OPINION : शुक्रिया कहिए... आपके बच्चों ने कंप्यूटर देखा है !

प्रदेश में कुल 14,147 सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी स्कूल हैं. इनमें आईसीटी फेज छह में 8,500 कंप्यूटर लैब सजाई गई. जबकि स्कूलों में स्थाई नियुक्त कम्प्यूटर शिक्षकों की संख्या "0" जीरो है.

News18 Rajasthan
Updated: January 24, 2019, 11:06 AM IST
OPINION : शुक्रिया कहिए... आपके बच्चों ने कंप्यूटर देखा है !
फाइल फोटो
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Updated: January 24, 2019, 11:06 AM IST
आपका शुक्रिया कहना तो बनता है. शुक्रिया उन तमाम सरकारों को जिन्होंने प्रदेश पर राज किया. वो नहीं होते तो हमारे बच्चे कंप्यूटर कैसे देखते, कहां जाते कंप्यूटर देखने. मैं बस यूं हीं बेसिर-पैर की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि ठोस और वाजिब मांग उठा रहा हूं. देखए, कंप्यूटर ने विदेशों से निकलकर देश से होते हुए अपने राजस्थान में जगह तो बना ली पर बात अगर स्कूली शिक्षा में इस्तमाल की हो तो वो धूल फांक रहे हैं. देश में सब डिजिटल हो रहा है और उसकी बुनियाद बन रही है बच्चों को कंप्यूटर दिखा-दिखा कर. कंप्यूटर शिक्षा में राजस्थान की नींव कैसी है, उसे समझना होगा. यहां कंप्यूटर तो है, कहीं टेबल पर तो कहीं डिब्बों में. अगर कुछ नहीं है तो वो हैं इन्हें पढ़ाने वाले "टीचर". उपर से तुर्रा ये कि ये विषय स्कूलों में अनिवार्य तौर पर पढ़ाया जा रहा है ( एक्सपर्ट नहीं पढा रहे तो क्या हुआ! ), परीक्षा भी हो रही है जिनमें प्रैक्टिकल भी है और मूल्यांकन भी हो जाता है ( एक्सपर्ट नहीं कर रहे तो क्या हुआ! ), परिणाम तो जारी हो ही रहे हैं. स्टूडेंट्स आते हैं, कंप्यूटर पर बैठते हैं, की-बोर्ड पर खटखट भी करते हैं, माउस को हिला लेते हैं, बटन दबा लेते हैं, जिनमें ज्यादा उत्सुकता हो वो गेम्स खोलकर खेलना भी सीख लेते हैं. अच्छा टाइमपास हो जाता है. थैंक्स टू गणित या भूगोल या इतिहास या फिर किसी अन्य विषय के मास्साब को जो बच्चों को लैब का चेहरा दिखा देते हैं. ये किसी एक स्कूल की बात नहीं है, जहां हाथ रखेगें दर्द ही होगा. राजस्थान के तकरीबन सभी सरकारी स्कूलों में कमोबेश यही हालात हैं.

चलिए कुछ फैक्ट्स पर नजर दौड़ा लेते हैं. प्रदेश में  कुल 14,147 सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी स्कूल हैं. इनमें आईसीटी फेज छह में 8,500 कंप्यूटर लैब सजाई गई. अब स्कूलों में स्थाई नियुक्त कम्प्यूटर शिक्षक की संख्या देखिए  "0". जीरो. हालांकि साल 2014 तक तो स्कूलों में अस्थाई तौर पर कम्प्यूटर शिक्षक नियुक्त थे लेकिन तत्कालीन सरकार ने उन्हें भी निकाल दिया. अब स्थिति ये है कि कहीं रख-रखाव के अभाव में आधे से ज्यादा कम्प्यूटर कबाड़ हो चुके हैं तो कही चूहों की धमाचौकड़ी की शिकार हो गए. हर कहीं किसी भी विषय के अध्यापक को कम्प्यूटर लैब की जिम्मेदारी सौंप दी गई. प्रदेश में बीसीए, एमसीए, पीजीडीसीए, बीटेक, एमटेक जैसी योग्यता रखने वाले शिक्षक स्कूलों में अस्थाई तौर पर काम किया करते थे. साल 2014 में उन्हें हटाने के बाद से अब वे केवल मंत्रियों और अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं. पिछली सरकार ने शिक्षकों को निकालने के बाद एक बेहतरीन योजना बनाई थी जिसे क्लिक योजना का नाम दिया गया. ये लागू होने से पहले ही फ्लॉप हो गई. कारण, क्योंकि सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटर पढ़ने के लिए स्टूडेंट्स से पैसे मांगे गए. लिहाजा आर्थिक कारणों के चलते कई विद्यार्थियों ने रूचि नहीं दिखाई.



अब बात कर लें दावों-प्रतिदावों की. एक तरफ बीजेपी डिजिटल राजस्थान की बात कर रही है. शिक्षा के क्षेत्र में हासिल उपलब्धियों का तो मानो पिटारा लेकर घूमते हैं. सवाल पूछने पर ऐसी-ऐसी बातें बताएंगे कि आपको समझ आ जाएगा देश का आईटी क्षेत्र में इतना नाम क्यों है. इधर, विधानसभा में कुछ दिनों पहले तक विपक्ष में बैठी कांग्रेस के पास तब सवाल पूछने के लिए शिक्षा की बदहाली के जो आंकड़े मौजूद थे, सत्ता में आते ही मानो कहीं खो गए. आज उनके जवाब वही सरकारों के गोलमोल जवाबों की श्रेणी में आ गए है. ठोस कदम उठाए जाएंगे. शायद, मेरा हमेशा से ये मानना रहा है, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं की लिस्ट में बच्चे बहुत नीचे होते हैं. ये आज वोट नहीं देते और जब कल वोट देंगे तो मनरेगा, कौशल विकास केन्द्र जैसी बातों से इनका मन बहला दिया जाएगा. इसलिए, तब तक, शुक्रिया तो कहना ही होगा, हाथी के दांत हैं, आखिर हमारे बच्चों की पहुंच कंप्यूटर तक बनी तो, वो उसे देख और छू तो पा रहे हैं.

( स्वप्निल बैरागी की रिपोर्ट )

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