OPINION। राजस्थान में मानवेंद्र के सहारे राजपूतों को साधने की आस में कांग्रेस

कांग्रेस अब मारवाड़ में मानवेंद्र के बहाने नए जातीय समीकरण तैयार कर रही है, जिससे बीजेपी को उसके ही ट्रंप कार्ड से मात दी जा सके.

News18Hindi
Updated: October 17, 2018, 11:07 PM IST
OPINION। राजस्थान में मानवेंद्र के सहारे राजपूतों को साधने की आस में कांग्रेस
राहुल गांधी के साथ मानवेंद्र सिंह (File Photo)
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Updated: October 17, 2018, 11:07 PM IST
(भवानी सिंह)

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मानवेंद्र सिंह कमल के फूल को भूलकर हाथ के साथ चले आए हैं. जिस कमल के फूल को मानवेंद्र ने छोड़ा है, उसको खिलाने में मानवेंद्र सिंह के पिता जसवंत सिंह भी भागीदार थे. मानवेंद्र सिंह के साथ उनकी पत्नी चित्रा सिंह भी कांग्रेस में शामिल हुईं. चित्रा सिंह को मारवाड़ में ज्यादातर लोगों ने घूंघट में ही देखा है. मानवेंद्र सिंह के कांग्रेस में शमिल होने से पहले स्वाभिमान रैली के लिए चित्रा सिंह ने घर-घर जाकर कैंपेन किया था. वे महिलाओं के बीच घूंघट में कैंपेन से खासी चर्चित रहीं.

चित्रा सिंह वसुंधरा राजे पर धारदार सियासी वार करती हैं, जिसका उपयोग कांग्रेस मारवाड़ या मेवाड़ में राजपूत महिलाओं के बीच कैंपेन में कर सकती है. राजपूत पहले रामराज्य परिषद फिर जनसंघ और 1980 के बाद बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक रहा है.

राजस्थान में जिस वक्त बीजेपी की अगुआई भैरो सिंह शेखावत कर रहे थे, उस वक्त मारवाड़ में कांग्रेस का राजपूत चेहरा खेत सिंह राठौड़ थे. लेकिन खेत सिंह राठौड़ भी बीजेपी के इस परंपरागत वोट बैंक में सेंध नहीं लगा पाए. खेत सिंह राठौड़ की पारी के अंत के बाद कांग्रेस मारवाड़ में राजपूतों के बीच पैठ वाला चेहरा नहीं तलाश पाई है.

दूसरी तरफ मारवाड़ की दूसरी जाति जाट कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रही है. 1990 तक कांग्रेस मारवाड़ में जाट, मुस्लिम और मेघवाल जाति समीकरण की वजह से अजेय रही थी, लेकिन 1998 में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद मारवाड़ के जाट नेता परसराम मदरेणा को दरकिनार कर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने के बाद जाट समुदाय ने कांग्रेस से नाराजगी दिखानी शुरू कर दी. 2003 में इस इलाके में पहली बार राजपूतों के साथ जाटों का भी समर्थन बीजेपी को मिला और वह ताकतवर बन गई. वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनीं. धौलपुर के जाट राजघराने की बहु होने के नाते जाटों ने उन्हें नेता स्वीकार किया.

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2008 में कांग्रेस फिर सत्ता में तो आई, लेकिन अल्पमत के साथ. मारवाड़ में कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं मिला. अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने. 2013 में मारवाड़ में कांग्रेस साफ हो गई. तब से कांग्रेस को यह महसूस होने लगा कि मारवाड़ में अब तक दूर रहे राजपूत समुदाय को जोड़ा जाए.
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कांग्रेस किसी मौके की तलाश में थी. वह मौका पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में मिला. बीजेपी ने बाड़मेर, जैसलमेर से जसवंत सिंह का टिकट काटकर कर्नल सोनाराम को दिया था. जसवंत सिहं ने इसे स्वाभिमान का मुद्दा बनाकर निर्दलीय ताल ठोकी थी. वह चुनाव हार गए, लेकिन समर्थकों ने जसवंत सिंह ही नहीं राजपूतों के अपमान का मुद्दा बना दिया था. उस वक्त ये चर्चा आम थी कि इस सीट पर काग्रेस अपने प्रत्याशी की जीत के बजाय जसवंत सिंह की जीत का इंतजार कर रही है. वजह थी इस दरार का फायदा उठाकर राजपूत वोट बैंक में सेंध लगाना.

