Rajasthan: इतिहास में पहली बार गांवों और शहरों की सरकार पर अफसरशाही का 'राज'
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Rajasthan: इतिहास में पहली बार गांवों और शहरों की सरकार पर अफसरशाही का 'राज'
ब्यूरोक्रेसी का मुख्यालय सचिवालय।

आजादी के बाद राजस्थान के इतिहास में पहली बार गांवों और शहरों की सरकार पर एक साथ जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की बजाय अफसरशाही का 'राज' होगा.

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जयपुर. आजादी के बाद राजस्थान के इतिहास  में पहली बार गांवों और शहरों की सरकार पर एक साथ जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की बजाय अफसरशाही का 'राज' (Rule of bureaucracy) होगा. प्रदेश की 3,878 ग्राम पंचायतों, 33 जिला परिषदों, 352 पंचायत समितियों में प्रशासक लगाने के बाद अब राज्य सरकार ने 129 स्थानीय निकायों में प्रशासक की तैयारी कर ली है. राज्य सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) को पत्र लिखकर 129 स्थानीय निकाय के चुनाव 3 महीने टालने का आग्रह किया है. इनका कार्यकाल 31 अगस्त को समाप्त हो रहा है. सरकार के इस फैसले से आमजन को जहां राहत भी मिलेगी वहीं उनके लिए आफत भी कम नहीं होगी.

आयोग के अधिकारियों ने दिये ये संकेत
माना जा रहा है कि आयोग कोरोना काल की वजह से सरकार के अनुरोध को स्वीकार कर लेगा. राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने ऐसे संकेत दिए हैं. ऐसे में अब 129 स्थानीय निकायों में भी पंचायतों और नगर निगमों की तरह प्रशासक काबिज हो जाएंगे. देश को पंचायतीराज व्यवस्था देने वाले राजस्थान में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में ग्राम पंचायत, जिला परिषद और पंचायत समितियों में प्रशासक लगाए गए हैं. कोरोना संकट की वजह से तय समय पर चुनाव नहीं होने के कारण सरकार को प्रशासक लगाने पड़े हैं.

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अधिकारियों की मनमानी बढ़ेगी


स्थानीय स्तर पर सुशासन के अभिन्न अंग स्थानीय निकायों में प्रशासक लगाने से समीकरण बदल जाएंगे. अफसरशाही का राज होगा. मनमाने फैसले लिए जाएंगे. चुने हुए जनप्रतिनिधि नहीं होने के चलते अफसरों की मनमानी बढ़ेगी. क्योंकि उनकी कोई जवाबदेही तय नहीं है. जबकि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच जाना होता है. सीधे तौर पर राज्य सरकार का दखल होगा.

प्रशासक राज से इस तरह मिलेगी राहत
ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त होने से कई तरह के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं. गांवों में सत्ता परिवर्तन के बाद जो लोग यह आरोप लगाते हैं कि राजनीति की वजह से उनके काम अटक गए उनके लिए प्रशासक राज राहतभरी खबर है. दूसरी तरफ प्रशासक राज होने से गांवों की सरकार में अब सीधे तौर पर राज्य सरकार का दखल होगा.

सरकार ने इन्हें दिया प्रशासक का जिम्मा
जिन ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो गया है वहां ग्राम सेवक एवं पदेन सचिव को ही ग्राम पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने की तिथि से प्रशासक नियुक्त किया गया है. पंचायत समितियों में प्रशासक का जिम्मा विकास अधिकारी और जिला परिषद का जिम्मा जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को दिया है.

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इससे पहले कब-कब प्रशासक राज
गांवों की सरकार में वर्ष 1978 से 1981 के बीच प्रशासक राज रहा था. उस दौरान पंचायतीराज विभाग ने जिला कलक्टर्स को जिला परिषद का चार्ज दिया गया था. वहीं पंचायत समितियों का जिम्मा विकास अधिकारियों को दिया गया था. इसके बाद प्रदेश में वर्ष 1990 से 1995 तक प्रशासक राज रहा. गांवों की सरकार पर 25 साल में दूसरी बार अफसरशाही का राज होगा. क्योकि गांवों की सरकार के चुनाव निश्चित समय पर नहीं हो सके हैं.
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