OPINION: रेवेन्यू बोर्ड को भ्रष्टाचार का 'वेन्यू' बना रही अफसर, वकील और दलालों की तिकड़ी

भ्रष्टाचार का खेल अफसर और सरकारी वकील और दलाल मिलकर खेलते हैं.

भ्रष्टाचार का खेल अफसर और सरकारी वकील और दलाल मिलकर खेलते हैं.

अजमेर रेवेन्यू बोर्ड (Ajmer Revenue Board) राज्य में राजस्व के मामलों की सबसे बड़ी अदालत है. इसमें राज्यभर के भूमि राजस्व मामलों की सुनवाई के बाद फैसले किए जाते हैं.

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हरीश मलिक

जयपुर.
 राजस्थान (Rajasthan) के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने आईएएस, आईपीएस और रिश्वत में अस्मत मांगने वाले पुलिसकर्मी के बाद अब राजस्व अदालत के सरकारी अफसरों का भंडाफोड़ किया है. एसीबी के छापों और सर्चिंग में शीशे की तरह साफ हुआ है कि रेवेन्यू बोर्ड को भ्रष्टाचार का 'वेन्यू' बनाने में अफसरों और सरकारी वकीलों की सांठगांठ अहम भूमिका निभाती रही. दरअसल, बोर्ड ही धारा 9 और 221 के जरिए अधीनस्थ कोर्ट (Court) और अफसरों पर नियंत्रण रखता है. वह अपने इसी अधिकार के दम पर उनके 40 साल तक के पुराने आदेशों और कार्रवाई को निरस्त कर सकता और बदल सकता है. ये अफसर एसीबी के हत्थे न चढ़ते तो यह राज ही न खुलता कि इन धाराओं की आड़ में अफसर अपने ही बोर्ड को लगातार दीमक की तरह चाट रहे हैं. सरकार का राजस्व बढ़ाने के बजाय वे बैंक खातों में अपना राजस्व बढ़ाने में लगे हैं !

सरकार करोड़ों के 476 केस हारी

अजमेर रेवेन्यू बोर्ड राज्य में राजस्व के मामलों की सबसे बड़ी अदालत है. इसमें राज्यभर के भूमि राजस्व मामलों की सुनवाई के बाद फैसले किए जाते हैं. एसीबी ने बोर्ड के दो सदस्यों आरएएस अधिकारी सुनील शर्मा, बी.एल. मेहरड़ा और सरकारी वकील व दलाल शशिकांत जोशी के घरों में दबिश देकर लाखों की नगदी और जमीनों के दस्तावेज जब्त किए. ये सदस्य फैसलों को पार्टी के पक्ष में और सरकार के खिलाफ करने में लाखों की रिश्वत वसूलते थे. एक आंकलन के मुताबिक, पिछले 20 माह में रेवेन्यू बोर्ड में जमीन के 476 केस सरकार हार गई. इसमें से 141 केस घूस लेने वाले आरएएस सुनील शर्मा ने ही सुने. ऐसे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि केस हारने से सरकार को करोड़ों-अरबों की अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा होगा. मेहरड़ा के केसों की जांच हो रही है कि उसके केसों में से कितने में सरकार को हार का सामना किन कारणों से करना पड़ा ?
अफसर + सरकारी वकील + दलाल = भ्रष्टाचार

दरअसल, भ्रष्टाचार का खेल अफसर और सरकारी वकील और दलाल मिलकर खेलते हैं. सरकारी वकील केस को कमजोर करते हैं और अफसर कथि​त सबूतों के अभाव के केस का फैसला सरकार के खिलाफ देते हैं. इसकी ऐवज में होने वाली मोटी कमाई की बंदरबांट हो जाती है. तभी तो रेवेन्यू बार्ड में सरकारी वकील लगने के लिए मंत्रियों तक की अप्रोच लगाई जाती है, जबकि रेवेन्यू बोर्ड के सरकारी वकीलों को साढ़े तीन- चार हजार प्रतिमाह ही मिलते हैं. अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतनी छोटी से कमाई के बावजूद एसीबी के छापे में पकड़े गए रेवेन्यू बोर्ड के वकील शशिकांत जोशी के घर सर्चिंग की कार्रवाई में 51 लाख की नगदी कैसे मिली ? बगैर भ्रष्टाचरण और मिलीभगत के इतनी नगदी, सम्पत्ति के कागजात, नोट गिनने वाली मशीन कैसे मिल सकती है ?

रिश्वत के कोडवर्ड... एक लाख मतलब एक किलो



बोर्ड के अफसरों, सरकारी वकील और दलालों की सांठगांठ इतनी गहरी थी कि रिश्वत के लिए कोर्ड वर्ड तक ईजाद कर लिए गए थे. रिश्वत की एक लाख की रकम को एक किलो या एक पन्ना कहा जाता था. रेवेन्यू बोर्ड से पार्टी के पक्ष में फैसले की गारंटी के साथ सरकारी दलाल जमीन की कीमत और केस के वजन के आधार पर रिश्वत की रकम फिक्स करते. पार्टी को यकीन दिलाने के लिए रेवेन्यू बोर्ड का फैसला लिखकर संबंधित पार्टी को दिखाया जाता. रकम मिलने के बाद रेवेन्यू बार्ड में अपनी पसंद का बैंच बनवाकर मनचाहा फैसला करा देते. लाख टके का सवाल यह है कि करोड़ों- अरबों की जमीनों के धड़ाधड़ सैकड़ों केस हारने के बावजूद सरकार के कान पर जूं तक क्यों नहीं रेंगी ? अब राजस्व मंत्री हरीश चौधरी बयान दे रहे हैं कि दोनों आरएएस को निलम्बित कर दिया गया है. पकड़े जाने के बाद तो यह हर केस में होना ही है. सवाल यह है कि विभागीय कार्यों, बोर्ड के फैसलों, अफसरों की कार्यशैली और आज जन की राजस्व संबंधी शिकायतों की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी किसकी है ? यदि यह मूल्यांकन सही तौर पर समय- समय पर होता रहे तो अफसरों को भी रिश्वत के लिए सांठगांठ करने के पहले सौ बार सोचना पड़ेगा ?
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