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ऐसे खत्म हो रही है संस्कृति, राजस्थान के पशु मेलों पर लगा ‘ग्रहण’

पशुपालन विभाग द्वारा अपने स्तर पर 10 बड़े पशु मेलों का आयोजन किया जाता है, जिनमें पशुओं की संख्या बढ़ने की बजाय लगातार घटती जा रही है. पिछले आठ साल में इन पशु मेलों में पशुओं की आमद, जहां करीब एक तिहाई रह गई है, वहीं पशुओं की बिक्री का आंकड़ा घटकर भी एक चौथाई रह गया है.

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राजस्थान में कभी सामाजिक मेलजोल और किसानों की आय का प्रमुख जरिया रहे पशु मेले अब धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोते हुए नज़र आ रहे हैं. प्रदेश के पशु मेलों में साल दर साल पशुओं की आवक और बिक्री का आंकड़ा घटना जा रहा है और अब इनके आयोजन के औचित्य पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं. प्रदेश में पशु मेले अब खत्म होने की कगार पर हैं. अलग-अलग वजहों के चलते पशु मेलों में पशुओं की आमद और बिक्री का आंकड़ा साल दर साल घटता ही जा रहा है. पशुपालन विभाग द्वारा अपने स्तर पर 10 बड़े पशु मेलों का आयोजन किया जाता है, जिनमें पशुओं की संख्या बढ़ने की बजाय लगातार घटती जा रही है. पिछले आठ साल में इन पशु मेलों में पशुओं की आमद, जहां करीब एक तिहाई रह गई है, वहीं पशुओं की बिक्री का आंकड़ा घटकर भी एक चौथाई रह गया है.

साल 2010-11 में प्रदेश के विभिन्न पशु मेलों में करीब 1 लाख 22 हजार 14 पशुओं की आमद हुई थी, इनमें से आधे पशुओं की ही बिक्री हो पाई. इसके अलावा साल 2011-12 में 1 लाख 16 पशुओं की आमद हुई थी, जिनमें से करीब 60 हजार पशुओं की बिक्री ही हो पाई. साल 2013-14 में पशुओं की आमद का आंकड़ा गिरकर करीब 90 हजार पहुंच गया और वर्तमान में साल 2018-19 के पशु मेलों में यह संख्या 18 हजार तक ही रह गई है, जिनमें से बिक्री सिर्फ 6 हजार 985 पशुओं की ही हुई है. ये आंकड़े इस बात की ताकीद करते हैं कि पशु मेलों में पशु अब गिनती के ही शेष है.

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प्रदेश के पशु मेलों में पशुओं की संख्या कम होने के पीछे कई वजह हैं. पहले पशु मेले लोगों के मेलजोर और मनोरंजन का जरिए हुआ करते थे, लेकिन अब संचार से नए साधन से लोग इन मेलों से विमुख हो गए हैं. आज से करीब एक दशक पहले भी कृषि कार्यों के लिए पशुओं पर निर्भरता थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. आवागमन के साधनों में पशुओं का इस्तेमाल, ऑनलाइन मार्केट, कड़े सरकारी नियम-कायदे, तीन वर्ष तक की गौवंश को राज्य से बाहर नहीं ले जाने, ऊंट को राज्य पशु का दर्जा मिलना और मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं होने के चलते अब पशु मेलों में लोगों का रुझान कम हो गया है.
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यूं तो पशु मेलों में सभी श्रेणियों के पशुओं की आमद और बिक्री का आंकड़ा लगातार गिर रहा है, लेकिन खास तौर पर गौवंश और ऊंट वशं की आमद और फरोख्त इन मेलों से कम हो गई है. इन पशु मेलों से सरकार की आय भी अब ना के बराबर ही हो रही है.

(जयपुर से दिनेश शर्मा की रिपोर्ट)

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