उस वक्त जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह शिव से बीजेपी विधायक थे. वे खुलकर पिता के साथ नहीं आए. पार्टी से सीधे बगावत नहीं की, लेकिन मानवेंद्र पर पिता का साथ देने का आरोप लगा और बजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिए गए. मानवेंद्र सिंह का आरोप है कि तब से लगातार उन्हें और उनके समर्थकों का परेशान किया जा रहा था. उन्हें पार्टी में किनारे कर दिया था. मानवेंद्र ने बाड़मेर के पचपदरा में स्वाभिमान रैली कर बीजेपी को अलविदा कह दिया. इस रैली ने राजपूतों की राजे से नाराजगी को हवा दे दी. कांग्रेस को भी मानवेंद्र के बहाने राजपूतों के बीच पार्टी की पैठ जमाने का मौका मिल गया.

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रैली के साथ ही कांग्रेस हिसाब-किताब लगाने में जुट गई. मानवेंद्र के कांग्रेस में शामिल होने से फायदा कितना होगा और नुकसान कितना? फायदे की गणना इसलिए कि मानवेंद्र के पाला बदलने से राजपूत वोट बैंक पाला बदल सकता है या नहीं? नुकसान का आकलन ये कि कांग्रेस का आधा रहा जाट वोट बैंक कहीं राजपूत नेता की एंट्री से खिसक न जाए.

अकेले बाड़मेर, जैसलमेर में ही कांग्रेस के दो कद्दावर जाट नेता हैं- एक राष्ट्रीय सचिव हरीश चौधरी और दूसरे पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी. मारवाड़ में जाट नेताओं की कतार लंबी है. यहीं वजह रही कि कांग्रेस जॉइन करने के लिए मानवेंद्र सिंह, हरीश चौधरी के साथ राहुल गांधी के आवास पहुंचे. इसकी एक तस्वीर भी वायरल हुई थी जिसमें हरीश चौधरी कार चला रहे थे और मानवेद्र सिंह साथ में बैठे थे. यानी कांग्रेस का इशारा मारवाड़ में राजपूत-जाट गठजोड़ की ओर था. प्रेस कांफ्रेंस में भी जाट नेता रामेश्वर डूडी और हरीश चौधरी को साथ बैठाया गया, ताकि संदेश दिया जा सके कि राजपूतों को गले लगाने का मतलब जाटों से किनारा करना नहीं है.

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कांग्रेस ने ये भी आकलन किया कि मानवेंद्र के आने से दूसरे परंरागत वोट बैंक मेघवाल और मुस्लिम पर क्या फर्क पड़ेगा? जसवंत सिंह परिवार के मेघवाल और मुस्लिमों के साथ अच्छे रिश्ते और राजपूतों के बीच पैठ को देखकर पार्टी ने तय किया कि मानवेंद्र को न केवल पार्टी में शामिल किया जाए बल्कि मारवाड़ में उनको कैंपेनर भी बनाया जाए.

अब मारवाड़ में कांग्रेस मानवेंद्र के बहाने नए जातीय समीकरण तैयार कर रही है जिससे बीजेपी को उसके ही ट्रंप कार्ड से मात दी जा सके. अब सवाल ये है कि क्या मानवेंद्र सिंह इस नाराजगी को भुनाकर राजपूतों को जैसलमेर, बाड़मेर में ही नहीं मारवाड़ में कांग्रेस से जोड़ पाएंगे?

मारवाड़ यानी पश्चिम राजस्थान के सात जिले जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, सिंरोही, पाली और जालौर में 43 विधानसभा सीटें हैं. इनमें से कांग्रेस 2013 में महज तीन सीटें ही जीत पाई थी. बीजेपी ने 39 सीटों पर कब्जा किया था. सबसे ज्यादा बीजेपी के राजपूत विधायक (14) भी इसी इलाके से चुने गए थे.

कांग्रेस मानवेंद्र सिंह से एक नई शुरुआत करना चाहती है. राजपूत समुदाय को जोड़ने और नए समीकरण गढ़ने का. पार्टी मान रही है कि अगर राजपूत समुदाय में सेंध लग गई तो कांग्रेस के पुराने बादशाहत के दिन लौट सकते हैं.

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