OPINION: 'जो आलाकमान बोलेगा, वही मैं करूंगा'
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OPINION: 'जो आलाकमान बोलेगा, वही मैं करूंगा'
नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया.

युवा शब्द का नारा बुलंद कर रही बीजेपी और कांग्रेस के हालिया कदम इस ओर ही इशारा कर रहे हैं कि 'जो आलाकमान बोलेगा, वही मैं करूंगा!'

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स्वप्निल वैरागी

फिल्म बंधन में नायक सलमान खान का एक डायलॉग काफी फेमस हुआ था, "जो जियाजी बोलेंगे, वही मैं करूंगा"! राजनीतिक दलों के फैसलों में ये कुछ इस अंदाज में सामने आता है, "जो आलाकमान बोलेगा, वही मैं करूंगा"! युवा शब्द का नारा बुलंद कर रही बीजेपी और कांग्रेस के हालिया कदम इस ओर ही इशारा कर रहे हैं. एक तरफ कांग्रेस ने दिल्ली में पार्टी की कमान 80 साल की शीला दीक्षित को सौंपी. दूसरी तरफ बीजेपी ने राजस्थान में 74 साल के गुलाबचंद कटारिया को नेता प्रतिपक्ष चुना.

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अब आप ये सोचते रहिए कि पार्टियों ने अनुभव को तरजीह दी या ये कदम मजबूरी में लिया गया. या फिर सचमुच यही नाम श्रेष्ठ विकल्प रहे. लग तो ये रहा है कि दल चाहे जो हो, चाहे जिस राज्य में हो, दूसरी कतार का नेतृत्व धुंध में गुम नजर आता है. ऐसे में फैसले 'आज' की सहूलियत और तात्कालिक जरूरत के हिसाब से ही होते हैं.
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पार्टी का अंदरूनी लोकतंत्र, आलाकमान के सामने, अंदरूनी ही रह जाता है. राजस्थान में बीजेपी के 73 विधायकों में से 55 विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को अपना नेता मान चुके थे. करीब-करीब आम राय थी कि नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे को ही बनाया जाए. एन वक्त पर गुलाबचंद कटारिया का नाम आया और फिर सब सहमत भी हो गए. दिलचस्प है पर हुआ यही है.

रविवार को बीजेपी की विधायक दल की बैठक चल रही थी. लगभग सभी की राय थी कि वसुंधरा राजे ही नेता प्रतिपक्ष बनाई जाए. 55 विधायक पहले ही अपनी सहमति जता चुके थे. इसमें आश्चर्य की भी कोई बात नहीं थी.

राजस्थान बीजेपी में फिलहाल वसुंधरा राजे से बड़ा कोई चेहरा नहीं है. वो पहले भी नेता प्रतिपक्ष रह चुकी हैं और बेहतरीन काम कर चुकी है. दूसरा ये कि जब बात कांग्रेस को प्रदेश के मुद्दों पर घेरने की बात आएगी, तो उनका एक्सपीरिएंस और तरीका उन्हें अन्य से बेहतर बना देता है. विधायक दल की बैठक में खुद पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने माइक संभाला और अपनी ओर से गुलाबचंद कटारिया के नाम का प्रस्ताव रखा.

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अब ये भी एक सच है कि कुछ सालों पहले गुलाबचंद कटारिया प्रदेश में एक सियासी यात्रा ना निकाल पाए इसके लिए वो दिल्ली तक दौड़ी थी. जिन्हें भी वो घटनाक्रम याद है, उन्हें ये भी याद होगा कि जमीन आसमान एक कर दिया था और विधायकों की परेड करवाकर तब के आलाकमान को अपना फैसला मामने पर मजबूर कर दिया था. लेकिन ये बदला दौर ही है कि राजे ने खुद गुलाबचंद कटारिया के नाम की पैरवी की. जब राजे ने खुद ही पैरवी की तो किसी की असहमति का सवाल ही नहीं उठता. और इस तरह गुलाबचंद कटारिया का नाम, आम राय से, नेता प्रतिपक्ष के तौर पर फाइनल हो गया.

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दरअसल, पार्टी आलाकमान ने जब से वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है, तब से ही ये लगभग साफ था कि राजे नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी शायद ही संभाले. घटनाक्रम की इनसाइड स्टोरी तो यही है और इस स्टोरी का मोरल यही है कि "जो आलाकमान बोलेगा, वही मैं करूंगा".

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