OPINION : राजस्थान में महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़, रक्षक ही बन रहे भक्षक

अधिकारियों के अनुसार दीपू और सौरभ एक पुलिस उप निरीक्षक के बेटे हैं. (सांकेतिक फोटो)

अधिकारियों के अनुसार दीपू और सौरभ एक पुलिस उप निरीक्षक के बेटे हैं. (सांकेतिक फोटो)

राजस्थान में रेप (Rape) के आंकड़े दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं. प्रदेश में रक्षक (पुलिस) ही भक्षक बन रही है. वर्ष 2020 में दुष्कर्म पीड़िताओं (Misdeed victims) के 5310 मुकदमों में से करीब 800 मामले कोर्ट (Court) के माध्यम से दर्ज हुए हैं.

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हरीश मलिक

जयपुर. महिलाओं की आन-बान और शान की खातिर जान न्यौछावर करने वाले राजस्थान (Rajasthan) में आखिर हो क्या हो रहा है ? वहशी दरिंदे बहू-बेटियों की अस्मत के लुटेरे (Rapist) बन खुलेआम बेखौफ घूम रहे हैं. हालात इतने बदतर हैं कि खाकी वर्दी (Police) तक पहुंचीं पीड़िताओं की रिपोर्ट तक नहीं लिखी जा रही है. 15 फीसदी दुष्कर्म पीड़िताओं की एफआईआर कोर्ट के माध्यम से हो रही है. इससे भी ज्यादा ऐसी महिलाएं हैं जो दरिंदों और समाज के डर से पुलिस में रिपोर्ट लिखाने ही नहीं पहुंचती.

कोढ़ में खाज महिला आयोग बना हुआ है. जिस आयोग की जिम्मेदारी महिलाओं के हक में आवाज उठाकर उन्हें न्याय दिलाना है वहीं ढाई साल से अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का ही इंतजार हो रहा है. महिला दिवस पर एक दिन के लिए महिलाओं को निशुल्क यात्रा का लॉलीपॉप देने वाली सरकार ने आयोग की ओर से आंखें बंद कर रखी हैं.

अपराधियों के दिल से पुलिस का खौफ ही मिट गया
महिलाओं के साथ ज्यादतियों के किस्से अब राजस्थान में चारों तरफ हैं. चाहे अलवर में तलाक के लिए दबाव डाल रहे पति से घबराई​ विवाहिता हो या फिर अजमेर में सामूहिक ज्यादती का शिकार गुजरात की महिला जायरीन. चाहे जयपुर के मानसरोवर में कार-दर-कार सामूहिक रेप का शिकार हुई उत्तरप्रदेश की युवती हो या फिर हनुमानगढ़ में बेखौफ दुष्कर्मियों का शिकार बनी किशोरी या फिर चाहे कोटा में नाबालिग का अपहरण कर दुष्कर्म हुआ हो. स्थान और नाम बदल दें तो दुष्कर्मियों की दास्तां के किस्से कमोबेश हर जिले में आए दिन सुनने में आ रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे ऐसे अपराधियों के दिल से पुलिस का खौफ ही मिट गया है.

प्रदेश में हर दिन 14 से ज्यादा दुष्कर्म के केस दर्ज हो रहे हैं

महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में राजस्थान आए दिन सुर्खियों में आने लगा है. प्रदेश में हर दिन 14 से ज्यादा दुष्कर्म के केस दर्ज हो रहे हैं. भरतपुर की दो घटनाएं तो खाकी को कलंकित करने वाली हैं. पति को पाबंद करने की रिपोर्ट लिखाने आई विवाहिता के साथ खेड़ली थाना परिसर में ही एसआई ने तीन दिन बलात्कार किया. एसआई को तत्काल निलंबन जैसी मामूली सजा दे दी गई. इससे पहले भी अलवर के ही अरावली विहार थाने में एक महिला ने एएसआई पर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया. जिस पुलिस का जिम्मा दुष्कर्मियों को पकड़कर सख्त से सख्त सजा दिलाना है वही यदि ऐसे दुष्कर्म में संलिप्त हो तो न्याय की गुहार लगाने महिलाएं कहां जाएं ?



आंकड़े दे रहे हैं जुल्मों की गवाही

आंकड़े गवाह हैं कि जो महिलाएं समाज और दरिंदों के दबाव को दरकिनार कर पुलिस तक पहुंचती है. उनके भी शत-प्रतिशत केस दर्ज नहीं हो रहे हैं. वर्ष 2020 में दुष्कर्म पीड़िताओं के 5310 मुकदमों में से करीब 800 मामले कोर्ट के माध्यम से दर्ज हुए. ज्याद​ती की शिकार अबलाएं पुलिस थाने, एसपी आफिस गईं लेकिन खाकी वर्दी पसीजी ही नहीं. न्याय के लिए पीड़िताओं को 39 लाख रुपए और खर्च करने पड़े. आश्चर्यजनक है कि पुलिस द्वारा केस दर्ज न करने पर इस्तगासे के माध्यम से कोर्ट के आदेश पर सबसे ज्यादा 5929 एफआईआर जयपुर रेंज में ही दर्ज हुईं, जहां राज्य की आला अफसरशाही है. दूसरे नंबर पर भरतपुर रेंज और तीसरे पर अजमेर रेंज है जहां इस्तगासे से क्रमश: 5625 और 4417 केस दर्ज हुये. ये आंकड़े पुलिस की कार्यशैली की कलई खोलने के लिए नाकाफी नहीं हैं. ऐसे में गृह विभाग की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह न सिर्फ खाकी में छिपी ब्लैक शीप्स का खात्मा करे, बल्कि गुंडों, दुष्कर्मियों और गुनहगारों में इतना खौफ पैदा करे कि वह कोई भी अपराध करने से पहले दस बार सोचें. तभी वह 'आमजन में विश्वास और अपराधियों में भय' के ध्येय वाक्य को चरिता​र्थ कर पाएगा.
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