Rajasthan: विश्व का एकमात्र ऐसा शिवालय जहां शिव के अंगूठे की होती है पूजा, शिवलिंग दिन में तीन बार बदलता है रंग

जनश्रुति है कि इस मंदिर में भगवान शिव के अंगूठे के कारण ही माउंट के पहाड़ टिके हुए हैं.

जनश्रुति है कि इस मंदिर में भगवान शिव के अंगूठे के कारण ही माउंट के पहाड़ टिके हुए हैं.

Shiva Temples of Rajasthan: असीम आस्था के केन्द्र राजस्थान के कोने-कोने में कई ऐतिहासिक शिवालय हैं. महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर्व पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है. माउंट आबू में देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है.

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हरीश मलिक

जयपुर. शिव और सिद्धयोग में फाल्गुन कृष्णपक्ष त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी में महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर्व इस बार कोरोना गाइड लाइन का पालन करते हुए मनाया जा रहा है. पूरे साल में सिर्फ एक बार खुलने वाले प्रसिद्ध एकलिंगेश्वर (Ekalingeshwar) और राजराजेश्वर मंदिर (Rajarajeshwar Temple) में इस बार भोले के भक्त दर्शन नहीं कर पा रहे हैं. शिवरात्रि पर जो मंदिर खुले हैं, उनमें भी इस बार शिवलिंग पर जलाभिषेक नहीं किया जा रहा है और न ही फूल, माला, प्रसाद चढ़ाए जा रहे हैं.

इन मंदिरों के इतिहास औऔर पुराकथाओं पर नजर डालें, तो पता चलता है कि जयपुर की बसावट से पहले तत्कालीन महाराजा जयसिंह ने अश्वमेघ यज्ञ कराया था. यज्ञ के बाद मोती डूंगरी पर एकलिंगेश्वर महादेव, गढ़ पर गणेशजी, गलता घाटी में सूर्य मंदिर, काले हनुमानजी के सामने वृदराजजी और आमागढ़ तथा घाट की गूणी में मां भगवती का मंदिर स्थापित किया गया. किवदंती है कि मोती डूंगरी मंदिर में महादेव के साथ परिवार की मूर्तियां स्थापित की थीं. लेकिन मूर्तियां मंदिर के बाहर पहाड़ी पर मिलीं. तबसे अकेले महादेव ही यहां विराजित हैं. एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर शाही परिवार के स्वामित्व वाला मंदिर है. पहले पूर्व महाराजा मानसिंह, राजमाता गायत्री देवी, उनक बेटे महाराज जगत सिंह और महाराज पृथ्वीराज अलग-अलग समय में मोती डूंगरी में निवास करते थे और इस मंदिर में पूजा करते थे.

राजस्थान के प्रसिद्ध शिवालयों का रोचक इतिहास
राजराजेश्वर महादेव : पूर्व महाराजा सवाई रामसिंह जी ने 18वीं शताब्दी में जयपुर में सिटी पैलेस स्थित राजराजेश्वर महादेव मंदिर बनवाया था. महाराजा सवाई रामसिंह इसी मंदिर में महादेव की पूजा करते थे. जयपुर में पतंगबाजी और पहली बार फोटोग्राफी लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. सवाई रामसिंह के बाद शाही परिवार यहां पूजा अर्चना करता रहा है. श्रद्धालुओं के लिए मंदिर साल में सिर्फ एक दिन महाशिवरात्रि को ही खुलता है. महादेव जी का शाही गहनों से श्रृंगार किया जाता है. इस साल कोविड की गाइड लाइन के चलते भोले के भक्तों को भगवान के दर्शन नहीं हो रहे हैं.

अचलेश्वर महादेव : शिव के अंगूठे पर वास

राजस्थान के कश्मीर कहे जाने वाले माउंट आबू में देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है. जनश्रुति है कि इस मंदिर में भगवान शिव के अंगूठे के कारण ही माउंट याने पहाड़ टिके हुए हैं. इसी अंगूठे के नीचे एक शिवलिंग भी है. यह शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है. यह सुबह के समय लाल, दोपहर को केसरिया और रात होते-होते श्याम रंग का हो जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार आबू पर्वत के निकट ब्रह्म खाई के तट पर वशिष्ठ मुनि रहते थे. उसकी गाय कामधेनु खाई में गिर गई थी. मुनि ने गंगा का सरस्वती गंगा का आह्वान किया. इस पर खाई पानी से जमीन की सतह तक भर गई औेर गाय गोमुख पर जमीन से बाहर आ गई. तब वशिष्ठ ने हिमालय से ब्रह्म खाई पाटने का अनुरोध किया तो उसने अपने पुत्र नंदीवर्धन को भेजा. नंदीवर्धन खाई में उतरे तो धंसते ही चले गए. केवल उनका उपरी हिस्सा ही बाहर रहा जो आज आबू पर्वत है. जब नंदी चलने की स्थिति में नहीं रहे तो महादेव ने दाहिने पैर के अंगूठे से उन्हें अचल कर दिया. यह कालांतर में अचलगढ़ बना.



एकलिंगजी : नंदी के कान में बोलने से पूरी होती है मनोकामना

उदयपुर से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित है एकलिंगजी मंदिर. यहां से 917 ईस्वी का शिलालेख मिला है. लेकिन मध्यकाल में वर्तमान एकलिंगजी का मंदिर बना और उसकी अलग ही पूजा पद्धति है. मेवाड़ी शैली में पत्थरों से निर्मित श्री एकलिंगजी मेवाड़ का सबसे विख्यात और विशाल मंदिर है. इस प्राचीन शिव मंदिर में भगवान शिव चतुर्मुखी शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं. यह चार मुख सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र के प्रतीक हैं. मंदिर के गर्भगृह का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में है और गर्भगृह के सामने पीतल धातु से बनी शिव के वाहन नन्दी की मूर्ति है. मान्यता है कि नंदी के कान में बोलने से भक्तों की मनोकामना भगवान शिव पूरी करते हैं. मंदिर परिसर में 108 देवी-देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर स्थित हैं.

मंदिर का इतिहास

मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया और एकलिंग की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी. बाद में यह मंदिर टूटा और पुन: बना था. ऐसा माना जाता है कि डूंगरपुर रियासत की ओर से वर्तमान चतुर्मुखी लिंग की स्थापना की गई थी. एकलिंग भगवान को साक्षी मानकर मेवाड़ के राणाओं ने अनेक बार ऐतिहासिक महत्व के प्रण किए थे. वर्तमान मंदिर का निर्माण महाराणा रायमल ने 15वीं शताब्दी में करवाया था. कठघरे और गर्भगृह के बीच के द्वार पर वर्तमान श्री जी मेवाड़ अरविन्द ने किवाड़ पर चांदी की परत चढ़वाई है. मुख्य मंदिर के कठघरे में आम दर्शनार्थियों का प्रवेश वर्जित हैं.

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