उसकी आंखों ने दर्द बयां किया, लेकिन उसने कभी नहीं- हां, ऐसा था मेरा अजीज दोस्त इरफान!
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उसकी आंखों ने दर्द बयां किया, लेकिन उसने कभी नहीं- हां, ऐसा था मेरा अजीज दोस्त इरफान!
इरफान खान और आईपीएस हैदर अली जैदी.

विडंबना देखो चार दिन पहले वो मां चली गई और आज उसका लाडला इरफान. मां गई तब उसे एहसास भी नहीं था, क्योंकि वो खुद पिछले छह-सात दिन से अस्पताल में था. आईसीयू में. ही वाज अनकॉन्सियस

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जयपुर. '... क्या कहूं, क्या नहीं कहूं... अभी थोड़ी देर पहले इरफान खान (Irfan Khan) के छोटे भाई इमरान का फोन आया था. रुंधे हुए गले से बोला, सबसे पहले तुम्हें ही बता रहा हूं... क्योंकि, भाई अब तुम ही इरफान की जगह हो...' वो पूरी बात कह पाता उससे पहले ही मैं अनहोनी को भांप गया था. मुझे लगा जैसे किसी ने मेरा शरीर निचोड़ लिया हो. जिस्म से जिगर निकाल लिया हो. मेरे जिगर का टुकड़ा ही तो था इरफान. हम बचपन से साथ खेले, साथ पढ़े, साथ बढ़े... लेकिन आज वो इस तरह से चला गया कि यकीन करूं भी तो कैसे?

बचपन से लेकर अब तक की हर याद जेहन में छाई चली जा रही 
पिछले छह-सात दिन से वो (इरफान खान) अस्पताल में था. आईसीयू में था. मैं कोरोना संक्रमण के इस दौर में भरतपुर में लॉकडाउन को हर सूरत में सफल बनाए रखने की कवायद में बतौर पुलिस अधीक्षक (एसपी) लगा रहता हूं और जब भी वक्त मिलता मन ही मन मेरे उस दोस्त के लिए दुआएं करता हूं. मुझे पक्का यकीन था कि खुदा उस पर पहले की तरह रहम करेगा और वो इससे निकल आयेगा. वर्ष 2018 में भी तो वो अपने जज्बे और खुदा की मेहर से उस खतरनाक बीमारी से जूझकर बाहर निकल आया था. ज्यों ही उसके हम सबसे जुदा हो जाने की खबर मिली, बचपन से लेकर अब तक की हर याद जेहन में छाई चली जा रही है.

NSD में दाखिले से बेहद खुश हुआ था इरफान
इरफान जयपुर के सुभाष चौक में रहता था और मैं खवास जी के रास्ते में. वो सेंट पॉल स्कूल में पढ़ता था और मैं सैंट जेवियर्स में. हम दोनों साथ खेलते और साथ ही स्कूल पढ़ने जाते. फिर हमने कॉलेज की पढ़ाई भी साथ-साथ की. दोनों ने राजस्थान कॉलेज में दाखिला लिया और उसके बाद यूनिवर्सिटी भी साथ ही पढ़ने चले गए. उसने उर्दू में एमए की. उस वक्त मेरे पिता डॉक्टर मोहम्मद अली जैदी उर्दू डिपार्टमेंट के 'हेड ऑफ द डिपार्टमेंट' थे. उसने उर्दू में एमए किया और मैंने इकोनॉमिक्स में. एमए के दौरान ही इरफान का झुकाव थिएटर की तरफ हो गया और उसने यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान के ड्रामेटिक्स डिपार्टमेंट में दाखिला ले लिया. एक-डेढ़ साल में उसने डिप्लोमा किया और इसी बीच दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में उसका दाखिला हो गया. इस दाखिले से वो इतना खुश था मानो सारी कायनात उसकी झोली में आ गिरी हो.



