क्या जोधपुर के तत्कालीन महाराजा हनवंत सिंह अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे ?

क्या जोधपुर के तत्कालीन महाराजा हनवंत सिंह अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे ? क्या महाराजा ने मेनन को रिवॉल्वर से मारने की धमकी थी ? ये ऐसे सवाल हैं जिनके अलग-अलग समय समय में अलग-अलग जवाब सामने आते रहे हैं और इनमें विरोधाभास पैदा होता रहा है.

News18 Rajasthan
Updated: December 8, 2018, 4:39 PM IST
क्या जोधपुर के तत्कालीन महाराजा हनवंत सिंह अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे ?
जोधपुर के तत्कालीन महाराजा हनवंत सिंह.
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Updated: December 8, 2018, 4:39 PM IST
विधानसभा चुनावों को लेकर प्रदेश में सियासत का दौर चरम पर है. किसकी सरकार बनेगी ? कौन मुख्ममंत्री बनेगा ? कौन मंत्री बनेगा ? इस बीच राजनीति के पुराने किस्से कहानियां भी सुर्खियों में हैं. आजादी का समय, उसके बाद की राजनीति और वर्तमान राजनीति को लेकर इस दौर में लगभग दरकिनार हो चुकी पुरानी पीढ़ी अक्सर चर्चाओं में मशगूल है. राजनीति से जुड़े पुराने कहानी किस्से भी जब तब सामने आते रहते हैं.

आजादी के समय और उसके तत्काल बाद की राजनीति तथा राजनीति में राजा रजवाड़ों की भूमिका को लेकर कई तरह के तथ्य सामने आते हैं. लेकिन इनमें से कुछ सवाल आज भी पहेली बने हुए हैं. कुछ बातें सुनी सुनाई हैं तो कुछ बातें तथ्यों की कसौटी पर कसी हुई हैं. ऐसे ही कई तथ्य बार-बार चर्चा में आते हैं. इनमें से कुछ सवाल जैसे क्या जोधपुर के तत्कालीन महाराजा हनवंत सिंह अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे ? क्या महाराजा ने मेनन को रिवॉल्वर से मारने की धमकी थी ? ये ऐसे सवाल हैं जिनके अलग-अलग समय समय में अलग-अलग जवाब सामने आते रहे हैं और इनमें विरोधाभास पैदा होता रहा है.

रिटायर्ड IAS बाबरा इसे सिरे से खारिज करते हैं
भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी करीब 97 वर्षीय औंकार सिंह बाबरा जोधपुर को पाकिस्तान में मिलाने की बात को सिरे से खारिज करते हैं. प्रशासनिक सेवा में आने से पहले तत्कालीन महाराजा हनवंत सिंह के डिप्टी पर्सनल सेक्रेटरी रहे बाबरा कहते हैं ऐसा कुछ भी नहीं है. यह गढ़ी गढ़ाई बातें हैं. ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल करेंगे तो पाएंगे कि इनका सत्यता से कोई लेना देना नहीं हैं. लंबे समय से ऐतिहासिक प्रमाणों के शोधपूर्ण कार्य से जुड़े बाबरा ने अपनी पुस्तक 'एक महाराजा की अंतर्कथा' में इन सब तथ्यों का बड़ी बेबाकी से उल्लेख किया है. आजादी के समय बतौर पर्सनल सेक्रेटरी महाराजा हनवंत सिंह के साथ बिताए गए करीब पौने दो साल के कार्यकाल के संस्मरणों को बाबरा ने करीब 32 वर्ष पूर्व 1986 में इस किताब के जरिए लोगों के सामने रखा था. इसमें सिंह ने ऐसे कई सवालों का कड़ाई से खंडन किया है.

omkar singh babara
फोटो- सेवानिवृत आईएएस औंकार सिंह बाबरा.


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सभी तथ्य विरोधाभाषी और कूटरचित साबित होते हैं
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राजा रजवाड़ों से लेकर अब तक करीब सात दशक की राजनीति से नजदीक से रू-ब-रू हो चुके सिंह कहते हैं आज की राजनीति और पुरानी राजनीति में जमीन-आसमान का अंतर है. वर्तमान राजनीति से कुछ खफा सिंह कहते हैं कि अब जुबान की कीमत नहीं है. महाराजा हनवंत सिंह के बारे में चर्चित सवालों का जबाव देते हुए सिंह कहते हैं कि 'ऐसा कुछ भी नहीं हुआ'. तथ्यों को गलत तरीके से तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है. रजवाड़ों के विलय पर लिखित पुस्तकों और प्रामाणिक दस्तावेजों का अध्ययन करने पर सभी तथ्य विरोधाभाषी और कूटरचित साबित होते हैं. ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसकी कहीं भी पुष्टि नहीं होती है. घटनाओं की कड़ी से कड़ी जोड़कर देखेंगे तो इन सवालों को निराधार पाएंगे.

(सेवानिवृत आईएएस औंकार सिंह बाबरा से बातचीत और उनकी पुस्तक 'एक महाराजा की अंतर्कथा' पर आधारित)
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