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क्या 'भुतहा' है राजस्थान का नया विधानसभा भवन? 20 साल से कायम है ये डरावना मिथक

राजस्थान के नए विधानसभा भवन में एक कार्यकाल में 200 विधायक एक साथ नहीं बैठ पाए.
राजस्थान के नए विधानसभा भवन में एक कार्यकाल में 200 विधायक एक साथ नहीं बैठ पाए.

Rajasthan Assembly house myth: राजस्थान के नए विधानसभा भवन में एक कार्यकाल में 200 विधायक एक साथ नहीं बैठ पाए. साल 2000 में नए विधानसभा भवन का निर्माण श्मशान भूमि पर हुआ था. ये डरावना मिथक पिछले 20 साल से कायम है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 21, 2021, 10:25 PM IST
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जयपुर. राजस्थान के नए विधानसभा भवन (Rajasthan Assembly house) का डरावना मिथक पिछले 20 साल से कायम है. वो मिथक ये है कि नए विधानसभा भवन में एक कार्यकाल में 200 विधायक एक साथ नहीं बैठ पाए. साल 2000 में नए विधानसभा भवन का निर्माण श्मशान भूमि पर हुआ था. 2001 में इसमें विधायक इसमें शिफ्ट कर दिए गए. तभी से यह मिथक इसके साथ जुड़ गया और आज भी कायम है. पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने भी तो विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया था और सदन को गंगाजल से धोने की मांग भी कर डाली थी. समय-समय पर इस भवन में पूजा-हवन करवाने की मांग भी उठती रही है.

वर्ष 2000 में विधानसभा भवन का निर्माण हुआ लेकिन निर्माण के समय आधा दर्जन मजदूरों की विभिन्न कारणों से मौत हुई. यह भवन 17 एकड़ में फैला है.  नए विधानसभा भवन से 200 मीटर दूरी पर अब भी श्मशान घाट है. पास में ही एक मजार भी है. बिना उद्घाटन के ही विधानसभा शुरू हुई थी क्योंकि 25 फरवरी 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन को नए विधानसभा भवन के उद्घाटन समारोह में बीमारी की वजह से शामिल नहीं हो पाए थे.


2001 में नए भवन में शिफ्ट हुई थी विधानसभा


पहले विधानसभा जयपुर के पुराने शहर में चलती थी. 2001 में ज्योतिनगर में बने नए भवन में शिफ्ट हो गई लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि तभी से एकसाथ 200 विधायक पूरे पांच साल नए भवन में नहीं बैठे. जैसे ही नए विधानसभा भवन में शिफ्टिंग हुई, तत्कालीन तत्कालीन मंत्री भीमसेन चौधरी और लूणकरणसर विधायक भीखा भाई की मौत से अपशकुन की शुरुआत हुई. मौत का सिलसिला यहीं नहीं रुका. 2002 में कांग्रेस विधायक किशन मोटवानी और 2002 में बीजेपी एमएलए जगत सिंह दायमा की भी मौत हो गई. बाद में, 2004 में गहलोत सरकार के तत्कालीन मंत्री रामसिंह विश्नोई का निधन हो गया. 2005 में अरूण सिंह और 2006 में नाथूराम अहारी का निधन हो जाने से मिथक की धारणा को और बल मिला.



बात 2008-2013 कार्यकाल की जाए तो ये पांच साल कई विधायकों के लिए मुश्किल भरे रहे. तत्कालीन बीजेपी विधायक राजेंद्र राठौड़ दारा सिंह को एनकाउंटर मामले में जेल की हवा खानी पड़ी. तत्कालीन गहलोत सरकार के मंत्री महिपाल मदेरणा और विधायक मलखान सिंह चर्चित भंवरी देवी हत्याकांड में फंसे और दोनों को जेल जाना पड़ा. तत्कालीन मंत्री बाबूलाल नागर रेप केस में जेल गए.

2013 में भी सभी विधायक सदन में एकसाथ नहीं बैठ सके


2014 के आम चुनाव में चार विधायक सांसद बन गए. नतीजा यह रहा कि फिर सभी 200 विधायक सदन में एकसाथ नहीं बैठ सके. सूरजगढ़, नसीराबाद, वैर और कोटा दक्षिण पर उपचुनाव हुए. बसपा के तत्कालीन विधायक बाबूलाल कुशवाह को जेल जाना पड़ा. 2013 से 2018 के बीच बीजेपी से मांडलगढ़ विधायक कीर्ति कुमारी, मुंडावर विधायक धर्मपाल चौधरी और नाथद्वारा विधायक कल्याण सिंह का निधन हो गया.

2018 में 199 सीटों पर हुआ था विधानसभा चुनाव


2018 में विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान ही रामगढ़ सीट पर बसपा प्रत्याशी की मौत हो गई थी. चुनाव आयोग ने 199 सीटों पर चुनाव करवाए. रामगढ़ सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की साफिया जुबैर को जीत मिली. इधर, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में संसद में पहुंच गए. इस तरह फिर 199 विधायक रह गए. अब पिछले चार महीने में चार विधायकों का विभिन्न बीमारियों के चलते निधन हो गया. उदयपुर के वल्लभनगर से गजेन्द्र सिंह शक्तावत का
हाल ही में निधन हो गया था. इससे पहले, सुजानगढ़ से विधायक एवं मंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल, सहाड़ा से कांग्रेस विधायक कैलाश त्रिवेदी, राजसमंद से बीजेपी विधायक किरण माहेश्वरी की मौत हो गई थी.
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