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इरफान खान के बचपन के दोस्त हैदर अली ज़ैदी के मुताबिक वो हर कैरेक्टर पर खूब रिसर्च करते थे


कभी उसके चेहरे पर शिकन देखने को नहीं मिली
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ाई के दौरान ही उसकी मुलाकात सुत्पा से हुई और बाद में दोनों ने निकाह कर लिया. वो मुंबई चला गया और थिएटर के साथ-साथ छोटे-मोटे रोल करने लगा. इरफान ने खूब स्ट्रगल किया. लेकिन कभी उसके चेहरे पर शिकन देखने को नहीं मिली. उसने कई टीवी सीरियल किये- चंद्रकांता और भारत एक खोज जैसे. वर्ष 1984 में सलाम बॉम्बे से डेब्यु किया और इसी दौरान वर्ष 2001 में उसकी एक फिल्म आई 'द वॉरियर.' आसिफ कपाड़िया की इस फिल्म ने उसे बड़ा रिकग्निशन (पहचान) दिया. सबसे पहले पौलेंड में रिलीज हुई इस फिल्म को आउटस्टेंडिंग ब्रिटिश फिल्म के अवार्ड से नवाजा गया. ...और इरफान की अभिनय यात्रा सलीके से आगे बढ़ निकली. उसने 35 साल के अपने फिल्मी करियर में 50 से ज्यादा फिल्में की. हासिल, मकबूल, पान सिंह तोमर, स्लमडॉग मिलिनियर, लंच बॉक्स, पीकू जैसी बॉलीवुड फिल्मों के साथ-साथ उसने द अमेजिंग, लाइफ ऑफ पाई, स्पाइडर मैन जैसी हॉलीवुड फिल्मों में भी अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया.

अपने किरदार में पूरी तरह खो जाता था
इरफान अपने किरदार में पूरी तरह खो जाता था. हर कैरेक्टर पर वो खूब रिसर्च करता था. मैं उस वक्त अलवर में एडिशनल एसपी के तौर पर तैनात था. तभी एक दिन उसका फोन आया और बोला कि बागी पान सिंह तोमर के बारे में बात करनी है. मैं और तिग्मांशु धूलिया बैठे हुए हैं. यार बहुत अच्छा कैरेक्टर है पान सिंह तोमर का. हमारी पान सिंह तोमर के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर को लेकर लंबी बातचीत हुई. उसने पान सिंह तोमर की हर एक एफआईआर निकलवाई और उस पर रिसर्च की. उसके बाद वो मध्य प्रदेश और राजस्थान के डांग इलाके में आकर कई दिन रहा. वहां के हालात को समझने की कोशिश की और डायलेक्ट सीखा. फिल्म जब आई तो इरफान और पान सिंह तोमर में भेद करना मुश्किल हो गया.


हर वक्त खुशमिजाज अंदाज में देखा
'ही वाज वेरी इंटेंस...' जो भी कैरेक्टर करता बहुत जल्दी उसी मोड में चला जाता. 'ही वाज ए नेचुरल एक्टर' ... आप से मिलेगा तो पूछेगा शक्तावत साहब आपके इलाके में पानी कैसे बचाते हैं... पहले वाटर कंजर्वेशन का क्या तरीका था... सड़कें कैसी थी... अब कैसी है... स्कूलों के हालात कैसे हैं... रहन सहन कैसा है... खेती-बाड़ी क्या होती है...? वगैरह-वगैरह. आपको लगेगा ही नहीं कि वो बड़ा आदमी या बड़ा एक्टर है. इरफान अपने बारे में कम बताएगा, आपसे ज्यादा पूछेगा. ही वाज इंटरेस्टेड इन एवरीबडीज लाइफ. बचपन से लेकर अब तक मैंने इरफान को हर वक्त खुशमिजाज अंदाज में देखा. चाहे कितना भी तनाव हो, कितनी भी मुश्किल हो. वो उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने देता था.

कभी महसूस ही नहीं दिया होने दिया कि वो बड़ी लड़ाई लड़ रहा है
दिसंबर 2018 में जब मुझे उसकी बीमारी का पता चला तो मैं इंग्लैंड चला गया. सात-आठ दिन हम दोनों साथ रहे. उसने कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि वो एक बड़ी लड़ाई लड़ रहा है. उसकी आंखें बोलती थीं लेकिन वो कभी भी नहीं बोलता. वो हर वक्त यही बोलता कि हैदर तुम वहां हो आओ, बहुत अच्छी जगह है. उस रेस्टोरेंट पर हो आओ, वहां पर टर्कीस फूड बहुत अच्छा मिलता है, उसे टेस्ट करो. फलां जगह घूम कर के देखो, बहुत खूबसूरत है. वो उस हाल में भी हर वक्त गाइड करता रहता. कभी बताता ही नहीं, ऐसी बात ही नहीं करता कि आपको तकलीफ हो. आपको उसकी तकलीफ का अहसास हो.

