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Rajasthan: लव जिहाद और दल-बदल कानून पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने साझा की ये बड़ी बातें

बिरला ने कहा कि यदि कोई राज्य विधि और कानून के विरुद्ध बिल बनाता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार न्यायालय को है.
बिरला ने कहा कि यदि कोई राज्य विधि और कानून के विरुद्ध बिल बनाता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार न्यायालय को है.

गुजरात में आयोजित पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में भाग लेकर लौटे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) जयपुर में दल बदल कानून और लव जिहाद (Defection law and Love Jihad) को लेकर कई बड़ी बातें मीडिया से साझा की है.

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जयपुर. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) ने सदन में बिना बहस के बिल पास होने पर कहा है कि यह चिंता का विषय है. चाहे विधानसभा हो या संसद (Assembly or Parliament) दोनों में आदर्श जनप्रतिनिधि संवाद होना चाहिए. तर्क वितर्क और विवाद होना चाहिए. लेकिन इसमें व्यवधान (Interruption) का कोई स्थान नहीं है. बिरला ने कहा कि वे कोशिश कर रहे हैं कि सभी विधानमंडल अपने नियम प्रक्रिया को बनाएं ताकि सभी सदन के अंदर कम से कम व्यवधान हो. जनप्रतिनिधि आदर्श मूल्यों को अपनाते हुए सदन में चर्चा करें. बिरला ने कहा कि इस मामले ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष की अध्यक्षता में कमेटी बनी है, उसकी रिपोर्ट आएगी तो उस पर साझा कार्यक्रम बनाएंगे.

गुजरात में आयोजित पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में भाग लेकर लौटे बिरला ने शुक्रवार को जयपुर में मीडिया से बातचीत करते कहा कि दल-बदल कानून के तहत पीठासीन अधिकारियों के पास असीमित अधिकार हैं. हम किस तरीके से हमारे अधिकारों को सीमित करते हुए निर्बाध और निष्पक्ष रूप से अपनी भूमिका निभा सके इस पर भी सम्मेलन में चर्चा हुई है. राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी है. जोशी ने कई विधान मंडलों के पीठासीन अधिकारियों से चर्चा की है. उसकी रिपोर्ट आएगी उसके बाद कानून में आवश्यक परिवर्तन की जरूरत होगी तो वह करेंगे.

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सुप्रीम कोर्ट से समीक्षा करवाने का अधिकार है


लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने लव जिहाद से जुड़े सवाल पर कहा कि राज्य सरकार कानून बना सकती है. यह उसका अधिकार है. हमारे यहां पर केंद्र की सूची होती है जिसमें केंद्र कानून बनाता है. राज्य की जो सूची होती है उसमें राज्य कानून बनाता है. वहीं राज्य और केंद्र दोनों की एक संयुक्त सूची होती है. उसमें दोनों कानून बना सकते हैं. राज्य अपने विभिन्न विशेषज्ञों से राय लेकर यह कर सकते हैं. बिरला ने कहा कि यदि कोई राज्य विधि और कानून के विरुद्ध बिल बनाता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार न्यायालय को है. इसलिए कानून बनाने का अधिकार है या नहीं इसे राज्य अपने लॉ डिपार्टमेंट से सुनिश्चित करता है. उसके बाद भी किसी को कुछ लगता है तो सुप्रीम कोर्ट से उसकी समीक्षा करवाने का अधिकार है.
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