OPINION: आस्ट्रेलिया से लें सबक, लॉकडाउन और सख्ती बढ़ाना ही कोरोना चेन तोड़ने का विकल्प

 जनता को ऐसे लोगों का मुंह काला करना चाहिए. (सांकेतिक फोटो)

जनता को ऐसे लोगों का मुंह काला करना चाहिए. (सांकेतिक फोटो)

संवेदनहीनता की हद यह कि प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल को मौखिक तौर पर मरीजों को भर्ती न करने के लिए कहा है, क्योंकि आक्सीजन (Oxygen) का पर्याप्त इंतजाम नहीं है.

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  • Last Updated: April 30, 2021, 11:02 AM IST
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हरीश मलिक

जयपुर.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही राष्ट्र के नाम पिछले सम्बोधन में कहा हो कि राज्य लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बनाएं, लेकिन राजस्थान के वर्तमान हालातों को देखते हुए लगता है कि फिलहाल लॉकडाउन ही कोरोना की चेन को तोड़ने का पहला विकल्प है. जब जन अनुशासन पखवाड़े (लॉकडाउन) के बावजूद कोरोना के पॉजिटिव केसों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है तो बगैर लॉकडाउन के हालात बद से बदतर हो सकते हैं. ऐसे में तो लॉकडाउन और ज्यादा समीचीन हो गया है. जन अनुशासन पखवाड़े को कुछ और सख्तियों के साथ राज्यभर में बढ़ाया ही जाना चाहिए. वैसे भी राजस्थान में कोरोना की दूसरी लहर का पीक मई में आने की संभावना विशेषज्ञ बता रहे हैं.

दस दिन में 53 से बढ़कर 158 की मौत

अब तीन मई को जन अनुशासन पखवाड़ा खत्म होने जा रहा है. इसे बढ़ाने या खत्म करने के लिए तर्क- वितर्क आ रहे हैं. जो इसे खत्म करने की वकालत कर रहे हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि ​लॉकडाउन के दस दिनों में ही कोरोना से मरने वालों की संख्या 53 से रिकार्ड 158 तक पहुंच गई. जान से जरूरी कुछ भी नहीं है. हमारी रिकवरी रेट घटकर बेहद नीचे आ गई और पॉजिटिव केस पांच हजार से ज्यादा बढ़ गए !! ऐसे में यदि लॉकडाउन न होता तो कितने भयावह हालात बनते ? राज्य के पास अतिरिक्त मरीजों के लिए पर्याप्त साधन ही नही है. न जरूरी बेड है न आक्सीजन. न पूरा नर्सिंग स्टाफ है न डाक्टर. न पर्याप्त वेंटीलेटर हैं और न ही अस्पताल. बगैर लॉकडाउन के कोरोना मरीजों को संभालना और मुश्किलतलब होगा.
कोरोना और एकोनॉमी दोनों को संभाला

दरअसल, हमसे एक तिहाई आबादी वाले आस्ट्रेलिया जैसे देश से सबक लिया जाना चाहिए. आस्ट्रेलिया ने पिछले साल कोरोना की दस्तक के बाद 113 केस आने पर ही लॉकडाउन लगा दिया था. जरूरी सेवाओं का छोड़कर सभी सार्वजनिक स्थल बंद कर दिए. नियम तोड़ने वालों पर अधिकतम दस लाख तक का जुर्माना लगाया गया. कोरोना और एकोनॉमी दोनों को मिलकर संभाला. सौ कोविड क्लिनिक हास्पीटल बनाए गए. लॉकडाउन में नौकरियां जाने लगीं तो निजी कंपनियों के कर्मचारियों की हर माह आर्थिक मदद की. बेरोजगार का भत्ता दोगुना कर दिया. मई 2020 में ही उसे समझ में आ गया था कि वेंटीलेटर्स की कमी पड़ने वाली है, इसलिए 5500 वेंटीलेटर्स का आर्डर दिया. इस साल कोरोना के मामले बढ़े तो तत्काल लॉकडाउन लगा दिया. राजस्थान सरकार ने हालांकि पिछले साल लॉकडाउन लगाने में सबसे जल्दी पहल की थी. उसके अपेक्षित परिणाम भी सामने आए. उससे सबक लेते हुए इस बार भी जन अनुशासन पखवाड़े के नाम पर कुछ छूट के साथ लॉकडाउन ही लगाया है. तीन मई के बाद इसे एक या दो सप्ताह के लिए बढ़ाया जा सकता है.

कोविड से लड़ने के पर्याप्त मेडिकल इंतजाम नहीं



यह इसलिए भी जरूरी है कि वर्तमान में प्रदेश का ऐसा कोई भी जिला नहीं है, जहां कोरोना के केसों में लगातार बढ़ोत्तरी नहीं हो रही. पर्याप्त संसाधन न होने की कारण हालात इतने दारुण हो गए हैं कि अस्पतालों में अव्वल तो गंभीर मरीजों तक को बेड नहीं मिल पा रहे हैं यदि कहीं बेड सुलभ है तो आक्सीजन नदारद है. आक्सीजन आती है तो टैंकर का इंतजाम नहीं! आईसीयू, वेंटीलेटर और रेमडेसीविर का तो भगवान ही मालिक है. यह 'ऊपर' तक पहचान वालों को ही नसीब हो रहे हैं. आम जनता तो बेड के लिए ही मारी- मारी फिर रही है. प्रदेश का सबसे बड़ा कोविड केयर सेंटर बीलवा में शुरू हुआ है, लेकिन अभी वहां पर्याप्त इंतजामों का अभाव है.

आपदा में अवसर तलाश रहे कालाबाजारी

संवेदनहीनता की हद यह कि प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल को मौखिक तौर पर मरीजों को भर्ती न करने के लिए कहा है, क्योंकि आक्सीजन का पर्याप्त इंतजाम नहीं है. केंद्र के निर्देश पर आक्सीजन मिलने के बावजूद इसकी कमी का कारण लगातार मरीजों का बढ़ते जाना है. दूसरे, आक्सीजन सिलेंडर्स की कालाबाजारी और स्टॉक की भी खबरें आ रही हैं. रेमडेसिविर इंजेक्शन को ब्लैक में बेचते नर्सिेग कर्मी और मेडिकल स्टोर संचालक हाल ही में पकड़े जा चुके हैं. महामारी की आपदा में कालाबाजारी के अवसर तलाश रहे लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए. एक ओर दिल्ली की तर्ज पर अलवर में निशुल्क आक्सीजन सिलेंडर लंगर लगाने की, मरीजों के लिए प्लाज्मा डोनेट करने की सुखद खबरें आ रही हैं. दूसरी ओर ऐसे अवसरखोर भी हैं. जनता को ऐसे लोगों का मुंह काला करना चाहिए.

(डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
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