पतंगबाजी के लिए हर साल मकर संक्रांति पर जयपुर आता
उसकी आंखें बेशक बोलती, लेकिन वो नहीं. ही वाज वेरी इंटेंस पर्सन... वेरी जोवियल... बचपन में हम जयपुर के जोरावर सिंह गेट के पास आयुर्वेदिक ग्राउंड में क्रिकेट खेला करते थे. बहुत ही बढ़िया क्रिकेटर था वो. उसका फर्स्ट क्लास क्रिकेट के लिये सीके नायडू टूर्नामेंट में इमर्जिंग क्रिकेटर के बतौर सिलेक्शन हुआ. फंड की वजह से जा नहीं पाया. पर उसने अफसोस नहीं किया. अलग राह चुनी, अलग पहचान बनाई. पतंगबाजी का भी बहुत शौकीन था इरफान. पतंगबाजी के लिए तो व हर साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर मुंबई के बिजी शेड्यूल को छोड़ कर जयपुर चला आता था.

पिता जयपुर में यहां पर टायर का बिजनेस करते थे
सुभाष चौक से थोड़ी दूर चांदी की टकसाल में उसके पिता यासीन अली खान साहब का बिजनेस था. यासीन साहब खजुरिया टोंक के साधारण से जागीरदार परिवार से थे. जयपुर में यहां पर टायर का बिजनेस करते थे. उनके पास एक जीप थी जिसे उन्होंने मॉडिफाई कर उसे केरोसिन से चलाने का जुगाड़ कर लिया था. वो उसे पेट्रोल से स्टार्ट करते और केरोसिन से चलाते. हम दोनों को कभी आमेर तो कभी नाहरगढ़ की पहाड़ियों पर ले जाते. इरफान उस चलती हुई जीप में कई बार हंसता.. मुस्कुराता और मेरे कान में धीरे से कहता और ठहाका लगाता. देख फादर साहब इस जीप को भी '....' बना रहे हैं. पेट्रोल दिखाते हैं, स्टार्ट करते हैं और केरोसिन से इसे दौड़ा लाते हैं.

इरफान के फादर अच्छे शिकारी थे और मां सईदा बेगम जोधपुर के बहुत बड़े परिवार से थीं.

इरफान पर मां का बहुत प्रभाव था
इरफान अपनी मां से बहुत मुतमईन था. बहुत प्रभाव था इरफान पर मां का. बहुत अच्छी पढ़ी-लिखी फैमिली से थीं, उसकी मां. उसके नाना जोधपुर में हकीम हुआ करते थे. अभी चार दिन पहले वो मां भी चल बसी और आज उनका लाडला इरफान भी. वो देख भी नहीं पाया आखिरी घड़ी अपनी उसी मां को. जो हर वक्त उसे एक ही बात कहती रही, 'इरफान तुम वापस चले आओ. यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बन जाओ और मेरे पास रहो.' जब भी मैं मिलता इरफान की मां एक ही शिकायत करती- 'हैदर मियां, वो चला गया... मैं तो चाहती थी कि वो यहीं रहे, लेक्चरर बन जाए, बच्चों को अच्छी तालीम दे और मेरे साथ रहे.' विडंबना देखो चार दिन पहले वो मां चली गई और आज उसका लाडला इरफान. मां गई तब उसे एहसास भी नहीं था, क्योंकि वो खुद पिछले छह-सात दिन से अस्पताल में था. आईसीयू में. ही वाज अनकॉन्सियस. अब तो वो हम सबसे इतना दूर चला गया कि क्या कहें. खुदा मां और उसके लाडले इरफान को जन्नत बख्शे और परिवार को हिम्मत दे. बदनसीबी यह कि न वो मां को विदा कर पाया और न हमारी ड्यूटी हमें उसे मुंबई जाकर विदा करने की इजाजत देगी.

(प्रसिद्ध अभिनेता इरफान खान के दोस्त हैदर अली ज़ैदी से न्यूज़ 18 राजस्थान के वरिष्ठ संपादक श्रीपाल शक्तावत की बातचीत पर आधारित. हैदर अली ज़ैदी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं और इन दिनों कोरोना ग्रस्त भरतपुर में पुलिस अधीक्षक का दायित्व अदा कर रहे हैं)

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