Locust Terror: कीटनाशकों के छिड़काव से जहरीली हो रही जमीन, पशु-पक्षियों के साथ मानव स्वास्थ्य को बड़ा खतरा
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Locust Terror: कीटनाशकों के छिड़काव से जहरीली हो रही जमीन, पशु-पक्षियों के साथ मानव स्वास्थ्य को बड़ा खतरा
भारत में इस बार टिड्डडी दल का सबसे बड़ा हमला

टिड्डी टेरर (Locust Terror) ने प्रदेश में कई तरह के खतरे खड़े कर रहा है. जिन्दा टिड्डियां तो फसल के लिए खतरनाक (Dangerous) साबित हो ही रही हैं टिड्डियों को मारना भी बड़े खतरे को न्यौता दे रहा है.

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जयपुर. टिड्डी टेरर (Locust Terror) ने प्रदेश में कई तरह के खतरे खड़े कर रहा है. जिन्दा टिड्डियां तो फसल के लिए खतरनाक (Dangerous) साबित हो ही रही हैं टिड्डियों को मारना भी बड़े खतरे को न्यौता दे रहा है. टिड्डियों को मारने में कई तरह के खतरनाक कीटनाशकों (Pesticides) का इस्तेमाल किया जा रहा है जो जमीन को जहरीला बना रहे हैं. ये कीटनाशक पशु-पक्षियों के लिए तो खतरा बन ही रहे हैं इंसानों की सेहत के लिए भी बड़ा संकट खड़ा कर रहे हैं.

कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल
टिड्डियों पर नियंत्रण के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बेतहाशा किया जा रहा है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक कीटनाशकों से टिड्डियां तो पूरी तरह नहीं मर पा रही हैं लेकिन वातावरण में घुल रहे ये कीटनाशक आने वाले समय में पशु-पक्षियों और इंसानों के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. स्नातकोत्तर पशु चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान की डीन डॉ. संजीता शर्मा का कहना है कि ये कीटनाशक अपघटित नहीं होते और सालों तक जमीन के अंदर मौजूद रहते हैं. वातावरण में घुल चुके ये रसायन श्वांस के जरिए पशु-पक्षियों और मानव शरीर में जाकर नुकसान पहुंचाते हैं.

दूध-अन्न के जरिए आते हैं मानव शरीर में



भारत सरकार द्वारा टिड्डी नियंत्रण के लिए 13 प्रकार के कीटनाशकों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई है. इनमें से कुछ बहुत ही घातक प्रकृति के हैं. हालांकि इन ज्यादा घातक रसायनों का इस्तेमाल अकृषि क्षेत्र में ही किया जा रहा है. लेकिन फिर भी ये स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. डॉ. संजीता शर्मा के मुताबिक कीटनाशक प्रभावित वनस्पति को यदि पशु खा लेते हैं तो उनके तत्व दूध के जरिए मानव शरीर में जाते हैं. एक बार पशुओं के शरीर में जाने के बाद ये कीटनाशक वसा के साथ उनके शरीर में लम्बे समय तक रहते हैं. कीटनाशकों के तत्व जमीन के जरिए भी हमारे खाने में आते हैं और नुकसान पहुंचाते हैं. इतना ही नहीं जमीन से रिस कर ये पानी मे चले जाते हैं और पानी के जरिए भी शरीर में आते हैं. खतरा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डीडीटी और एचसीएच जैसे कीटनाशक कई बरसों पहले बैन हो चुके हैं लेकिन इनके तत्व आज भी कई बार दूध आदि में मिल जाते हैं.



गंभीर बीमारियों का खतरा
टिड्डियां मारने के लिए किसानों को मुफ्त में कीटनाशक उपलब्ध करवाए जा रहे हैं. किसान ज्यादा प्रभावी नियंत्रण के लिए बिना सोचे-समझे कीटनाशकों की रिकमंडेशन से ज्यादा मात्रा भी उपयोग कर रहे हैं. ये कीटनाशक पेट से जुड़ी गंभीर समस्याओं के साथ ही कैंसर जैसी घातक बीमारियों की वजह भी बन सकते हैं.

अब तक इतना हो चुका इस्तेमाल
राजस्थान में करीब 1.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र टिड्डी प्रभावित है. अब तक 87 हजार 723 हेक्टेयर क्षेत्र में कीटनाशकों से टिड्डी नियंत्रण किया गया है. टिड्डी चेतावनी संगठन द्वारा 47 हजार 948 हेक्टेयर में कीटनाशकों का छिड़काव किया गया है. 47 हजार 21 लीटर मैलाथियान 96 प्रतिशत यूएलवी का इस्तेमाल किया गया है. मेलाथियान बेहद घातक प्रकृति का कीटनाशक है. कृषि विभाग द्वारा 38 हजार 775 हेक्टेयर में टिड्डी नियंत्रण किया गया है. 13 हजार 880 लीटर पौध संरक्षण रसायन का इस्तेमाल किया जा चुका है.

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