विधानसभा चुनाव 2018: किसके उत्साह में पड़ेगा खलल, कौन पहुंचेगा सत्ता तक?

दोनों पार्टियों के पास जीत के अपने-अपने तर्क हैं. बीजेपी जहां अपने विकास कार्यों के बूते जीत का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के फेल होने और आम जनता के हक के लिए पांच साल सड़कों पर संघर्ष करने का दावा कर जीत के मंसूबे पाले हुए है.

News18 Rajasthan
Updated: December 7, 2018, 8:16 PM IST
विधानसभा चुनाव 2018: किसके उत्साह में पड़ेगा खलल, कौन पहुंचेगा सत्ता तक?
फोटो : न्यूज 18 राजस्थान ।
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Updated: December 7, 2018, 8:16 PM IST
धुंआधार प्रचार और आरोप-प्रत्यारोप के बाद प्रदेश में शुक्रवार को 199 विधानसभा क्षेत्रों के लिए मतदान संपन्न हो गया. मतदाताओं ने ईवीएम का बटन दबाकर अपना फैसला दे दिया है. प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद हो गया है. अब आगामी 11 दिसंबर को निर्वाचन विभाग मतगणना कर प्रत्याशियों को मतदाताओं का फैसला सुनाएगा. प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं. आने वाले तीन दिन काटना प्रत्याशियों के लिए डेढ़ी खीर है.

चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही पार्टियों में से किसके दावों पर मतदाताओं ने मुहर लगाई यह तो आने वाले समय बताएगा, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही उत्साह से लबरेज हैं. दोनों पार्टियों के पास जीत के अपने-अपने तर्क हैं. बीजेपी जहां अपने विकास कार्यों के बूते जीत का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के फेल होने और आम जनता के हक के लिए पांच साल सड़कों पर संघर्ष करने का दावा कर जीत के मंसूबे पाले हुए हैं.

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कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलू हैं

राजनीतिक विशलेषकों की मानें तो पूरे चुनाव में दोनों पार्टियों के कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलू हैं. इनमें से कौन सा पहलू किस पर भारी पड़ेगा यह तो 11 दिसंबर को ही पता चल पाएगा. लेकिन इतना जरूर है कि मतदाता अब किसी के भुलावे में या छलावे में कम आता है. वह जागरुक हुआ है और किसी का पिछलग्गू बनने के बजाय अब अपने विवेक से काम लेने लगा है.

भारी जनादेश और अपेक्षाओं में असंतुलन
विधानसभा चुनाव-2013 में जबर्दस्त जनादेश लेकर सत्ता में आई बीजेपी ने आमजन की अपेक्षाओं को बेहताशा बढ़ा दिया था. वह मतदाताओं की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर पाई मौटे तौर यही उसकी जीत और हार पैमाना रहेगा. वहीं केन्द्र की मोदी सरकार के जीएसटी और नोटबंदी के फैसले ने प्रत्येक व्यक्ति का प्रभावित किया है. एससी-एसटी एक्ट पर बीजेपी का रवैया और पेट्रोल-डीजल के लगातार बढ़ते दाम भी जीत-हार में अहम भूमिका निभाएंगे. वहीं अपने मांगों को लेकर चुनाव से ऐन पहले सड़कों पर उतरे कर्मचारियों की नाराजगी भी बीजेपी को भारी पड़ सकती है.
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भारी पड़ सकता है सीएम फेस का असमंजस
राज्य सरकार को हर मोर्चे पर फेल बताकर चुनावी मैदान में लड़ रही कांग्रेस के लिए भी इस समर में मुश्किलें कम नहीं हैं. किसानों और गरीबों की हिमायती बनने का दावा करने वाली कांग्रेस के सामने बड़ी परेशानी भावी नेतृत्व (सीएम फेस) को लेकर पैदा हुआ असमजंस है. इसे लेकर पार्टी भले ही कुछ भी कहे, लेकिन इसने मतदाता को संशय में रखा है.

गत विधानसभा चुनावों के बाद सुस्त बैठी कांग्रेस उपचुनाव के कुछ समय पहले ही आक्रामक होकर चुनाव मैदान में उतरी. इससे पहले वह अमूमन निष्क्रिय सी रही है. यह कहीं ना कहीं मतदाता को खलता रहा है. एससीएसटी एक्ट पर कांग्रेस की चुप्पी से गैर एससीएसटी वर्ग पार्टी से उतना खुश नहीं है जितना वह पहले था. इसके साथ ही इस चुनाव में टिकट वितरण के बाद उपजी बगावत और बीजेपी के मुकाबले स्टार प्रचारकों का अभाव उसके लिए खतरे से कम नहीं है.
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