिए बना रहे हैं रोटियां
सिरोही के वासा गांव के 27 वर्षीय किसना राम देवासी कहते हैं कि लॉकडाउन के चलते अहमदाबाद में कुक की नौकरी छूट गई. 9 लोगों के परिवार के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया. संस्था ने मदद की, लेकिन दान में कुछ भी स्वीकार करना हमारे पुरखों की सीख के खिलाफ है. लेकिन बेसहारा जानवरों के लिए रोटियां बनाकर बदले में राशन पाकर मेरा परिवार खुश है. जबकि गांव की दिहाड़ी मजदूर वरजू देवी भी हर दूसरे दिन तकरीबन 100 रोटियां बेसहारा जीवों के लिए बना रही हैं ताकि पेट भी भरे और स्वाभिमान भी न मरे.

‘मैं भारत’ संस्था उपलब्ध करवा रही है सामग्री
इन लोगों को स्वयंसेवी संस्था ‘मैं भारत’ के पदाधिकारियों ने आवारा और इस वक्त लगभग बेसहारा हो चुके गायों और कुत्तों के लिए रोटियां बनाने का काम सौंपा है. इस काम को आदिवासियों ने हाथों-हाथ लिया और ऐसा करके उन्होंने खुद के राशन का प्रबंध तो किया ही इलाके के आवारा जीवों की जिंदगी बचाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. आदिवासियों का हर घर यूं लगता है जैसे कोरोना को हराने की जिद पर अड़ा है. फिलहाल हर घर से रोजाना तकरीबन सौ रोटियां बेसहारा जानवरों के लिए बनाई जा रही हैं. संस्था इन्हें इसके लिए गेहूं, बाजरा, मक्के का आटा और गुड़ उपलब्ध करवा रही है.

‘करो ना काम, कोरोना नाकाम’
ग्रामीण इलाकों में वर्षों से काम कर रही 'मैं भारत' संस्था ने ग्रामीणों की इस जिद और उनकी सकारात्मक सोच को आगे लाने के लिए इसे एक मुहिम में तब्दील कर दिया. इस मुहिम का ध्येय वाक्य है ‘करो ना काम, कोरोना नाकाम’. संस्था के अध्यक्ष रितेश शर्मा बताते हैं कि जब आदिवासियों ने काम के बिना राशन न लेने की बात की तो संस्था ने इन गांवों में राहत के लिए एक आर्थिक मॉडल तैयार किया. हम अनाज भी गांवों से ही खरीद रहे हैं. उसे हाथ चक्की व बिजली की छोटी चक्कियों से पिसवा रहे हैं. इससे सूखा राशन शहरों से नहीं लाना पड़ रहा. पिसा हुआ आटा व अन्य सामग्री काम करने के इच्छुक परिवारों को दी जा रही है ताकि वे जानवरों के लिए रोटियां बना सकें. इन रोटियों को सिरोही व आबू के शहरी इलाकों में जानवरों के लिए भिजवाया जा रहा है. हमारा ये मॉडल सफल रहा है. हम अन्य गांवों में भी ये शुरू करेंगे

मास्क भी बना रहीं आदिवासी महिलाएं
संस्था की खुशबू शर्मा के मुताबिक सिलाई का काम जानने वाली ग्रामीण महिलाओं ने मास्क बनाना सीखा है. हम उन्हें कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं. ये मास्क जरूरतमंदों और प्रशासन को मुफ्त मुहैया करवाए जाएंगे.

इस दौर में भी लोगों के स्वाभिमान को उजागर किया है
सिरोही जिला कलक्टर भागवत प्रसाद के कहते हैं कि संस्था की ‘करो ना काम, कोरोना नाकाम’ वाकई एक अनूठी पहल है. इसने इस दौर में भी लोगों के स्वाभिमान को उजागर किया है. मैंने ग्रामीण आजीविका मिशन को भी सभी आवश्यक जानकारी संस्था को मुहैया कराने का निर्देश दिया है.

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Tags: Corona epidemic, Lockdown, Rajasthan news, Sirohi news

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